गुरुवाणी/ केन्द्र
सरल भाव से मांगो प्रायश्चित्त, निर्मल बनेगा सम्यक्त्व और चित्त : आचार्यश्री महाश्रमण
जैन श्वेतांबर तेरापंथ धर्मसंघ के एकादशमाधिशास्ता, भगवान महावीर के प्रतिनिधि, महातपस्वी, युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमण जी ने जैन विश्व भारती परिसर में ‘प्रायश्चित्त से क्या मिलेगा?’ विषय पर चतुर्विध धर्मसंघ को पावन अमृत देशना प्रदान की।
'निशीथ' आगम, मर्यादावली और प्रायश्चित्त का विधान :
१. प्रायश्चित्त संहिता का आगम : पूज्य आचार्यश्री ने फरमाया कि धार्मिक साधना के साथ प्रायश्चित्त की विद्या अभिन्न रूप से जुड़ी है। जिस प्रकार आचार का विधान है, उसी प्रकार उसके उल्लंघन पर प्रायश्चित्त का भी प्रावधान है। ३ वर्ष की साधु पर्याय पूर्ण होने पर 'निशीथ' आगम पढ़ा जाता है, जो साधुओं के लिए प्रायश्चित्त संहिता की तरह है।
२. दोषों की आलोयना : मर्यादावली में आचार के साथ-साथ अतिक्रमण होने पर प्रायश्चित्त की विधि दी गई है। बड़े दोषों का प्रायश्चित्त आचार्य या बड़े संतों से तथा छोटे दोषों की आलोयना अग्रणी संतों के समक्ष ली जाती है।
प्रायश्चित्त का अर्थ और निष्पादन के ३ चरण :
१. तप और चेतना का संयोग : 'प्राय' का अर्थ है 'तप' और 'चित्त' का अर्थ है 'जीव या चेतना'। तप और चेतना का यह योग ही आत्मा को पाप कर्मों से मुक्त कर निरतिचार (निर्दोष) बनाता है।
२. प्रायश्चित्त प्रक्रिया के ३ अनिवार्य चरण :
अ. ऋजुता (सरलता) : गुरु के समक्ष बिना किसी दुराव-छिपाव के अपनी त्रुटि को निष्कपट भाव से प्रकट करना।
ब. स्वीकारोक्ति : प्रायश्चित्तदाता गुरु द्वारा दिए गए तप या दंड को सहर्ष स्वीकार करना।
क. क्रियान्विति : बताए गए प्रायश्चित्त का पूर्ण निष्ठा से पालन करना।
मोक्ष मार्ग और मार्ग-फल की विशुद्धि:
१. आराधक बनने की कुंजी : शास्त्रानुसार जो सम्यक प्रकार से प्रायश्चित्त स्वीकार करता है, वह मोक्ष मार्ग (ज्ञान, दर्शन, चरित्र और तप) तथा उसके फल को विशुद्ध कर लेता है। यदि दोष की आलोचना समय पर न ली जाए, तो आगे का आध्यात्मिक पथ धुंधला हो जाता है।
२. गृहस्थों व साधकों के लिए पावन पाथेय : साधु हो या श्रावक, नियम या व्रत में दोष लगते ही समय पर प्रायश्चित्त मांगकर निर्वहन करना चाहिए। इससे कषायों की मंदता होती है, सम्यक्त्व निर्मल बनता है और साधक विराधक न बनकर मोक्ष का आराधक बन जाता है।