गुरुवाणी/ केन्द्र
अपनी भूल स्वीकारो, क्षमा से जीवन संवारो : आचार्यश्री महाश्रमण
जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के एकादशमाधिशास्ता, अहिंसा यात्रा प्रणेता, महातपस्वी, युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमण जी ने उत्तरज्झयणाणि आगम के माध्यम से चतुर्विध धर्मसंघ को ‘क्षमा से क्या मिलेगा?’ विषय पर अमृत देशना प्रदान की।
पर्युषण-संवत्सरी का आह्वान और निंदा का उत्तर :
१. पर्युषण पर्व की साधना : पूज्य आचार्यश्री ने फरमाया कि १० श्रमण धर्मों में उत्तम क्षमा एक धर्म है। ८ सितम्बर से पर्युषण पर्व प्रारंभ हो रहा है और १५ सितम्बर को भगवती संवत्सरी का आगमन है। इन आठ दिनों में गृहस्थ सामायिक, स्वाध्याय, जप, मौन, ध्यान, अनुप्रेक्षा और प्रतिक्रमण में अधिक से अधिक समय बिताएं। संवत्सरी पर सभी से खमतखामणा कर लेना चाहिए।
२. निंदा का उत्तर कर्मों से : यदि कोई नुकसान करे, अपशब्द बोले या निंदा करे तो सहन करें। निंदा का उत्तर जुबान या लेखनी से देने के बजाय हमेशा अपने अच्छे कार्यों से देना चाहिए। हमारी दिशा और गति ठीक हो तो आज निंदा करने वाला व्यक्ति भी कल प्रशंसा करने वाला बन सकता है।
क्षमा के ४ फल, बड़ों का विनय और विवाद निवारण :
१. भूल स्वीकारना और सहनशीलता : कोई गलती या कटु व्यवहार हो जाए तो सरल भाव से भूल स्वीकार कर पश्चाताप करें और खमतखामणा करें। क्षमावान व्यक्ति के मन में शांति रहने से बोलने वाला व्यक्ति भी उसी प्रकार शांत हो जाता है, जैसे सूखे मिट्टी वाले मैदान पर गिरी आग अपने आप बुझ जाती है।
२. सक्षमता में शांति और बड़ों का विनय : सामर्थ्य होने पर भी शांत रहना बड़प्पन है। साधु जीवन में छोटे साधु रत्नाधिकों का विनय करें। इसी प्रकार लौकिक जीवन में भी गृहस्थों को माता-पिता व बड़ों के सामने उद्दंडता नहीं करनी चाहिए। परिवार में संपत्ति या बंटवारे का प्रसंग आने पर कोर्ट-कचहरी जाने के बजाय आपस में बैठकर समाधान कर लेना चाहिए।
३. क्षमा से ४ महान उपलब्धियां: आगम के अनुसार खमतखामणा से बैर समाप्त होता है और जीव १. प्रसन्नता (प्रह्लाद भाव), २. सर्व जीव मैत्री, ३. भाव-विशोधि और ४. निर्भयता (अभय) प्राप्त कर लेता है।