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आचार्य भिक्षु के 301वें जन्मोत्सव पर युवाचार्य मनोनयन—एक अविस्मरणीय दिवस
27 जुलाई 2026 का दिन मेरे जीवन में सदैव एक अविस्मरणीय दिवस के रूप में अंकित रहेगा। यह दिन था तेरापंथ धर्मसंघ के आद्य प्रवर्तक आचार्य श्री भिक्षु के 301वें जन्मोत्सव का।
गत रात्रि इंदौर से उपासक के रूप में सेवारत युवक रत्न राजेंद्र भाईसा सेठिया का फोन आया था। उन्होंने बताया कि विज्ञप्ति में टीवी प्रसारण का उल्लेख है और सर्वत्र इसी की चर्चा है। उन्होंने पूछा—'क्या आज कुछ विशेष होने वाला है?' मैंने कहा—'भाईसा! विशेष तो अवश्य है, किंतु क्या है, यह अभी केवल कल्पना का विषय है।'
सुधर्मा सभा में विशेष दिवस की अनुभूति :
प्रातः लगभग 8:30 बजे मैं अमृतवाणी के मंत्री अशोक भाई पारख के साथ प्रवचन पंडाल 'सुधर्मा सभा' पहुँचा।
इसी बीच प्रकृति ने भी अमृत-वर्षा कर इस पल का स्वागत किया। वर्षा थमने के पश्चात बहुश्रुत परिषद के सदस्य मुनिश्री दिनेश कुमार जी पधारे और तत्पश्चात परम पूज्य प्रवर मंच पर विराजमान हुए।
कार्यक्रम अपनी सहज गति से आगे बढ़ रहा था। प्रातः 10 बजे पूज्य प्रवर का प्रवचन प्रारंभ हुआ। उन्होंने आचार्य भिक्षु के जन्म-त्रिशताब्दी वर्ष के संदर्भ से अपनी बात प्रारंभ की।
प्रवचन के मध्य अचानक वह ऐतिहासिक क्षण आया, जिसकी घोषणा के स्वरूप से सब अनभिज्ञ थे। पूज्य प्रवर के मुखारविंद से शब्द फूटे।
'आज मैं अपना उत्तराधिकारी घोषित करना चाहता हूँ... आओ, मुनि महावीर!'
जैसे ही ये शब्द गूंजे, संपूर्ण धर्मसंघ ने 'ॐ अर्हम्' के गगनभेदी घोष से पंडाल को गुंजायमान कर दिया। वह क्षण केवल एक घोषणा नहीं, बल्कि तेरापंथ धर्मसंघ की परंपरा, मर्यादा और भावी स्थिरता का स्वर्णिम अध्याय था।
आचार्य भिक्षु की दूरदर्शिता और उत्तराधिकार की परंपरा :
आचार्य श्री महाप्रज्ञ जी ने 'अनुशासन संहिता' में लिखा है कि आचार्य भिक्षु ने उत्तराधिकार के प्रश्न को अत्यंत गंभीर चिंतन के साथ सुलझाया था। उत्तराधिकारी का निर्णय वर्तमान आचार्य पर ही छोड़ना—यह तेरापंथ की मौलिक मर्यादा है।
विक्रम संवत् 1832 के लिखित में आचार्य भिक्षु ने फरमाया था :
'भारमलजी री इच्छा आवे गुरु भाई अथवा चेलादिक नै टोला रो भार सूंपै ते पिण कबुल छै। ते पिण रीत परंपरा छै, सर्व साध-साध्वियां एकता री आज्ञा मांहै चालणो एहवी रीत बांधी छै।'
सं. 1832 के इस ऐतिहासिक विधान से लेकर सं. 2083 तक (लगभग 251 वर्षों की यात्रा) यह परंपरा अनवरत प्रवाहमान है। यद्यपि एक अवसर पर आचार्य श्री माणकलाल जी युवाचार्य का मनोनयन नहीं कर सके थे, तब संघ ने सामूहिक निर्णय से मुनिश्री डालचंद जी स्वामी को संघ का दायित्व सौंपा था। आज मुनि श्री महावीर कुमार जी को उत्तराधिकारी घोषित देख लगा जैसे वही गौरवशाली इतिहास पुनः जीवंत हो उठा हो।
फलसूंड से प्रारंभ हुई एक प्रेरणादायी यात्रा :
मुझे 1990 के दशक का वह समय याद आता है, जब हम बालोतरा से जैसलमेर जिले के फलसूंड ग्राम जाया करते थे। वहाँ शासनश्री साध्वी रूपां जी, शासनश्री मुनि श्री मोहनलाल जी आमेट, साध्वी श्री राकेश कुमारी जी आदि चरित्रात्माओं के दर्शन का सौभाग्य मिलता था।
एक बार बालोतरा के साधक मंडल (श्री नारायण चंद जी गोगड़ के नेतृत्व में) पर्युषण की उपासना हेतु फलसूंड गया। वहाँ चरित्रात्मा प्रायः कहते कि इस छोटे से ग्राम में संघ के प्रति अगाध समर्पण और निष्ठा है।
