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महावीर बने युवाचार्य महावीर : सफर सेवा, साधना एवं समर्पण का
अध्यात्म निष्ठा, सत्यनिष्ठा, संघनिष्ठा, अनुशासन निष्ठा, मर्यादा निष्ठा और समर्पण निष्ठा का नाम है —तेरापंथ।
तेरापंथ एवं संघीय मर्यादाएँ :
१. स्थापना : विक्रम संवत 1817 में आचार्यश्री भिक्षु द्वारा की गई।
२. धर्मक्रांति : तेरापंथ के आद्यप्रवर्तक आचार्यश्री भिक्षु धर्मक्रांति के पुरोधा थे। उनकी धर्मक्रांति आचार-मूलक और सिद्धांत-मूलक थी। अनुशासन की भूमिका पर उनकी नीति स्वस्थ एवं सुदृढ़ थी।
३. संघीय मर्यादाएँ : संघ की मर्यादा और अनुशासन को अक्षुण्ण बनाए रखने के लिए उन्होंने विक्रम संवत 1832 में संघीय मर्यादाओं का निर्माण किया।
४. सुसंगठित संगठन : आज तेरापंथ धर्मसंघ जो सुसंगठित एवं सुव्यवस्थित है, इसका प्रमुख श्रेय आचार्यश्री भिक्षु द्वारा बनाई गई उन मर्यादाओं को जाता है।
५. नेतृत्व एवं उत्तराधिकार : आचार्यश्री भिक्षु ने आचार्य में संघ की शक्ति को केंद्रित कर सुदृढ़ संगठन की नींव डाली और भावी आचार्य के मनोनयन का दायित्व भी वर्तमान आचार्य को प्रदान किया। उत्तराधिकार की इस यशस्वी परंपरा में उत्तरवर्ती सभी आचार्यों ने अपने सम्यक् दूरदर्शी चिंतन से संघीय मर्यादाओं एवं अनुशासन को संरक्षण देते हुए धर्मसंघ को नई ऊँचाइयाँ प्रदान कीं।
वर्तमान नेतृत्व एवं ऐतिहासिक मनोनयन :
१. एकादशम अधिशास्ता : वर्तमान में ११वें अधिशास्ता आचार्यश्री महाश्रमण जी धर्मसंघ का अपने नेतृत्व में कुशलता से संचालन कर रहे हैं। आपश्री ने अपने आचार्यकाल में अनेकानेक कीर्तिमानों के सुनहरे अध्यायों का सृजन किया है।
२. स्वर्णिम ऐतिहासिक अध्याय : दूरदृष्टा आचार्यश्री महाश्रमण जी ने तेरापंथ के उज्ज्वल भविष्य को निश्चिंतता प्रदान करने के लिए एक और स्वर्णिम ऐतिहासिक अध्याय का सृजन किया।\
३. युवाचार्य मनोनयन की घोषणा:
स्थान : तेरापंथ की राजधानी लाडनूं।
तिथि व समय : आद्यप्रवर्तक महामना आचार्यश्री भिक्षु चेतनावर्ष की परिसंपन्नता के विशिष्ट दिन — आषाढ़ शुक्ला त्रयोदशी, 27 जुलाई 2026 (सोमवार), प्रातःकालीन प्रवचन में।
घोषणा : मुख्य मुनि महावीर कुमार जी को अपने उत्तराधिकारी 'युवाचार्य महावीर कुमार' के रूप में नियुक्त किया गया।
प्रारंभिक जीवन एवं संयम पथ :
जन्म : 19 जून 1988 को राजस्थान के बाड़मेर जिले के एक छोटे से गाँव फलसूंड में, कोचर कुल में।
माता-पिता : माता श्रीमती छगनी देवी एवं पिता श्री सवाईचंद जी।
