तपस्या का उद्देश्य हो कर्म-निर्जरा, न कि सांसारिक सुख की चाह :आचार्यश्री महाश्रमण

गुरुवाणी/ केन्द्र

लाडनूं। 05 सितम्बर, 2026

तपस्या का उद्देश्य हो कर्म-निर्जरा, न कि सांसारिक सुख की चाह :आचार्यश्री महाश्रमण

जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के एकादशम अधिशास्ता, अखंड परिव्राजक, शांतिदूत, युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमण जी ने सुधर्मा सभा में ‘तप से क्या मिलेगा?’ विषय पर उत्तरज्झयणाणि आगम के माध्यम से चतुर्विध धर्मसंघ को पावन संबोध प्रदान किया। पूज्य प्रवर ने तप के १२ भेदों, जीवन में ऊनोदरी के प्रयोग और कर्म-निर्जरा के आगमिक रहस्य पर विस्तृत प्रकाश डाला।
तप और निर्जरा में कार्य-कारण संबंध:
१. जैन शासन में प्रसिद्ध तप : पूज्य आचार्यश्री ने फरमाया कि 'तप' जैन शासन में अत्यंत प्रसिद्ध है और नव तत्त्वों में निर्जरा तत्त्व से भी सीधा जुड़ा हुआ है।
२. कार्य-कारण की भिन्नता : कर्म झड़ने से आत्मा की जो शुद्धि होती है, वह निर्जरा है। निर्जरा और तप में कार्य-कारण का भेद है—तप ‘कारण’ है और निर्जरा उसका ‘कार्य’ है। अभेदोपचार से तप के जो १२ भेद हैं, वे निर्जरा के भी १२ भेद कहे जा सकते हैं।
३. व्यवदान (कर्म-मुक्ति) की प्राप्ति : आगमिक प्रश्न ‘तप से क्या लाभ होता है?’ का उत्तर देते हुए पूज्यश्री ने स्पष्ट किया कि तप से जीव ‘व्यवदान’ को प्राप्त करता है। व्यवदान का अर्थ है—पूर्व संचित कर्मों की निर्जरा। तपस्या से कर्मों का क्षय होने पर जीव को कर्म-बंधनों से पूर्ण मुक्ति प्राप्त हो सकती है।
बाह्य व आभ्यंतर तप का सूक्ष्म आगमिक विवेचन : (६ बाह्य तप)
१. अनशन : उपवास, बेला, तेला, अठाई, मासखमण आदि अनाहार से संबंधित तप अनशन के ही अंग हैं। जीवन के अंतिम समय में संथारा स्वीकार करना भी तप का ही एक रूप है।
२. ऊनोदरी: भूख से कम खाना ऊनोदरी है। साधु व गृहस्थ दोनों को भोजन के साथ-साथ वस्त्र, पात्र व उपकरणों का भी अनावश्यक संग्रह न कर ऊनोदरी रखनी चाहिए।
३. विशेष ऊनोदरी प्रेरणा : पूज्यश्री ने फरमाया कि कषाय की भी ऊनोदरी होनी चाहिए और अपने भाषण में भी ऊनोदरी का प्रयास हो—अर्थात् अपनी बात को कम से कम शब्दों में रखने का प्रयास होना चाहिए।
४. अन्य बाह्य भेद : विगयवर्जन (रसपरित्याग), अभिग्रह, काय-क्लेश/कायोत्सर्ग/आसन और प्रतिसंलीनता (इंद्रियों व योगों का प्रतिसंहरण)। जो उपवास न कर सके, वह ५ विगय टालकर मन के संयम से विगयवर्जन रूपी तप कर सकता है।
५. आभ्यंतर तप : प्रायश्चित्त, विनय (बड़ों की वंदना व सम्मान), वैयावृत्य (अग्लान भाव से सेवा), स्वाध्याय, व्युत्सर्ग और ध्यान। पूज्यश्री ने फरमाया कि सेवा अग्लान भाव से करनी चाहिए तथा स्वाध्याय भी तप का ही रूप है।
अमृतवाणी का वार्षिक अधिवेशन व नवीन टीम की घोषणा:
'अमृतवाणी' के वार्षिक अधिवेशन का मंचीय उपक्रम आयोजित हुआ। अमृतवाणी की ओर से एक विशेष वीडियो प्रस्तुत किया गया। तत्पश्चात अमृतवाणी के नवनिर्वाचित अध्यक्ष मदनचन्द दूगड़ ने अपनी भावपूर्ण श्रद्धाभिव्यक्ति प्रस्तुत की और आचार्य श्री के समक्ष अपनी नवीन कार्यकारिणी टीम के नामों की घोषणा की।
पावन मंगल आशीर्वाद:
अमृतवाणी की नवनिर्वाचित टीम को पावन पाथेय प्रदान करते हुए पूज्य आचार्यश्री ने फरमाया कि 'अमृतवाणी के पास इतिहास का खजाना है। यह व्यवस्था का परिवर्तन हुआ है, खूब अच्छा धार्मिक व आध्यात्मिक कार्य चलता रहे।

