रचनाएं
संघ के भावी राम को वंदन–अभिनंदन
'अभिनंदन उजले प्रभात का, नूतन युग के सूत्रपात का।
पौरुष, मंगल प्रभात का, नंदनवन के नवयुवराज का।।'
तेरापंथ धर्मसंघ एक कालजयी धर्मसंघ है। इसकी एकरूपता ही इस संघ का सुरक्षाकवच, सुरक्षाद्वार है। इस संघ में नित्य नवीनता के इतिहास लिखे जाते हैं। आचार की निर्मलता, पवित्रता इस धर्मसंघ की बुनियाद है। एक-एक परंपरा, एक गुरु-नेतृत्व इस संघ का प्राण है, त्राण है। ऐसे प्राणवान धर्मसंघ की रीति-नीति, परंपरा और संस्कार भविष्य को उज्ज्वल बनाये रखने के लिए अपनी एक अलग पहचान रखते हैं। आचार्य भिक्षु की सूझ-बूझ व मेधा का ही परिणाम है कि यह धर्मसंघ उन परंपराओं, मर्यादाओं का पालन करता हुआ नित नये-नये कीर्तिमान बनाने में सतत गतिमान है।
इस संघ के यशस्वी आचार्यों ने अपनी तपस्या, साधना एवं श्रम की बूंदों से इसे सींचकर आगे बढ़ाया। इसमें आचार्य का स्थान तो सर्वोपरि है ही, उन्हीं के द्वारा चयनित युवाचार्य का स्थान भी अत्यंत महत्वपूर्ण होता है। उसी परंपरा का निर्वाह करते हुए वर्तमान में महातपस्वी, संतशिरोमणि जैन जगत् के उज्ज्वल नक्षत्र, युगप्रधान आचार्य महाश्रमण जी ने आषाढ़ शुक्ला त्रयोदशी को शुभवार, शुभनक्षत्र, शुभयोग, शुभघड़ी, शुभमुहूर्त के साथ युवाचार्य प्रवर की घोषणा करके सम्पूर्ण धर्मसंघ को आह्लादित कर दिया। चारों तरफ खुशियों का सैलाब उमड़ने लगा। वह मनमोहक दृश्य अविस्मरणीय बन गया। धर्मसंघ को निश्चिंत बना दिया।
'ओ गण के भावी कर्णधार को वंदन।
छगणी के लाल का करते अभिनंदन।।'
सचमुच! इस भैक्षव शासन का सितारा इतना बुलंद है कि इस शासन को एक के बाद एक सक्षम सम्राट का कुशल नेतृत्व प्राप्त हो रहा है। इस आचार्य नामावली की परंपरा में आचार्य माणकगणी के युग को छोड़कर सभी पूर्व आचार्यों ने संघ के हाथों में एक दिव्य मणि, एक दिव्य ताज संघ के मुकुट में लगाया। जिसकी तेजोमय, तपोमय, शक्तिमय रश्मियों से यह संघ-चमन सदा आलोकित हो रहा है।
वर्तमान में गण-गगनांगन के ग्यारहवें सूर्य के रूप में आचार्य महाश्रमण की सूक्ष्म दृष्टि पड़ी—मुनि महावीर पर।
१. सन 2010 में संघ की अंतरंग व्यवस्था कार्य अपने पत्र-संवाद सेवा में मुनि महावीर को नियुक्त किया।
२. सन् 2012 में धर्मसंघ की शिरोमणि बहुश्रुत परिषद के संयोजक के रूप में आपको नियुक्त किया।
३. सन् 2015 में नवदीक्षित व बालमुनियों के संस्कार निर्माण प्रभारी के रूप में संघनायक ने आपकी नियुक्ति की।
४. सन् 2016 में असम राज्य के गोलाघाट का बरपथार नगर! किसी ने कल्पना भी नहीं की होगी कि वह नगर तेरापंथ धर्मसंघ के इतिहास में अंकित हो जायेगा। उस धरा पर संघनेता, संघसम्राट ने 'मुख्यमुनि' पद का सृजन कर धर्मसंघ को मजबूत बनाने का कीर्तिमान स्थापित किया।
मुख्यमुनि पद की लगभग इस एक दशक की यात्रा में सेवा, साधना व अनुभव का सृजन किया। लाडनूं की तपोभूमि, पावनभूमि पर युवाचार्य पद पर युगपुरुष ने आपको प्रतिष्ठित किया। जिससे सम्पूर्ण चतुर्विध धर्मसंघ में जय-नंदीघोष की स्वर-लहरियाँ मुखरित हो उठीं।
मुख्यमुनि प्रवर पहले आचार्य महाप्रज्ञ की शारीरिक सेवा में नियुक्त थे। फिर वर्तमान में आचार्य महाश्रमण को सुदीर्घ यात्रा के दौरान हाथ का सहारा देते रहे, दे रहे हैं और सुदीर्घ काल तक देते रहेंगे—यही शुभभावना भाते हैं। सहारा किसने किसको दिया, इसका भी गूढ़ रहस्य है। शिष्य प्रसन्न था कि मैं गुरु की
समाधि में, साता पहुँचाने में सहभागी बन रहा हूँ और गुरु को भी आत्मसंतोष था कि
मैं हस्तावलंबन के ज़रिये शिष्य में शक्ति
प्रेषित कर रहा हूँ। जो आज मेरा आलंबन बन रहा है, उसे भविष्य में सम्पूर्ण धर्मसंघ का आलंबन बनना है। तो उन्होंने अपनी शक्ति संप्रेषित करके शिष्य को इतना सबल बनाया कि इस भैक्षव शासन में युवाचार्य पद पर मनोनीत करके, पूरा धर्मसंघ अपने भावी नेता को पाकर मालामाल हो गया।
यह सब वही शिष्य प्राप्त कर सकता है जिस पर गुरु का वरदहस्त होता है। वह शिष्य कंकर से शंकर, बिंदु से सिंधु, भक्त से भगवान बन जाता है। मुनि महावीर को भी आचार्य महाप्रज्ञ व आचार्य महाश्रमण जैसे महान् गुरुद्वय का वरदहस्त प्राप्त हुआ। आचार्य द्वय ने अपनी कुशल छेनी से तराशा, सजाया, संवारा और संघ का युवराज बना दिया। ऐसे दीप्तिमान कोहिनूर को पाकर सम्पूर्ण धर्मसंघ निहाल हो गया।
तो मैं पुनः संघ के भावी राम की अर्थना, अभिवंदना करती हूँ।
'आचार्य महाश्रमण व युवाचार्य प्रवर की कुशल अनुशासना इस चतुर्विध धर्मसंघ को युगों-युगों तक मिलती रहे। इसी शुभभावना-मंगलकामना के साथ—
अभी तो पर खुले हैं, लंबी उड़ान बाकी है।
अभी तो चांद-सितारों को मापा है,
अनंत आसमान बाकी है।।