शक्ति, संकल्प और समर्पण: तेरापंथ इतिहास का स्वर्णिम एवं अभूतपूर्व तप अनुष्ठान

गुरुवाणी/ केन्द्र

आषाढ़ शुक्ला 11, योगक्षेम वर्ष (2026)

शक्ति, संकल्प और समर्पण: तेरापंथ इतिहास का स्वर्णिम एवं अभूतपूर्व तप अनुष्ठान

तेरापंथ धर्म संघ के लिए योगक्षेम वर्ष (2026) अनेक आध्यात्मिक उपलब्धियों की सौगात लेकर आया है। परम पूज्य महातपस्वी आचार्य श्री महाश्रमणजी के मंगल सान्निध्य में आराधना की नई दिशाएं उद्घाटित करने वाला यह योगक्षेम वर्ष भैक्षव शासन के गौरव को शिखर चढ़ा रहा है। एक साथ 12 साध्वियों के द्वारा की गई मासखमण की तपस्या ने तेरापंथ धर्म संघ के तपोनिष्ठान कीर्तिमानों की श्रृंखला में एक और नये अध्याय का सृजन किया है।
आषाढ़ शुक्ला 11 की शुभ घड़ी में साध्वियों की पाँच पचरंगी तप का शुभारम्भ हुआ। इसी पचरंगी तप में साध्वियों ने अपने कदम आगे बढ़ाए और मासखमण तक पहुंचा दिया। सभी तपस्विनी साध्वियों ने अनुभव किया कि यह परम श्रद्धेय आचार्य प्रवर के शक्तिशाली आभामण्डल, ऊर्जा संप्रेषित करने वाले मंगल पाठ का प्रभाव था कि असंभव सा लगने वाला कार्य भी संभव हो गया।
स्वयं आचार्य प्रवर ने मुख्य प्रवचन कार्यक्रम में इस तपस्या को 'अभूतपूर्व तपस्या' कह कर तपस्विनी साध्वियों पर अमृत वर्षा की और शक्ति का संचार किया।
इस अभूतपूर्व तपस्या की पृष्ठभूमि में एक और विशिष्ट शक्ति का योगदान रहा, वह शक्ति है– श्रद्धेय साध्वी प्रमुखा श्री जी की इच्छाशक्ति, प्रेरणाशक्ति। पचरंगी तपस्या के दौरान मातृहृदया साध्वी प्रमुखा श्री जी ने अपनी भावना व्यक्त की कि योगक्षेम वर्ष में साध्वी समाज में कम से कम 13 मासखमण हो। उनका यह स्वप्न शीघ्र ही साकार हो गया, हो भी क्यों नहीं, गुरुकुल वास में एक साथ 12 मासखमण एवं 1 मासखमण बहिर्विहार में, इसप्रकार एक साथ तेरह मासखमण का होना वास्तव में शक्तिप्रदाता, महातपस्वी, परम श्रद्धेय आचार्य प्रवर की प्रत्यक्ष ऊर्जा और शक्ति का ही प्रतिफलन है।
22 अगस्त मध्याह्न प्रज्ञा निलयम के विशाल प्रांगण में श्रद्धेया साध्वी प्रमुख श्री जी के पावन सान्निध्य में इस ऐतिहासिक तपस्या का अभिनंदन समारोह आयोजित किया गया। इस समारोह को लेकर सबके मन में एक विशेष उत्साह नजर आया। नियत समय से पूर्व ही अपना-अपना स्थान आरक्षित करने की दौड़ सी शुरू हो गई। प्रज्ञा निलयम का प्रांगण श्वेतमय हो गया। श्रावक-श्राविकाओं का उल्लास भी देखते ही बन रहा था। इस उमंग और उल्लास के कारण ही प्रज्ञा निलयम का विशाल प्रांगण छोटा पड़ने लगा। पहली मंजिल की सीढ़ियां और बरामदे भी आरक्षित हो गए। लोगों ने ऊपर की मंजिल से खड़े रहकर भी कार्यक्रम को देखने का आनंद उठाया।
कार्यक्रम में आकर्षण का केंद्र थीं - साध्वी प्रमुखा श्री जी के ठीक सामने बैठी तपस्विनी 12 साध्वियों की कतार। 12 साध्वियाँ हैं जिन्हें इस अद्भुत तप अनुष्ठान में सहभागिता दर्ज कराने का सौभाग्य प्राप्त हुआ–
१. साध्वी लब्धिश्री जी
२. साध्वी संवरप्रभा जी
३. साध्वी कान्तप्रभा जी
४. साध्वी राजश्री जी
५. साध्वी मर्यादा प्रभा जी
६. साध्वी सिद्धान्त श्री जी
७. साध्वी समीक्षा प्रभा जी
८. साध्वी हेमप्रभा जी
९. साध्वी भव्यप्रभा जी
१०. साध्वी विशालप्रभा जी
११. साध्वी रुचिप्रभा जी
१२. साध्वी गौतमप्रभा जी
