अशुभ कर्मों का अंत-शुभ जीवन का प्रारंभ-लोगस्स कल्प

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गंगाशहर।

अशुभ कर्मों का अंत-शुभ जीवन का प्रारंभ-लोगस्स कल्प

तेरापंथ सभा के तत्वाधान में साध्वी त्रिशलाकुमारी जी के सान्निध्य में “लोगस्स कल्प अनुष्ठान” का आयोजन किया गया। साध्वी त्रिशलाकुमारी जी ने सभा को संबोधित करते हुए कहा - आज हर व्यक्ति समस्या से ग्रस्त है। कोई शारीरिक समस्या से परेशान है तो कोई मानसिक समस्या से। कोई आर्थिक समस्या से जूझ रहा है तो कोई पारिवारीक समस्या से आक्रान्त है। शारीरिक मानसिक समस्या वाला डॉक्टरों के चक्कर लगता है तो आर्थिक व पारिवारीक समस्या वाला ज्योतिषियों देवी देवताओं के पास अपनी समस्याओं का समाधान खोजता है। साध्वीश्री ने कहा सबसे पहले हमें ये समझना होगा कि हमारे जीवन में समस्या आती क्यों है ? यदि हम कर्मशास्त्र की दृष्टि से देखे तो समस्या का मूल कारण है हमारे अशुभ कर्म। जब अशुभ कर्म का उदय होता है तो हमारे जीवन में समस्या आती है। अशुभ कर्मो को दूर करने का एक मात्र साधन है अध्यात्मा।
हमारे तीर्थंकरों ने गणधरों ने आचार्यों ने ऐसे-ऐसे मंत्रो का तंत्रो का निमार्ण किया है जिनके द्वारा न केवल समस्याओं से मुक्त हो सकते अपितु शारीरिक मानसिक दृष्टि से शक्तिशाली भी बन सकते है। आज हम “लोगस्स कल्प” का अनुष्ठान करने जा रहे हैं। वर्तमान परिपेक्ष्य में यदि देखा जाए तो लोगस्स हमारे लिए कल्पवृक्ष चिन्तामणि रत्न समान है। इसमें चौबीस तीर्थकरों की स्तुति की गई है। चैबीस तीर्थकरों की स्तुति करने से हमारे अशुभ कर्म तो क्षय होते ही है साथ-साथ हमारे आस-पास की नेगेटीव एनर्जी भी दूर होती है।
हमारे आस-पास का वातावरण शुद्ध होता है। कोई भी अनुष्ठान सफल कब होता है ? जब उसके प्रति हमारी दृढ़ आस्था होती है। दृढ़ आस्था के साथ किसी मंत्र का हम प्रयोग करते है तो निश्चित रूप से अपना प्रभाव दिखाता है। साध्वीश्रीजी ने बहुत ही सुन्दर ढंग से अनुष्ठान करवाया। पूरा वातावरण मंत्रमय बन गया। लोगों ने बहुत ही उत्साह के साथ इस अनुष्ठान में भाग लिया।