‘‘ऐसे है नयोड़ा युवाचार्यप्रवर’’

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मुनि वर्धमान कुमार

‘‘ऐसे है नयोड़ा युवाचार्यप्रवर’’

कबीर दास जी ने कहा–
'जाके सिर गुरु ज्ञान है, सोई तरत भव मांहि।
गुरू बिन जानो जन्तु को, कबहुं मुक्ति सुख नांहि॥'
अर्थात जिसके सिर पर गुरू का ज्ञानोपदेश रूपी अनुग्रह है (उसका आचरण करते हुए) वही इस संसार में तरता है (मुक्त हो जाता है)। बिना गुरू तो समझो इस अज्ञानी जीव (मनुष्य) को कभी भी मुक्ति का सुख प्राप्त नहीं हो सकता (इसके लिए गुरु का आश्रय ही एकमात्र सहारा है)।
गुरु-कृपा और युवाचार्य पद का उपहार:
हमारा सौभाग्य है कि हम आचार्य श्री महाश्रमण जी जैसे तेजस्वी, ओजस्वी, वर्चस्वी गुरू की सन्निधि में साधना कर रहे हैं। आपश्री का चिंतन सूर्य की तरह दिव्य ओज, तेज, आरोग्य से भरा हुआ है, अतः आपका 1-1 वचन एक लाख पोटेन्सी की एक बूंद की तरह त्वरित आरोग्य एवं प्रसन्नता देता है। एक लाख पोटेन्सीवाली दवा भी साता वेदनीय कर्म का उदय न होने पर शायद काम न करें, मगर आपके वचन तो कर्मों को ही समाप्त कर हमें धन्य (सिद्ध, बुद्ध, मुक्त) बना देते हैं।
आचार्य श्री भिक्षु के Birthday के दिन वर्तमान भिक्षु (आचार्य श्री महाश्रमण) ने धर्मसंघ को Gift प्रदान किया नवम् युवाचार्य के रूप में। आचार्यप्रवर धवल सेना के साथ लाडनूँ में विराज रहे हैं।
लाडनूँ के 'रोसोगुल्ला' (रसगुल्ला) प्रसिद्ध हैं। जिस प्रकार 'रोसोगुल्ला' को कहीं से भी चखने पर वह मीठा ही लगता है, उसी प्रकार नयोड़ा (नए) युवाचार्य श्री को कही से भी देखे उसमें सहजता और सरलता ही दिखती है।
बचपन और अध्ययन के दिन : (जयपुर - 2008)
मैं महावीर कुमार जी स्वामी (युवाचार्य प्रवर) को बचपन से ही जानता हूँ। 2008 जयपुर का प्रसंग। महावीर स्वामी के Course Exam शुरू होने वाले थे। उस समय मैं सेवा में आया हुआ था। मुझे महाराज को कई Subjects (English Literature, English Grammar, Maths, etc.) पढ़ाने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। मैं तो लगभग 16 साल के आसपास का था, लेकिन महाराज मुझे ऐसे सम्मान करते थे, जैसे मैं बहुत बड़ा Professor हूं। बहुत एकाग्रता के साथ अध्ययन किया। Time Punctuality गज़ब की थी। मैं आता उसके पहले ही किताबें आदि तैयार करके विराज जाते थे। मुझे उस समय लगा यह महाराज कितने 'Down to Earth' हैं। और जब भी मैं आता गुरुकुलवास में आपकी बहुत कृपा मुझे मिलती थी। आपश्री मुझे अच्छी सेवा कराते, पढ़ाते और नए-नए गीत सुनाते।
दीक्षा और स्नेह के संस्मरण :
दीक्षा के बाद मैं और युवाचार्यप्रवर एक ही वर्ग में थे। मुनिश्री ऋषभ कुमार जी स्वामी के वृहत्तर वर्ग में। महाराज की बहुत बहुत बहुत वत्सलता मुझे प्राप्त हुई।
मेरी दीक्षा वीरभूमि बीदासर में हुई। ठंड का समय। दीक्षा की पहली रात। महावीर मुनिश्री पधारे मुझे सुलाने के लिए। मुझे कहा सो जाओ। मैं सोया और फिर महाराज ने मुझे गर्म कपड़े उड़ाए (ऐलवान, तुस, आदि)। अगले दिन कोई दूसरे संत ने कपड़े उड़ाए। फिर मैंने महावीर स्वामी से कहा आप ही पधारा करो मुझे कपड़े उड़ाने के लिए, मुझे नींद अच्छी आती हैं। उसके बाद प्रायः महाराज ही पधारते और मुझे सुलादेते।
कोमलता का प्रतिरूप ढूंढू तो आचार्य प्रवर 1st Rank पर और युवाचार्य प्रवर 2nd Rank पर। आपश्री कोमलता की सब उपमाओं से ऊपर उठ गए हैं। शत्रुत्व अथवा विरोधी भाव आपके जीवन में संभवतः रहा ही नहीं है, अतः आप अनन्त कोमलता के नवनीत हैं।
गोचरी और आहार-संयम :
मुनिश्री महावीर कुमार जी स्वामी वर्ग की पहली पोर की गोचरी पधारते थे और मैं उनके सहयोगी के रूप में जाता था। मेरा काम सिर्फ गोचरी जाना था। बाकी सारा काम जैसे - परोसना, ज्यादा हो तो उठाना, आदि आपश्री ही करवाते थे।
आपश्री का आहार-संयम अनुत्तर है :
एक दिन की घटना, मुझे महावीर मुनि ने घर परसने के लिए भेजा, वापिस लौटते वक्त मेरा Accident होते-होते बचा। एक Bike मेरे बहुत नज़दीक से स्पर्श करके निकल गई। मैं गिरते-गिरते बचा, और पातरियों को भी गिरने नहीं दिया, लेकिन पातरियों में जो आहार था, वो सब Mix-Masala हो गया। महाराज ने झोली देखी और कहा यह मुझे देदो, यह मैं खा लेता हूँ और तुम दूसरा आहार ग्रहण कर लो।
