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एक दृष्टि, एक दिशा, एक दायित्व
युवाचार्य श्री महावीर कुमार जी का मनोनयन : तेरापंथ की गौरवशाली परंपरा का नवीन अध्याय
तेरापंथ धर्मसंघ के इतिहास में कुछ अवसर केवल उत्सव नहीं होते, वे परंपरा की यात्रा में नए अध्याय का प्रारंभ करते हैं।
योगक्षेम वर्ष और आचार्य भिक्षु निर्वाण की त्रिशताब्दी के समापन के अवसर पर परमपूज्य युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमण जी द्वारा मुख्य मुनि श्री महावीर कुमार जी को युवाचार्य के रूप में मनोनीत किया जाना ऐसा ही एक ऐतिहासिक और मंगलकारी प्रसंग है।
मेरी दृष्टि में यह केवल एक पद पर प्रतिष्ठित होना नहीं, बल्कि गुरु की पारखी दृष्टि, शिष्य की दीर्घ साधना और संघ के भावी दायित्व का अद्भुत संगम है।
आचार्यप्रवर की पारखी दृष्टि–
किसी शिष्य में भविष्य के नेतृत्व की क्षमता को पहचानना गुरु की विलक्षण दृष्टि का परिचायक है। युवाचार्य श्री महावीर कुमार जी के व्यक्तित्व में ज्ञान, विनय, सेवा, श्रम, गांभीर्य, सक्रियता और समर्पण का जो संतुलित समन्वय दिखाई देता है, वह इस चयन को अत्यंत सार्थक बनाता है।
मुख्य मुनि के रूप में उन्होंने संघीय कार्यों, संदेश-लेखन, शासन-प्रशासन और श्रुताराधना में अपनी विशिष्ट भूमिका निभाई है। उनके व्यक्तित्व की सबसे प्रभावशाली विशेषता मुझे लगती है—ज्ञान के साथ विनय और दायित्व के साथ समर्पण।
उनके व्यक्तित्व का एक और अत्यंत आकर्षक पक्ष है—सहज आत्मीयता से लोगों से जुड़ने की उनकी अद्भुत क्षमता। बड़े से बड़े व्यक्ति से लेकर सामान्य श्रावक तक, प्रत्येक के साथ उनका संवाद औपचारिकता से मुक्त और आत्मीयता से परिपूर्ण दिखाई देता है। हजारों श्रावक-श्राविकाओं के नाम स्मरण रखना, वर्षों बाद मिलने पर भी व्यक्ति को उसी आत्मीयता से पहचान लेना, उसकी बात को ध्यानपूर्वक सुनना और यथासंभव उसे समय देना—यह केवल जनसंपर्क नहीं, बल्कि मन से मन तक पहुँचने की कला है।
विशेष रूप से बच्चों के प्रति उनका सहज स्नेह और अपनापन मन को छूता है। उनके लिए बालक केवल भविष्य के श्रावक नहीं, बल्कि आज की ही जीवंत चेतना हैं। बच्चों के बीच उनका सहज हो जाना, उन्हें स्नेह देना और उनकी छोटी-छोटी बातों को भी महत्व देना उनके व्यक्तित्व की उस सहृदयता और वात्सल्यपूर्ण संवेदनशीलता को प्रकट करता है, जो किसी भी जननेता को जनमानस से जोड़ती है।
युवाचार्य श्री की स्वयं की भावना भी अत्यंत स्पर्शी है—गुरुदेव के चरणों और शरण में रहने तथा उनकी प्रेरणाओं एवं साधु-साध्वियों द्वारा बताए गए गुणों से स्वयं को संपन्न बनाने की आकांक्षा। यही विनय किसी भी बड़े नेतृत्व की वास्तविक शक्ति होती है।
युवाचार्य—पद नहीं, भविष्य का दायित्व–
युवाचार्य का अर्थ केवल भविष्य का आचार्य नहीं, बल्कि वर्तमान में भविष्य की तैयारी करने वाला व्यक्तित्व है। आज का समय तेजी से बदल रहा है। नई पीढ़ी के सामने नए प्रश्न हैं, नई चुनौतियाँ हैं और संवाद के नए माध्यम हैं। ऐसे समय में आवश्यकता ऐसे नेतृत्व की है, जो परंपरा की आत्मा को अक्षुण्ण रखते हुए समय की भाषा को भी समझ सके और जनमानस की धड़कनों को भी सुन सके।
युवाचार्य श्री महावीर कुमार जी में ज्ञान और आधुनिक बोध के साथ सहजता, शांति, समता और सरलता का जो समन्वय दिखाई देता है, उससे तेरापंथ के भावी विस्तार और प्रभाव के प्रति आश्वस्ति होती है।
उनकी सबसे बड़ी विशेषताओं में से एक यह भी है कि वे लोगों को केवल संबोधित नहीं करते, उनसे जुड़ते हैं। किसी व्यक्ति को अपना समय देना, उसकी बात को धैर्यपूर्वक सुनना और उसे यह अनुभव कराना कि उसकी बात महत्त्वपूर्ण है—नेतृत्व की यह मानवीय संवेदना अत्यंत दुर्लभ है। यही सहजता आने वाले समय में नई पीढ़ी, विशेषकर युवाओं और बच्चों को धर्मसंघ से अधिक गहराई से जोड़ने की एक महत्वपूर्ण शक्ति बन सकती है।
गुरु-शिष्य की अद्भुत परंपरा–
तेरापंथ की शक्ति उसकी गुरु-परंपरा में है—'एक गुरु, एक विधान' केवल एक उद्घोष नहीं, बल्कि जीवन-पद्धति है।
आचार्यप्रवर की छत्रछाया में युवाचार्य श्री महावीर कुमार जी का पदार्पण इसी अखंड परंपरा की अगली कड़ी है। यह उस गुरु-शिष्य परंपरा की निरंतरता का प्रतीक है, जिसमें वर्तमान की साधना से भविष्य का नेतृत्व निर्मित होता है।
एक श्रावक के रूप में यह प्रसंग मेरे लिए केवल गौरव और प्रसन्नता का विषय नहीं, बल्कि आत्मचिंतन का अवसर भी है। जब गुरु ने भविष्य के नेतृत्व को पहचानकर दायित्व सौंपा है, तब हम सबका भी दायित्व है कि गुरु-आज्ञा, मर्यादा और अनुशासन के प्रति अपनी निष्ठा को और अधिक सुदृढ़ करें।
हृदय से वर्धापना
युवाचार्य श्री महावीर कुमार जी के नेतृत्व में तेरापंथ धर्मसंघ ज्ञान, साधना, सेवा और संगठन की नई ऊँचाइयों को स्पर्श करे; उनकी सहज आत्मीयता से जन-जन जुड़े, उनका ज्ञान नई पीढ़ी को दिशा दे, उनका विनय संघ की मर्यादा को और सुदृढ़ करे और उनकी सेवा-भावना तेरापंथ की प्रभावना को नए आयाम प्रदान करे—इसी मंगलभावना के साथ हृदय से वर्धापना।