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श्रेष्ठ श्रुताराधक डा. महावीर स्वीकारो वंदन
युवराज तुम्हारा अभिनंदन
श्रेष्ठ श्रुताराधक डा. महावीर स्वीकारो वंदन ॥
किसने सोचा किसने आंका बचपन में तेरी दिव्य शक्ति को,
महाश्रमण की दूरदृष्टि ने पहचाना तेरी शक्ति-भक्ति को।
गांभीर्य और औदार्य निराला भर देता जन-जन में पुलकन ॥
तलहटी से शिखर तक पहुँचाया तुमको महाश्रमण ने,
ऊर्जा संप्रेषित कर काबिल किया तुम्हें ज्योतिचरण ने।
तलबगार हम अनुकंपा के तुम हो शीतल सुरभित चंदन ॥
प्रबुद्ध चेत्ता आगम वेत्ता मिला सुरीले कंठों का वरदान,
सद्गुण मुक्ताहार सजाकर बने श्रेष्ठ गुण रत्न निधान।
संघ चमन के हर पल्लव को देते रहना अमृत सिंचन ॥
अप्रतिप व्यक्तित्व तुम्हारा जन-जन के मन भाया है,
मंगलमय इन पुण्य क्षणों में पोर-पोर विकसाया है।
नंदीघोष बजायें करते शुभ भावों से हम वर्धापन ॥