जब गुरु की दृष्टि ठहरती है…

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दिनेश मरोठी, बेंगलुरु, भूतपूर्व का. संपादक, तेरापंथ टाइम्स

जब गुरु की दृष्टि ठहरती है…

इतिहास में कुछ मोड़ ऐसे आते हैं जहाँ काल स्वयं ठहरकर किसी विराट घटना को अपनी छाती पर अंकित करता है। लाडनूं के जैन विश्व भारती के पावन परिसर में आषाढ़ शुक्ला त्रयोदशी को प्रातः 10.31 बजे जो घटित हुआ, वह युगों की आध्यात्मिक विरासत के एक नए क्षितिज पर आरोहण का साक्षात प्रमाण था।
जब युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमणजी के पावन करकमल उठे और उन्होंने उत्तराधिकार की धवल चादर अपने सुयोग्य शिष्य के कंधों पर सुशोभित की, तो समूचे तेरापंथ धर्मसंघ ने यह अनुभव किया कि आज इस महान परंपरा द्वारा भविष्य को दिया गया सबसे आश्वस्तकारी अभयदान है।
1. सेवा और पात्रता से निर्मित नया सृजन : तेरापंथ का शासन-विधान सदियों से इस सार्वभौमिक सत्य पर अडिग रहा है कि यहाँ सत्ता या पद माँगे नहीं जाते, यहाँ केवल सेवा माँग कर ली जाती है।
A. गुरु-दृष्टि से नई सृष्टि : जब अंतस की अपार पात्रता गुरु की पारखी दृष्टि को अपनी ओर आकर्षित करती है, तो वह दृष्टि ही नई सृष्टि का सृजन करती है।
B. अहं-शून्यता की यात्रा : युवाचार्यश्री का अब तक का संयम-पथ किसी पद-प्राप्ति की आकांक्षा का परिणाम नहीं, बल्कि निरंतर खुद को तपाने की अनवरत साधना रही है।
C. सेवाभावी नेतृत्व (Corporate Leadership) : आधुनिक प्रबंधन आज जिस 'सेवाभावी नेतृत्व' और 'इमोशनल इंटेलिजेंस' की बात करता है, उसका सबसे प्रामाणिक और आध्यात्मिक स्वरूप हमें युवाचार्यश्री के व्यक्तित्व में दिखाई देता है। श्रेष्ठ श्रुताराधक की गहन विद्या से लेकर मुख्य मुनि के संगठन-कौशल तक, उनकी यात्रा पदों के आरोहण के साथ गुरु-इंगित में लीन होकर अपने अहं को शून्य करने की यात्रा रही है।
2. प्रथम उद्बोधन : अधिकार पर हावी अनन्य विनय : जिन्हें पद सत्ता का प्रतीक लगते हैं, वे अधिकार की भाषा बोलते हैं; किंतु जिन्हें दायित्व गुरु-आज्ञा की पावन अमानत लगते हैं, वे समर्पण के आंचल में और गहरे झुक जाते हैं। मनोनयन के तत्काल बाद युवाचार्यश्री का प्रथम उद्बोधन कृतज्ञता का महासागर प्रतीत हो रहा था।
A. महान शिल्पी और अबोध बालक : चतुर्विध धर्मसंघ की उपस्थिति में जब उन्होंने स्वयं को एक 'अबोध बालक' और 'अगढ़ा पत्थर' कहकर गुरुदेव को 'महान शिल्पी' निरूपित किया, तो वहाँ उपस्थित हर व्यक्ति की आँखें नम हो गईं।
B. सुमनों का ताज : दायित्व को 'कांटों का ताज' बनने से बचाकर साधना की सुगंध से महकता 'सुमनों का ताज' बनाए रखने की उनकी मंगल-कामना ने यह सिद्ध कर दिया कि उनकी दृष्टि में संघ का उत्तरदायित्व भार नहीं, गुरु-ऋण चुकाने की एक पावन साधना है।
C. आजीवन शिक्षार्थी भाव : उनके ये भाव कि वे आजीवन एक शिक्षार्थी बनकर गुरु-छत्रछाया में सीखते रहें, नेतृत्व की सर्वोच्च दार्शनिक ऊंचाई को छूता है।
3. आधुनिक चेतना और आगमिक दृष्टि का अद्भुत समन्वय: युवाचार्यश्री का व्यक्तित्व आधुनिक चेतना और आगमिक दृष्टि का ऐसा समन्वय है, जो आज की नई पीढ़ी के प्रश्नों का सबसे संतुलित और प्रामाणिक उत्तर प्रस्तुत करता है। 'जेन जी' (Gen Z) की पीढ़ी केवल पारंपरिक आस्था के सहारे नहीं, अपितु तार्किक चिंतन, प्रामाणिकता और पर्यावरण-चेतना के धरातल पर समाधान खोजती है। युवाचार्यश्री का व्यक्तित्व इन कसौटियों पर पूरी तरह खरा उतरता है।
A. वैज्ञानिक एवं शोधपरक दृष्टिकोण: 'जैन आगमों में पर्यावरणीय चिंतन' जैसे गंभीर विषय पर उनका शोध एवं प्राप्त स्वर्ण पदक यह दर्शाता है कि वे प्राचीन प्राकृत आगमों के गूढ़ सूत्रों को आधुनिक वैज्ञानिक शब्दावली में समाज के सामने रखने में पूर्णतः सिद्धहस्त हैं।
B. व्यावहारिक एवं जीवंत चिंतन : 23 राज्यों की 40,000 किलोमीटर से अधिक की पदयात्रा ने उनके आगमिक चिंतन को किताबी न रखकर जनजीवन से जोड़कर अत्यंत व्यावहारिक बना दिया है।
C. शम, सम और श्रम की त्रिवेणी : उनके अंतर्मन की प्रशांत गंभीरता (शम), हर परिस्थिति में अडिग संतुलन (सम) और संघ-सेवा के प्रति अटूट पुरुषार्थ (श्रम) की त्रिवेणी उन्हें नए युग का आदर्श पथप्रदर्शक (युवाचार्य श्री महाप्रज्ञ / युवाचार्य श्री महावीर) बनाती है।
4. अखंड गुरु-विश्वास की अनंत वर्धापना :
आज धर्मसंघ में एक अनुपम त्रिवेणी प्रवाहित है:
–आद्य प्रवर्तक आचार्य भिक्षु से चली आ रही मर्यादाओं की पावन नदी,
–केंद्र में आचार्यप्रवर का हिमालयी सुदीर्घ अनुभव, और
–आगे युवाचार्यश्री की ऊर्जावान, प्रखर दृष्टि।
यह वर्धापना उस दिव्य गुरु-दृष्टि का वंदन है जिसने भविष्य की बागडोर सुरक्षित हाथों में सौंपी; यह अभिनंदन उस विनयमूर्ति शिष्य का है जिसने स्वयं को पूर्णतः गुरु-आज्ञा में विसर्जित कर दिया।
युवाचार्यश्री महावीर के पावन चरणों में चतुर्विध धर्मसंघ की ओर से अनंत-अनंत भावांजलि एवं मंगल वर्धापना! गुरु-विश्वास अमर रहे…, तेरापंथ धर्मसंघ जयवंता रहे!