आचार्य भिक्षु अभय पुरुष थे

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सिकंदराबाद।

आचार्य भिक्षु अभय पुरुष थे

पूज्य युगप्रधान आचार्य श्री महाश्रमणजी के सुशिष्य मुनि दीप कुमारजी एवं सहवर्ती संत मुनि काव्य कुमारजी के सानिध्य में समारोह आयोजित किया गया। आयोजन तेरापंथी सभा सिकंदराबाद द्वारा किया गया। इस अवसर पर उपस्थित श्रद्धालुओं ने आचार्य श्री भिक्षु के चरणों में श्रद्धा अर्पित करते हुए उनके त्याग, तप, अनुशासन एवं शुद्ध साधना के आदर्शों को जीवन में अपनाने का संकल्प लिया। मुनि दीप कुमारजी ने अपने प्रेरक उद्बोधन में कहा कि 'आचार्य भिक्षु अभय पुरुष थे। उन्होंने सत्य और सिद्धांतों के लिए कभी किसी प्रकार का समझौता नहीं किया। विपरीत परिस्थितियों में भी वे निर्भीक रहकर धर्म की शुद्धता, साधना की पवित्रता और मर्यादा की रक्षा में अडिग रहे। उनका जीवन त्याग, तप, आत्मानुशासन और निडरता का अनुपम उदाहरण है। आचार्य भिक्षु का व्यक्तित्व हमें सिखाता है कि सिद्धांतों पर दृढ़ रहकर ही जीवन को महान बनाया जा सकता है।'
आचार्य श्री भिक्षु केवल तेरापंथ धर्मसंघ के संस्थापक ही नहीं, बल्कि सत्य, साहस, आत्मानुशासन और सिद्धांतनिष्ठा के साकार प्रतीक थे। उनका सम्पूर्ण जीवन हमें यह संदेश देता है कि जो व्यक्ति सत्य के मार्ग पर दृढ़ रहता है, उसे किसी भी परिस्थिति से भयभीत होने की आवश्यकता नहीं होती। आचार्य भिक्षु वास्तव में अभय पुरुष थे। उन्होंने कहा कि आचार्य भिक्षु ने अपने जीवन में कभी भी सुविधा, लोकप्रियता अथवा किसी प्रकार के दबाव के कारण सिद्धांतों से समझौता नहीं किया। जब-जब धर्म की शुद्धता, साधना की पवित्रता और मर्यादाओं की रक्षा का प्रश्न आया, तब-तब उन्होंने अद्भुत निर्भीकता, आत्मबल और अटल संकल्प का परिचय दिया। विपरीत परिस्थितियाँ, विरोध, संघर्ष और अनेक प्रकार की कठिनाइयाँ भी उनके कदमों को डिगा नहीं सकीं। वे सत्य के पथ पर अडिग रहे और अपने आचरण से यह सिद्ध कर दिया कि सिद्धांतों पर चलने वाला व्यक्ति कभी पराजित नहीं होता। मुनि काव्य कुमारजी ने अपने उद्बोधन में कहा कि 'आचार्य भिक्षु केवल एक महान संत ही नहीं, बल्कि युगदृष्टा एवं क्रांतिकारी चिंतक थे। उन्होंने धर्म को आडंबरों से मुक्त कर आत्मशुद्धि, संयम, समता और साधना का सरल एवं वैज्ञानिक मार्ग प्रदान किया।