गुरु-शिष्य की एक और आदर्श जोड़ी

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प्रमोद घोड़ावत, दिल्ली, भूतपूर्व का. संपादक, तेरापंथ टाइम्स

गुरु-शिष्य की एक और आदर्श जोड़ी

भिक्षु जन्म त्रिजन्मशताब्दी वर्ष के पावन अवसर और भिक्षु बोधि दिवस जैसे पुनीत दिवस की तेरस को पांच सौ से अधिक साधु-साध्वियों, श्रमण श्रेणी और विशाल श्रावक समाज की उपस्थिति में परम पूज्य आचार्यश्री महाश्रमणजी ने अपने श्रीमुख से एक ऐसे वाक्यांश का उच्चारण किया, जिसके श्रवण मात्र से ही चतुर्विध धर्मसंघ में हर्षोल्लास की लहर दौड़ पड़ी। वह कर्णप्रिय उक्ति थी — 'आओ मुनि महावीर...'।
तेरापंथ के एकादशम शासक परम पूज्य आचार्यश्री महाश्रमणजी ने गुरुदृष्टि को सर्वात्मना समर्पित, मुख्य मुनि के रूप में सुप्रतिष्ठित, बहुश्रुत परिषद के संयोजक, गुणों से सुशोभित अपने सुयोग्य सुशिष्य को प्रगतिमान और तेजस्वी तेरापंथ धर्मसंघ के युवाचार्य पद पर मनोनीत कर मानो धर्मसंघ को निश्चिंत बना दिया।
'तेरापंथ की क्या पहचान - एक गुरु और एक विधान' सिर्फ एक उद्घोष नहीं, बल्कि इसकी जीवंत प्रयोग भूमि है। एक सुगुरु के अनुशासन में चतुर्विध धर्म संघ आध्यात्मिकता के पथ पर सतत गतिमान है। गुरुदेव ने युवाचार्यश्री के रूप में मुनि महावीर को प्रतिष्ठित करते हुए तथा उसके बाद उन्हें और अधिक ज्ञानवान, सेवाभावी, स्वाध्यायी और सुप्रेरक बनने का आशीर्वाद दिया।
अनेक गुणों के धारक युवाचार्यश्री महावीर का अतिविशिष्ट गुण - उनकी गुरु के प्रति अगाध श्रद्धा और अतिरेक समर्पण के रूप में परिलक्षित होता है। आगम में इसके संदर्भ में एक उक्ति आती है - 'ईंगियागार संपन्न'। युवाचार्यश्री महावीर इस उक्ति के अनुरूप सर्वांगीण व्यक्तित्व के धनी हैं।
जिन शासन में गुरु-शिष्य परम्परा का उज्ज्वल आलेख दृष्टिगोचर होता है। महावीर और गौतम की जोड़ी से प्रारम्भ कर भिक्षु-भारमल से लेकर तुलसी-महाप्रज्ञ और महाप्रज्ञ-महाश्रमण की जोड़ी के देखते हुए महाश्रमण-महावीर की जोड़ी से एक नूतन स्वर्णिम अध्याय का सृजन होता हुआ देख रहे हैं।
युवाचार्यश्री ने अपने प्रथम वक्तव्य में अपनी प्रति यह मंगलकामना की कि मेरा युवाचार्य काल आचार्य भिक्षु के युवाचार्य काल से भी अधिक हो। अधिक से अधिक वे अपने गुरु के संरक्षण में रहें, ऐसी मंगल उनकी भावना है।
किसी पद पर मनोनीत होने की पात्रता के दो पक्ष होते हैं। इन दोनों पक्षों के सुयोग एवं समन्वय का परिणाम सुखकारी होता है।
पात्रता के दो पक्ष:
१. अर्हता : युवाचार्य श्री महावीर ने एक अच्छे साधु के रूप में अपना सर्वोत्तम करणीय करते हुए अर्हता का अर्जन किया।
२. सौभाग्य : वहीं उनका प्रबल पुण्योदय या सौभाग्य रहा कि वे परम पूज्य आचार्यप्रवर की कृपादृष्टि के पात्र बने।
कौन जानता था कि सिंवाची मालाणी के एक छोर में स्थित फलसूंड का वह प्यारा सा छोरा अपनी बालसुलभ चपलता, सरलता और भोलेपन के साथ साधना के बहुविध सोपानो का आरोहण करते हुए शिखर के उपपात में पहुँचेगा। आदरणीय सवाईलालजी, छगनी बाई कोचर कुल का लाल आज इतने बड़े तेरापंथ परिवार की आँखों का तारा बन
गया है।
युवाचार्य प्रवर अनेक गुणों के समवाय हैं। वर्धमान के अवसर पर साधु-साहित्यों द्वारा हृदय उदगार को प्रस्तुत किया जा रहा था—मानो उनके एक-एक गुणों का अभिनंदन किया जा रहा था। युवाचार्य श्री के किस गुण का वर्ण करें, किस गुण से प्रेरणा लें?
युवाचार्यश्री के विलक्षण व्यक्तित्व के प्रमुख आयाम :
१. आकर्षक व्यक्तित्व : युवाचार्य श्री की मोहनीय मुस्कान और उसके साथ उनकी चर्चित मुखकृति बरबस सबको उनकी ओर आकृष्ट करने को पर्याप्त है।
२. सद्गुणों के पर्याय : युवाचार्यश्री सादगी, सरलता, श्रमशीलता, समर्पण भाव के पर्याय हैं।
३. तेजस्वी व्यक्तित्व : स्वाध्यायशीलता, गुणग्राहकत्ता, सहनशीलता, समत्वभावना, विनम्रता के समावेश से आपका व्यक्तित्व तेजस्विता को प्राप्त करता है।
४. मर्यादा और आगम निष्ठा : आगम ग्राही एवं मर्यादा पालक होना आपका ध्येय प्रतीत होता है।
५. लोकप्रियता की ऊंचाइयां : बाल मुनियों के प्रशिक्षक, ओज भरे वक्तृत्व और सुमधुर गायनशैली से आपने एक लोकप्रियता की ऊंचाइयों को स्पर्श किया है।
महाश्रमण-महावीर की यह आध्यात्मिक जोड़ी युगों-युगों तक जन-जन का आध्यात्मिक मार्गदर्शन करते हुए उन्हें अच्छा इंसान बनाने को प्रेरित करती रहे। आध्यात्मिक अभिनंदन
- शत शत अभिनंदन