आखिर कैसे अश्रु बहते ही पूरे हो गए कठिन संकल्प?..
१. भगवान महावीर और चंदनबाला : आचार्य श्री ने भगवान महावीर द्वारा गोचरी (भिक्षा) के लिए किए गए अत्यंत कठिन 'अभिग्रह' का स्मरण कराया। पूज्य प्रवर ने फरमाया कि जब चंदनबालाजी की आँखों में करुणा के आँसू छलके, तब भगवान के सारे अभिग्रह पूरे हुए और उन्हें दान देने का दुर्लभ अवसर प्राप्त हुआ। यह प्रसंग सिखाता है कि एक साधक का संकल्प कितना शक्तिशाली और महत्वपूर्ण होता है।
२. मुनि सुखलाल जी स्वामी का उल्लेख : आचार्य श्री ने 'घोर तपस्वी' मुनि सुखलाल जी स्वामी की सेवा-भावना की विशेष सराहना की। पूज्य प्रवर ने फरमाया कि जब किसी तपस्वी के जीवन में तपस्या के साथ-साथ सेवा का भाव भी जुड़ जाता है, तो वह 'सोने में सुहागा' के समान हो जाता है।
'घोर तपसी हो मुनि! घोर तपसी!'
'थारो जाप जप्यां करमां री कोड़ खपसी, हो मुनि...
३. साध्वी पन्ना जी का व्यक्तित्व : 'दिव्य तपस्विनी' और 'दीर्घ तपस्विनी' साध्वी पन्ना जी का भावपूर्ण स्मरण करते हुए पूज्य प्रवर ने फरमाया कि वृद्धावस्था में भी वे निरंतर तप और सेवा में लीन रहती थीं। अपनी इसी अद्भुत तपस्या और निस्वार्थ सेवाभाव के कारण वे पूरे समाज में अत्यंत लोकप्रिय थीं।

मगन हाजिर है!...
(जब मगन मुनि ने प्रोटोकॉल की परवाह नहीं की...)
आचार्यश्री महाश्रमण जी ने परम पूज्य कालूगणी के अंतिम समय का अत्यंत मार्मिक एवं आत्मीय प्रसंग साझा किया।
१. संकेत द्वारा बुलावा: आचार्य श्री ने फरमाया कि कालूगणी जी को जब अपने अंतिम समय का आभास हुआ, तो उन्होंने मुनि मगनलाल जी को याद किया और तुरंत अपने पास बुलाया।
२. अटूट आत्मीयता : सूचना मिलते ही मुनि मगनलाल जी अत्यंत तीव्र गति से सीढ़ियाँ चढ़कर पूज्य गुरुदेव के पास पहुँचे, ओर कहां मगन हाजिर है! आचार्यश्री ने दोनों के बीच के बरसों पुरानी मित्रता, प्रगाढ़ गुरु-शिष्य भाव का उल्लेख किया।
३. मर्यादा से ऊपर भक्ति : उस समय युवाचार्य तुलसी भी वहीं उपस्थित थे। परंतु मगन मुनि ने बिना किसी बाहरी औपचारिकता या प्रोटोकॉल की परवाह किए, तुरंत स्वयं ही कालूगणी जी को संथारा (अंतिम अनशन) पचकाने की विधि संपन्न कराई।