कार्यक्रम की मंगल शुरुआत प्रज्ञा निलयम में प्रवासित साध्वियों के मंगलाचरण से हुई। बड़े ही सुनिश्चित तरीके से विशाल समाज ने अपने भावों की प्रस्तुति दी। साध्वियों ने प्रस्तुति में सूत्रशैली का अनुसरण किया। प्रज्ञा निलयम, अमृतायन, समाधिवरम और अमृतवाणी में प्रवासित साध्वियों ने अपने अपने प्रवासस्थल की ओर से एक-एक सामूहिक गीत की प्रस्तुति दी। साध्वी आगमप्रभा जी, साध्वी कृतार्थप्रभा जी, साध्वी मध्यस्थप्रभा जी और समणी सुमनप्रज्ञा जी ने रोचक कार्यक्रम के द्वारा तप अभिनंदन किया।
समणी वृंद ने भी गीत के माध्यम से भावपूर्ण अभिव्यक्ति दी। श्रावक-श्राविका समाज का प्रतिनिधित्व महिलामंडल ने अपनी गीतिका के माध्यम से किया।
साध्वी जिनबाला जी, साध्वी संवेगश्री जी, साध्वी शीतलयशा जी, साध्वी उज्ज्वलरेखा जी, साध्वी संपूर्णयशा जी, साध्वी हेमयशा जी, साध्वी दर्शितप्रभा जी, साध्वी कीर्तिलता जी, साध्वी वर्धमानश्री जी ने अपने-अपने वक्तव्य में तपस्विनी साध्वियों का गुणानुवाद करते हुए उनके तप का श्रेय परम पावन आचार्य प्रवर के ऊर्जस्वल आभामंडल, साध्वी प्रमुखा श्री जी की वात्सल्य पूरित प्रेरणा और साध्वी वर्याजी के प्रोत्साहन को दिया। शासन गौरव साध्वी श्री राजीमती जी एवं शासन गौरव साध्वी श्री कनकश्री जी ने भी भावपूर्ण शब्दों में तपस्विनी साध्वियों के प्रति मंगल कामना व्यक्त की।
आदरणीय साध्वीवर्याजी ने अपने वक्तव्य में तपस्वी को सागर, भुजंग और रजत—इन तीन उपमाओं से उपमित करते हुए कहा—
१. तपस्वी की साधना सागर के समान गम्भीरता लिए होती है।
२. भुजंग जिसप्रकार हर छह माह में अपनी केंचुली का त्याग कर देता है वैसे ही तपस्वी कर्मों का त्याग करते हुए साधना के पथ पर आगे बढ़ता रहता है।
३. रजत ज्यों अग्नि में तप कर उज्ज्वलता प्राप्त करता है। उन्होंने तपस्यारत साध्वियों के तप अनुमोदन करते हुए मंगल कामनाएं दीं।
मातृहृदया साध्वी प्रमुखा श्री जी ने अपने मंगल उद्बोधन में इस अभूतपूर्व तप का सम्पूर्ण श्रेय वीतरागकल्प आचार्य प्रवर को समर्पित करते हुए कहा— 'आचार्य प्रवर ने एक दिन फरमाया—'संत तपस्या में आगे हैं।' मुझे लगा यह साध्वियों के लिए तपस्या के क्षेत्र में आगे बढ़ने की प्रेरणा है। मैंने चिंतन किया कि साध्वियों को तप में आगे बढ़ना चाहिए। साध्वियों ने मेरे इस चिंतन को मूर्त रूप दे दिया। इस तप अनुष्ठान ने गुरुदेव तुलसी के वचनों को सत्यापित कर दिया—तपस्या श्रम साधना संकल्प में पीछे नहीं।
साध्वी प्रमुखा श्री जी ने अपनी बात को आगे बढ़ाते हुए कहा कि सब इस तपस्या का निमित्त उन्हें मान रहे हैं लेकिन वास्तव में इसमें पूज्यप्रवर की प्रेरणा काम कर रही है। आपने फरमाया—तपस्या की निष्पत्ति में तीन बातों का योगदान होता है
१. प्रकृति की अनुकूलता
२. गुरु का आशीर्वाद
३. मनोबल और धृतिबल
तपस्विनी साध्वियों को सौभाग्य से ये तीनों ही अनुकूलताएं प्राप्त हो गयीं। उन्होंने तपस्विनी साध्वियों के आत्मबल, मनोबल और संकल्पबल का उल्लेख करते हुए कहा कि असाता होने पर भी वे बढ़ते-बढ़ते अपनी मंजिल तक पहुंच गयीं। उन्होंने सम्पूर्ण साध्वी समाज को तप के साथ-साथ ज्ञान और आचार के क्षेत्र में भी आगे बढ़ने की प्रेरणा दी। साध्वी प्रमुखा श्री जी ने तपस्या काल में निर्मित सौहार्दपूर्ण वातावरण और सेवा भावना के लिए आत्म-तोष व्यक्त किया।
इस प्रकार कार्यक्रम का वातावरण तप, त्याग और आध्यात्मिक ऊर्जा से परिपूर्ण था। ऐसा प्रतीत हो रहा था मानो यह १२ साध्वियों के तप का अभिनंदन नहीं बल्कि उनके आत्मबल, संघबल, गुरुबल, संकल्पबल का अभिनंदन था। योगक्षेम वर्ष २०२६ में सम्पन्न ये १२ साध्वियों के मासखमण का यह सामूहिक तप तेरापंथ के इतिहास में एक स्मरणीय और विशिष्ट प्रसंग बन गया। इस भव्य-नव्य नजारे को देखकर सभी विस्मयाभिभूत हुए।