मुख मुद्रा : मानो आचार्य भिक्षु की प्रतिकृति

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पदमचंद पटावरी, राजसमंद, पूर्व संपादक, तेरापंथ टाइम्स

मुख मुद्रा : मानो आचार्य भिक्षु की प्रतिकृति

इतिहास बयां करता है कि जितनी भी महान विभूतियां पैदा होती हैं, वे प्रायः छोटे क्षेत्रों एवं साधारण परिवेश से होकर देश-दुनिया के लिए ज्योति-स्तम्भ बन जाती हैं। राजस्थान का जैसलमेर जिला विश्व प्रसिद्ध रेगिस्तान के रूप में जाना जाता है।
इस जिले के सीमावर्ती गांव फलसूंड में आज से ३८ वर्ष पूर्व कोचर परिवार (ओसवाल, तेरापंथी जैन) में एक होनहार शिशु ने जन्म लिया। अपने साथ जन्म-जन्मांतरों की पुण्याई के कारण बचपन में वैराग्य के संस्कार प्रस्फुटित होने लगे। गांव में पधारने वाले जैन साधु-साध्वियों के दर्शन, संपर्क और प्रेरणा के फलस्वरूप बालक महावीर ने जैन साधु दीक्षा स्वीकार करने का दृढ़ निश्चय कर लिया।
दीक्षा, साधना और पूज्य प्रवरों का वरदहस्त
1. लघु वय में दीक्षा : तेरापंथ धर्म संघ के महाप्रतापी आचार्य श्री महाप्रज्ञ एवं युवाप्रचेता युवाचार्य श्री महाश्रमणजी की पारखी नजर से अनुप्राणित बालक महावीर ने मात्र १३ वर्ष की लघु वय में परमश्रद्धेय आचार्य महाप्रज्ञजी के कर-कमलों से जसोल (बाड़मेर) में जैन भागवती दीक्षा स्वीकार की।
2. चतुर्मुखी सफलता : ग्रामीण परिवेश में पले-पुसे बाल साधु ने अपने वैराग्य भाव को पुष्ट करते हुए ज्ञान, ध्यान, स्वाध्याय और सेवा में आशातीत सफलताएं अर्जित कीं और बाल साधुओं की अग्रिम पंक्ति में प्रभावी स्थान हासिल कर लिया।
3. पूज्य प्रवर के उद्गार : बाल संत के प्रति आगम पठन, कंठस्थीकरण एवं स्वाध्याय के संदर्भ में पूज्य प्रवर के श्रीमुख से निकला था— 'मेरे पास महावीर और मनन जैसे उदीयमान बाल संत हैं।'
भविष्य के संकेत और दायित्व-बोध–
4. 'निहाल' होने का आशीर्वाद (२०१०) : सिवाणची-मालानी यात्रा में फलसूंड प्रवास के दौरान सायंकालीन वंदना के समय आचार्य श्री महाश्रमणजी ने मुनि महावीर के मस्तक पर हाथ रखकर फरमाया— 'महावीर, तुम इसी प्रकार निरअतिचार साध्वाचार को पुष्ट करते रहोगे तो निहाल हो जाओगे।' (उसी समय मैंने अपनी डायरी में नोट किया था कि आज धर्मसंघ की बारहवीं पीठी का शुभ भविष्य सुनिश्चित हो गया है)।
5.'मुख्य मुनि' पद एवं उत्तराधिकार: नेपाल (बिराटनगर) प्रवास में आचार्य प्रवर ने मुनि महावीर को 'मुख्य मुनि' का संबोधन दिया। तत्पश्चात असम की वादियों में इस संबोधन को पद में परिवर्तित कर वरिष्ठता के क्रम में नम्बर वन की महत्ता प्रदान की।
6. सम्मान की कड़ियां : सरदारशहर में दीक्षा स्वर्ण जयंती के अवसर पर गुरुदेव ने स्वयं धारण की हुई कलापूर्ण माला अपने हाथों से मुख्य मुनि महावीर को पहनाई। इसके बाद प्रवचन में कुर्सी, महासभा तथा बहुश्रुत परिषद के संयोजक का सम्माननीय पद जैसी कड़ियां जुड़ती गईं।
ऐतिहासिक कीर्तिमान और शुभ संयोग
7. पिता की विद्यमानता में ऐतिहासिक मनोनयन : अतीत से लेकर आज तक एक प्रश्न अनुत्तरित जैसा रहा कि कोई भी आचार्य अपने पिताश्री की विद्यमानता में दीक्षित होकर युवाचार्य पद पर आसीन नहीं हुए। मुनि महावीर के पिताश्री ने स्वयं प्रेरणा देकर पुत्र को दीक्षित कराया और लाडनूं में आषाढ़ सुदी में उन्हें युवाचार्य पद पर मनोनीत होते देखा। आचार्य श्री महाश्रमणजी ने यह पद प्रदान कर अनुत्तरित प्रश्नों को उत्तरित करने के साथ नया कीर्तिमान स्थापित कर दिया।
8. त्रिवेणी संगम (दुर्लभ संयोग):
युवाचार्य श्री महावीर की दीक्षा के २५ वर्ष पूर्ण (दीक्षा रजत जयंती)।
परम श्रद्धेय आचार्य श्री तुलसी के जन्म त्रिशताब्दी वर्ष के समापन 'बोधि दिवस' के दिन युवाचार्य पद का मनोनयन।
योगक्षेम वर्ष के द्वितीय चरण का आयोजन।
आचार्य भिक्षु की प्रतिकृति एवं शुभाशंसा–
9. आकृति एवं प्रतिभा : मैं युवाचार्य श्री महावीर को बार-बार कहता रहता हूं कि आपकी आकृति/मण्डल आचार्य भिक्षु की प्रतिकृति जैसी है। मुझे गर्व है कि आप गौर वर्ण के हैं। वैसे तो तेरापंथ का हर आचार्य भिक्षु का ही स्वरूप होता है और यह गौरवमयी परंपरा सदियों तक निर्विघ्न चलती रहेगी।
10. भविष्य का योगसूत्र : दो-तीन वर्ष पूर्व एक लंबे पत्र में मैंने संघ-हित के जो व्यक्तिगत विचार प्रेषित किए थे, वे आपके भविष्य के दायित्व-बोध को प्रभावी बनाने में योगसूत्र बनेंगे।
प्रसन्नता का विषय है कि अखिल भारतीय तेरापंथ युवक परिषद अपना पहला हक मानकर तरुणाई के प्रहरी युवाचार्य श्री महावीर को 'तेरापंथ' अभिनंदन ग्रंथ/विशेषांक समर्पित करने जा रही है। मंगल कामना है कि आप संघ में नए कीर्तिमान स्थापित करें।