दीक्षा : बाल्यावस्था से किशोरावस्था में प्रवेश करते ही वैराग्य के भाव प्रस्फुटित हुए। 3 मार्च 2002 को जसोल में प्रेक्षाप्रणेता युगप्रधान आचार्यश्री महाप्रज्ञ जी के कर-कमलों से दीक्षित होकर संयम पथ पर अग्रसर हुए।
साधना एवं सान्निध्य : प्रारंभ से ही आपकी शिक्षा-साधना का क्रम वर्तमान अनुशास्ता आचार्यश्री महाश्रमण जी के सान्निध्य में ही रहा।
व्यक्तित्व, विशेषताएँ एवं उपलब्धियाँ :
१. गुण एवं व्यक्तित्व : आपने अपनी विद्वत्ता, विनम्रता, सेवा, समर्पण, अनुशासित जीवनशैली, विनयशीलता, व्यवहारकुशलता, सहिष्णुता और संघनिष्ठा जैसे गुणों से विशिष्ट पहचान बनाई।\
२. आगम ज्ञान : आपने आगम ग्रंथों का गहराई से अध्ययन किया है। आप आगम वाणी के गहन मर्मज्ञ हैं एवं गायन विधा में भी निपुणता हासिल की है।
३. 'श्रेष्ठ श्रुताराधक' : आपकी विलक्षण अध्ययन शैली के लिए आचार्यश्री महाश्रमण जी ने आपको 'श्रेष्ठ श्रुताराधक' उपमा से विभूषित किया।
४. दायित्व एवं अलंकरण :
आप समीक्षा परिषद के सदस्य के रूप में मनोनीत हुए।
विराटनगर (नेपाल) की विदेशी धरा पर पूज्यप्रवर ने आपको 'मुख्य मुनि अलंकरण' तथा बरपथार (असम) में 'मुख्य मुनि' पद पर सुशोभित किया। आपने बहुश्रुत परिषद के संयोजक के रूप में भी अपने दायित्वों का पूर्ण निष्ठा एवं जागरूकता के साथ निर्वहन किया।
उच्च शिक्षा (Ph.D.) : शिक्षा के क्षेत्र में आपने 'जैन आगमों में पर्यावरणीय चिंतन' विषय पर शोध कर पीएच.डी. (Ph.D.) की उपाधि प्राप्त की है।
कृतज्ञता एवं मंगलकामनाएँ : भारतीय संस्कृति में गुरु-शिष्य की गौरवशाली परंपरा का प्रत्यक्ष साक्षात्कार तेरापंथ में किया जा सकता है। आचार्य अपने तेजस्वी चिंतन से अपने उत्तराधिकारी शिष्य में आध्यात्मिक ऊर्जा का संप्रेषण करते हैं, जिससे संपूर्ण धर्मसंघ निश्चिंतता का अनुभव करता है। पूरा धर्मसंघ श्रद्धेय आचार्यप्रवर के प्रति हृदय से कृतज्ञ है, जिन्होंने युवाचार्य पद पर नियुक्ति कर कोहिनूर हीरा रूपी अनुपम उपहार आचार्य भिक्षु के नंदनवन को प्रदान किया है।
हमारी मंगलकामना : आपश्री स्वस्थ एवं निरामय रहते हुए पूज्यप्रवर के निर्देशन में धर्मसंघ की हर गतिविधि में अपने सम्यक् चिंतन, सहभागिता तथा अहर्निश आध्यात्मिक विकास से जन-जन का कल्याण करें। आप पग-पग पर विजय वरें, नव शिखरों पर चरण धरें एवं आध्यात्मिक उर्मियों से जिनशासन व तेरापंथ को रोशन करें।
समर्पित पंक्तियाँ :
विनय विवेक आगम श्रुत ज्ञान अपार,
स्पृहा से दूर तप त्याग सेवा का है सार।
कषाय विजयी उपशांत संघनिष्ठ महान,
युवाचार्य मुनि महावीर को वंदन बारंबार।
तेरापंथ के युवराज को वंदन बारंबार!