मुख्य मुनि बनने का प्रसंग :
बरपथार (असम) गुरूदेव पधारे। वो मेरी अंतिम गोचरी महावीर स्वामी के साथ थी। शाम को गुरूदेव ने आपको 'मुख्य मुनि' बना दिया। उस दिन मुझे महाराज की दो Duties प्राप्त हुई - एक तो अर्हत् वंदना का संगान करना और दूसरी वर्ग की पहली पोर की गोचरी का पूरा जिम्मा। फिर मुझे पता चल गया गोचरी करना कितना Tough काम हैं।
मेरा मुंह का लोच महावीर स्वामी ही करवाते थे। लोच के वक्त गीत गुनगुनाते रहते, ताकि मेरा ध्यान गीतों में लग जाए और दर्द का कम एहसास हो। बरपथार पहुँचने से कुछ दिन पहले मैंने महाराज से निवेदन किया - मेरा मुंह का लोच करना है। महाराज ने फरमाया अभी नहीं, नागालैण्ड जाकर करने का भाव है। फिर तो वो भाव ही रह गया, उसके पहले ही आप मुख्य मुनि बन गए। नागालैण्ड पधारने के बाद मैंने निवेदन किया - महाराज मुंह का लोच ??? महावीर स्वामी ने फरमाया - 'वर्धमान जी अब कियां करूं ?'
सहनशीलता और अनुशासन :
हमारे वर्ग में सामुहिक धोना होता था। मैं और महाराज भी उस क्रम में साथ थे। हम तो सब छोटे से पाटे पर बैठकर धोना करते थे पर महावीर मुनि श्री उकडु आसन में बैठे - बैठे ही सारा धोना करते थे। आहार के वक्त भी, परोसना करते वक्त भी उकडु आसन में ही बेठते थे। मैंने एक बार कहा - आपके पैर नहीं दुखते ऐसे बैठने से। महाराज ने कहा मुझे आदत हैं। जो महाराज एक छोटे से पाटे में भी नहीं बैठते थे, आज वो एक बड़े पाटे में विराजमान होते हैं।
महावीर स्वामी Soft-Hearted Person भी हैं और Strict Person भी हैं। मैं महाराज के पास अध्ययन करता था। विराटनगर का प्रसंग। मैंने महाराज से कहा गुरुदेव मुख्य प्रवचन कार्यक्रम में रामायण शुरू करवाने वाले हैं। मेरी जाने की इच्छा है। महाराज ने कहा - ‘आराम से जाओ पर....’ यह पर, लेकिन, किन्तु, But बहुत खतरनाक होते है। महाराज ने कहा नाममाला के 10 श्लोक सिखो और पक्के सुनाओ, तो प्रवचन में जा सकते हो। मैं कई बार तो सिखलेता, और कई बार नहीं सिखपाता।
मैं जब नहीं सिखपाता, तो महाराज के सामने Emotionally कहता - मैंने सिखा तो नहीं, पर आप आज्ञा दो, तो क्या मैं जाऊं प्रवचन में ? Oh! Oh! फिर तो Band-Bajaa-Baaraat हो जाती। फिर तो मेरी जबरदस्त class लगती। आप लोग जानना चाहते होंगे, पर मैं क्यूं आपको बताऊँ मेरी Secret.... कुछ भी हो महाराज ने मुझपर बहुत श्रम किया। नाममाला सुन-सुनकर इतनी पक्की करवादी, कि मुझे Number-wise Shlok याद हो गए।
सहज विनोद और अनमोल यादें :
मेरे दिमाग में सारे पल Picture की तरह चल रहे हैं। ऐसे तो मैं हंसी-मज़ाक कम ही करता था, लेकिन महावीर मुनिश्री के साथ मेरी tuning अच्छी थी। मैं महाराज के साथ विनोद करता, परेशान करता। मुझे महाराज को तंग करने में आनन्द आता था। एक दिन उन्होंने कहा चितारना सुनाओ, मैंने कहा अभी नहीं, मुझे निचे जाना है। महाराज Gate के आगे खड़े हो गए, ताकि मैं नहीं जा सकूं। महाराज हल्के-फुल्के से थे, मैंने महाराज को उठाया और side में रखकर रवाना हो गया।
अतीत और वर्तमान का चिंतन:
किसको पता था जिसके साथ मैं गोचरी जाता था, उसीको गोचरी कभी मालूम करनी पड़ेगी। किसको पता था जो मुझ पर अनुशासन करते थे, वो भविष्य में अनुशास्ता बनेंगे। किसको पता था जिनकी वाणी को सुनकर मैं 'गांवड़ा' (गांववाला) कहता था, उसकी वाणी को सुनने के लिए लाखो लोग लालायित होंगे। किसको पता था जिसके साथ मैं विनोद करता था, उसके सामने अब आंखे मिलाने में भी संकोच आएगा। किसको पता था कि जो कोमल हाथ मेरे मुंह का लोच करवाते थे, वही हाथ अब दिनभर जयकारा देने में लगेंगे। किसको पता था? किसको पता था?? किसको पता था ???
अंत में कहना चाहूँगा सचमुच पूरा धर्मसंघ 'महावीर स्वामी' जैसा सर्वगुण संपन्न कुशल युवाचार्य पाकर आश्वस्त है, विश्वस्त है। I really feel a sense of pride... आप दीर्घायु हो, चिरायु हो! यही मेरी मंगलकामना है!!!