जयाचार्य! अनुशासन प्रिय और दूरदर्शी आचार्य थे

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मुनि कमल कुमार

जयाचार्य! अनुशासन प्रिय और दूरदर्शी आचार्य थे

तेरापंथ धर्म संघ एक यशस्वी धर्म संघ है। इस धर्म संघ के प्रथम आचार्य आचार्य भिक्षु हुए जिन्होंने आगमों का तलस्पर्शी अध्ययन कर शुद्ध साधना का क्रम बनाया और ज्यों ज्यों लोगों ने आचार्य भिक्षु के क्रांतिकारी विचारों को समझा त्यों त्यों वे भक्त बनते गये। इस संघ में सर्वेसर्वा आचार्य ही होते हैं। आचार्य द्रव्य क्षेत्र काल भाव देखकर संघ का समुचित मार्ग दर्शन करते रहते हैं जिससे संघका उत्तरोत्तर विकास होता रहे। इस धर्म संघ के चतुर्थ आचार्य श्री जीतमलजी स्वामी हुए जो प्रज्ञापुरुष जयाचार्य के नाम से विख्यात हुए। तेरापंथ धर्म संघ में सबसे छोटी उम्र में दीक्षित होने वाले आचार्य हैं।
आपका जन्म राजस्थान में जोधपुर के निकट रोयटगांव में हुआ आपके पिता आईदानजी, माता कल्लूजी ने आपको जन्म ही नहीं सुसंस्कार भी दिये आप अपने परिवार में सबसे छोटे थे बड़े भाई स्वरूपचन्दजी उसके बाद भीमराजजी तीसरे नंबर में आप थे। लघुवय में ही पिताजी का स्वर्गवास हो गया था। तीनों भाइयों की इकतारी परिवार के उत्थान का मुख्य कारण समझना चाहिये। माँ की प्रेरणा से रोयट से किशनगढ आ गये वहां व्यापार भी प्रारंभ किया। वहीं आपको आचार्य श्री भारीमाल जी की प्रथम बार सेवा दर्शन का अवसर प्राप्त हुआ। तीनों भाइयों ने भारीमालजी स्वामी की सेवा उपासना का भरपूर लाभ लिया। तीनों का मन संसार से विरक्त हो गया। पुत्रों के साथ मां के मन में भी वैराग्य का अंकुर फूट गया। भारीमालजी स्वामी कल्प से अधिक किशनगढ़ विराजे संयोग से हेमराजजी स्वामी का अयाचित चौमासा हो गया अबतो चारों का मन मजीठ के समान पक्का होगया।
जयपुर चतुर्मास में चारों ने सेवा दर्शन का भरपूर लाभ लिया उसीका सुपरिणाम है कि चारों की मात्र डेढ़ महीने में दीक्षा होगई। दीक्षा के पश्चात बारह वर्षों तक मुनिश्री हेमराजजी स्वामी के साथ रहे। आपकी बुद्धि बड़ी ही तीक्ष्ण थी हेमराजजी स्वामी से विनयपूर्वक आपने जो ज्ञान प्राप्त किया उसी के कारण आप एक अच्छे उच्च कोटि के संत ही नहीं साधक और साहित्यकार बने आपके द्वारा लिखित साहित्य पढ़कर पाठक आपका दास बन जाता है।
राजस्थानी भाषा में इसप्रकार प्रचुर साहित्य लिखने वाले कई शताब्दियों में भी पढ़ने सुनने में नहीं आये। आप अनुशासन प्रिय और दूरदर्शी आचार्य थे आपनेही तेरापंथ धर्म संघ में उत्सव प्रारंभ किये वे तीन उत्सव पट्टोत्सव, चरोत्सव, मर्यादा महोत्सव जिसे धर्मसंघ युग युग तक मनाता रहेगा आपने धर्म संघ में अनेक प्रकार की व्यवस्थाएं की साध्वी प्रमुखा का चयन हो या आचार्यों के कार्यों की व्यवस्था हो आपके १४६ वें निर्वाण दिवस पर यह मंगल कामना करते है कि आप द्वारा निर्दिष्ट मार्ग का हम हृदय से अनुशरण करते रहे।