गुरुवाणी/ केन्द्र
जिज्ञासा से उपजेगा ज्ञान, प्रतिपृच्छना से मिटेगा अज्ञान : आचार्यश्री महाश्रमण
जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के एकादशमाधिशास्ता, अखण्ड परिव्राजक, महातपस्वी, युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमण जी ने जैन विश्व भारती की सुधर्मा सभा में निर्धारित विषय ‘प्रतिपृच्छना से क्या मिलेगा?’ पर आगम आधारित देशना प्रदान करते हुए चतुर्विध धर्मसंघ को ज्ञान व विवेक से आप्लावित किया।
स्वाध्याय के अंग, विशुद्धि का अर्थ और कांक्षा मोहनीय कर्म का क्षय :
१. स्वाध्याय के अंग व विशुद्धि: पूज्य आचार्यश्री ने फरमाया कि स्वाध्याय के पाँच प्रसिद्ध अंगों में पहला अंग 'वाचना' और दूसरा अंग 'पृच्छना' है। प्रतिप्रश्न (प्रतिपृच्छना) करने से सूत्र, अर्थ और तदुभय (दोनों) विशुद्ध बनते हैं। जब तक मन में शंका, संदेह और अस्पष्टता रहती है, तब तक विषय अशुद्ध रहता है। यहाँ विशुद्धि का सही अर्थ विषय की 'स्पष्टता' से है।
२. जिज्ञासा ही ज्ञान की जननी: प्रश्नकर्ता के प्रश्न करने और उत्तरदाता द्वारा योग्य उत्तर देने से संदेह दूर होता है। संस्कृत में जिज्ञासा को ज्ञान की जननी कहा गया है। जब व्यक्ति विषय पर ध्यान देता है और कुछ ग्रहण करता है, तभी मन में जिज्ञासा पैदा होती है। विद्यार्थी का परम धर्म ही जिज्ञासा करना है।
३. कर्म का विच्छेद व ज्ञान विशोधन : आगम में बताया गया है कि पूछने वाला प्रतिपृच्छना से कांक्षा मोहनीय कर्म का विच्छेद करता है। इससे ज्ञान का विशोधन होता है
और ज्ञान पूरी तरह विशुद्ध व निर्मल बन जाता है।
दर्शनों की परीक्षा, आगमिक संवाद और राजा प्रदेशी का प्रसंग :
१. दर्शनों की परीक्षा व तर्क: दुनिया में अनेक दर्शन और संप्रदाय हैं। सामान्य व्यक्ति के मन में जिज्ञासा होती है कि कौन सा दर्शन सही है, किसे स्वीकार करें और किसे गुरु बनाएं? जैन शासन के विभिन्न मतों में भी व्यक्ति स्वयं अध्ययन और परीक्षा करता है। उत्तर देने वाला तर्क और हेतु से बात समझाने का प्रयास करता है।
२. आगमों के महान उदाहरण: प्रतिपृच्छना अध्यापन का ही एक अंग है। उत्तरज्झयणाणि आगम के २३वें और २९वें अध्ययन में प्रश्नोत्तर के रूप में अनेक बातें बताई गई हैं, जहाँ गौतम स्वामी के प्रश्नों पर भगवान महावीर ने समाधान प्रदान किए।
३. राजप्रश्नीय आगम व नास्तिक से आस्तिक बनने का प्रसंग: 'राजप्रश्नीय आगम' में राजा प्रदेशी के प्रश्नों पर कुमार श्रमण केशी स्वामी ने अत्यंत सटीक और धारदार उत्तर दिए। जब प्रश्नकर्ता और उत्तरदाता दोनों विद्वान हों, तो सुनने वाली संपूर्ण परिषद् को महान लाभ मिलता है। कुमार श्रमण केशी के तर्कों से प्रभावित होकर पहले नास्तिक रहा राजा प्रदेशी भी धर्म का सच्चा अनुयायी बन गया।
स्वाध्याय योग और उत्तरदाता की योग्यता :
१. संदेह निवारण महान उपकार: पूज्य प्रवर ने प्रेरणा दी कि हम भी 'स्वाध्याय योग' द्वारा अपने आप को ज्ञान के क्षेत्र में इतना आगे बढ़ाने का प्रयास करें कि आवश्यकता पड़ने पर प्रश्नकर्ता को सही समाधान देकर उसके संदेह का निवारण कर सकें। यह बहुत बड़े उपकार का कार्य है।
२. सटीक व संतोषजनक उत्तर: उत्तरदाता को उत्तर देने से पहले स्वयं अपने उत्तर से संतुष्ट होना चाहिए; कभी भी गोल-मोल उत्तर नहीं देना चाहिए। जब प्रश्नकर्ता और उत्तरदाता दोनों योग्य होते हैं, तभी श्रेष्ठ समाधान प्राप्त होता है।