साध्वी श्री राकेश कुमारी जी के चातुर्मास के दौरान जब हम शासनसेवी रूपचंद जी श्रीश्रीमाल के नेतृत्व में वहाँ गए, तब साध्वी श्री ने कहा था—
'यहाँ सवाई चंद जी कोचर का पुत्र महावीर बहुत होनहार है और उसकी वैराग्य भावना अत्यंत उच्च है।'
जब हम उस बालक से मिलने उसके विद्यालय पहुँचे, तो शिक्षकों और बच्चों ने उसे छिपा दिया था। गाँव में अफवाह फैल गई थी कि बालोतरा से आए लोग बालक महावीर को साथ ले जाएँगे—शिक्षक अपने इस विलक्षण विद्यार्थी को खोना नहीं चाहते थे।
बाल्यकाल से ही प्रतिभा और वैराग्य :
19 जून 1988 को पिता श्री सवाई चंद जी एवं माता श्रीमती छगनी बाई के घर जन्मे महावीर कुमार जी बचपन से ही कुशाग्र बुद्धि और संस्कारी व्यक्तित्व के धनी थे।
सन् 1999 में आचार्य श्री महाप्रज्ञ जी के दिल्ली चातुर्मास का प्रसंग स्मरणीय है। आध्यात्मिक साधना केंद्र में सवाई चंद जी ने अपने बालक महावीर के साथ आचार्य प्रवर के समक्ष अत्यंत तन्मयता से गीत प्रस्तुत किया। गुरुदेव इतने प्रसन्न हुए कि उन्होंने प्रवचन के दौरान विशेष रूप से मुनि श्री रजनीश कुमार जी के माध्यम से संदेश भेजकर उन्हें बुलवाया। जब पिता-पुत्र की इस जोड़ी ने प्रवचन पंडाल में संगान किया, तो संपूर्ण श्रोता वर्ग भावविभोर हो उठा।
तत्पश्चात रतनगढ़ में अक्षय तृतीया पारणे के अवसर पर भी पूज्य आचार्य महाप्रज्ञ जी ने फलसूंड से आई इस विलक्षण पिता-पुत्र की जोड़ी की सार्वजनिक सराहना की थी।
दीक्षा से युवाचार्य पद तक :
3 मार्च 2002 को जसोल की पावन धरा पर मुनि श्री महावीर कुमार जी के रूप में उनकी दीक्षा संपन्न हुई।
दीक्षा के पश्चात उन्होंने सम्यक् ज्ञान, दर्शन और चरित्र की उत्कृष्ट साधना प्रारंभ की। अपनी निर्मल संयम-साधना, संघनिष्ठा और मेधा के बल पर वे शीघ्र ही आचार्य श्री महाप्रज्ञ जी एवं युवाचार्य श्री महाश्रमण जी के अति निकट आ गए।
१. 16 फरवरी 2012 (कुचौली): आचार्य श्री महाश्रमण जी द्वारा 'श्रेष्ठ श्रुतआराधक' सम्मान।
२. अहिंसा यात्रा का दौर : आचार्य प्रवर ने उनकी क्षमता, स्थिर योग, प्रभावोत्पादक वाग्मिता और आचार-कुशलता को परखते हुए उन्हें निरंतर दायित्व सौंपे।
आचारनिष्ठा, आध्यात्मिकता, अनुशासन, श्रुतसंपन्नता और विनय की कसौटी पर सर्वांशतः खरे उतरने के पश्चात ही 27 जुलाई 2026 को वह ऐतिहासिक शब्द गूंजा— 'आओ, मुनि महावीर!'
स्मृति-पट से : एक पुरानी चर्चा और आज का सत्य :
युवा गौरव बड़े भाईसा पदमचंद जी पटवारी से जब भी संघीय चर्चा होती, भावी नेतृत्व की बात अवश्य उठती। वर्षों पूर्व उन्होंने पूछा था—'मर्यादा कुमार, भावी दायित्व के लिए मुनि श्री महावीर कुमार जी कैसे हैं?' मैंने कहा था—'एकदम योग्य!'
समय चक्र चला, मुनिश्री मुख्यमुनि बने और फिर युवाचार्य पद पर प्रतिष्ठित हुए। मनोनयन के दिन सायं जब पदमचंद जी लाडनूं पहुँचे, तो उन्होंने स्नेहिल उलाहना दिया—'तूने मुझे पहले संकेत नहीं दिया, अन्यथा मैं प्रातः ही उपस्थित रहता!'
हार्दिक अभिनंदन एवं मंगलकामना :
इस गौरवपूर्ण अवसर पर मैं युवाचार्य प्रवर श्री महावीर कुमार जी के चरणों में असीम वंदना अर्पित करता हूँ।
ईश्वर से प्रार्थना है कि वे दीघायु एवं दीर्घागामी संयमी जीवन प्राप्त करें तथा सम्यक् ज्ञान-दर्शन-चरित्र की साधना से संघ को नई ऊँचाइयों तक ले जाएँ। यह केवल एक व्यक्तित्व का अभिनंदन नहीं, बल्कि मर्यादा, अनुशासन और संघीय एकता के उज्ज्वल भविष्य का अभिनंदन है।
युवाचार्य प्रवर श्री महावीर कुमार जी को अनंत-अनंत मंगलकामनाएँ!