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तपस्या से होती है आत्मोन्नति,आत्मशुद्धि
युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमणजी के विद्वान सुशिष्य मुनि दीप कुमारजी के पावन सान्निध्य में आयोजित प्रातःकालीन प्रवचन के दौरान तीन श्राविकाओं ने श्रद्धा, संकल्प और आत्मबल के साथ ग्यारह उपवास (निराहार तप) का प्रत्याख्यान ग्रहण किया। प्रवचन में मुनि दीप कुमारजी ने कहा कि श्रावण केवल वर्षा का मौसम नहीं, बल्कि आत्मशुद्धि, संयम और तप का भी श्रेष्ठ काल है। जैन संस्कृति में तप का स्थान अत्यंत ऊँचा है। इतिहास साक्षी है कि असंख्य महापुरुषों ने तप के माध्यम से कर्मों का क्षय कर आत्मोन्नति की दिशा में महान उपलब्धियाँ प्राप्त की हैं।' उन्होंने आगे कहा, तपस्या वही कर सकता है जिसके भीतर अटूट मनोबल, दृढ़ संकल्प और आत्मविश्वास हो।
आज के युग में, जहाँ चारों ओर भोग-विलास और स्वाद के आकर्षण सहज उपलब्ध हैं, ऐसे वातावरण में लगातार ग्यारह दिन तक निराहार रहकर तप करना साधारण बात नहीं, बल्कि आत्मशक्ति, संयम और साधना का अद्वितीय उदाहरण है। मुनिश्री ने स्पष्ट किया कि तप कभी प्रदर्शन, परम्परा निभाने या किसी दबाव का विषय नहीं है। यह पूर्णतः स्वेच्छा से, आत्मशुद्धि और कर्मनिर्जरा की पवित्र भावना से किया जाने वाला आध्यात्मिक अनुष्ठान है।
गुरु कृपा से सिकंदराबाद की तप परंपरा निरंतर समृद्ध हो रही है। यह प्रेरणा आने वाले समय में और अधिक साधकों को तप के पथ पर अग्रसर करेगी। प्रवचन के समापन पर मुनि दीप कुमारजी ने तप की महिमा पर आधारित अपनी स्वरचित तप-कविता की अत्यंत भावपूर्ण प्रस्तुति दी। इस अवसर पर मुनि काव्य कुमारजी ने भी तप की महत्ता पर प्रेरणास्पद विचार व्यक्त करते हुए कहा कि तप आत्मबल को जागृत करने और जीवन को आध्यात्मिक ऊँचाइयों तक पहुँचाने का सशक्त माध्यम है।