गुरुवाणी/ केन्द्र
श्रद्धा से किया तीर्थंकर नमन तारेगा भव-सागर : आचार्यश्री महाश्रमण
जन-जन के मानस को आध्यात्मिक संपोषण प्रदान करने वाले तेरापंथ धर्मसंघ के वर्तमान अधिशास्ता, अणुव्रत अनुशास्ता, युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमण जी ने चतुर्विध धर्मसंघ को ‘मन की एकाग्रता से क्या मिलेगा?’ विषय पर अमृत देशना प्रदान की। पूज्य प्रवर ने मन की चंचलता को वश में कर चित्त निरोध और कषाय मंदता प्राप्त करने का आगमिक मार्ग दिखाया।
संज्ञी व असंज्ञी मनुष्य का सूक्ष्म तात्त्विक विवेचन :
१. असंज्ञी मनुष्य का अस्तित्व व १४ स्थानक : पूज्य आचार्यश्री ने फरमाया कि हम संज्ञी (मन वाले) मनुष्य हैं। जैन तत्त्व विद्या में असंज्ञी मनुष्य भी मान्य हैं, जो इतने सूक्ष्म हैं कि सामान्यतया हमारी आँखों से अदृश्य रहते हैं। इन असंज्ञी मनुष्यों की उत्पत्ति मनुष्य के मल-मूत्र आदि १४ स्थानकों से होती है।
२. पाँच इन्द्रियाँ व अपर्याप्त स्थिति : असंज्ञी मनुष्य भी पंचेन्द्रिय प्राणी होते हैं, किन्तु वे अपर्याप्त स्थिति के होते हैं। इसके बावजूद उन्हें मनुष्य का ही दर्जा प्राप्त है।
३. बालक के राज्याभिषेक का दृष्टांत : पूज्यश्री ने दृष्टांत देकर समझाया कि जैसे किसी छोटे बालक का राज्याभिषेक कर देने पर वह आयु कम होने पर भी ‘राजा’ ही कहलाता है, ठीक उसी प्रकार असंज्ञी पंचेन्द्रिय जीव को भी मनुष्य माना गया है।
मन, वचन और काया : चेतना के तीन कर्मकर (कर्मचारी):
१. तीन योगों का कार्य: संज्ञी मनुष्य के पास शरीर, वाणी और मन—ये तीन चेतना के कर्मकर (कर्मचारी) हैं। शरीर से चलना-फिरना, बैठना, गोचरी-पानी, हाथ जोड़कर वंदना करना और दान देना आदि कार्य होते हैं। विचार वाणी के रथ पर आरूढ़ होकर आगे बढ़ते हैं। सामने वाले में श्रवण क्षमता और स्वयं में प्रज्ञा हो तो ज्ञान हृदयंगम होता है।
२. मन की चंचलता पर नियंत्रण : विहार-यात्रा, भोजन, भजन या जप-तप करते समय भी मन निरंतर चलता रहता है। मन की इस चंचलता और गतिशीलता को चेतना पर हावी नहीं होने देना चाहिए।
मन की दो अवस्थाएं: व्यग्रता बनाम एकाग्रता (चित्त निरोध):
१. व्यग्र व एकाग्र मन: मन का विविध आलंबनों पर भटकना ‘व्यग्र अवस्था’ है और किसी एक आलंबन पर केंद्रित हो जाना ‘एकाग्र अवस्था’ है।
२. शुभ आलंबन से निर्जरा : मन को खराब विषयों में लगाने के बजाय अरहंत, सिद्ध और परमेष्ठी जैसे वीतरागी आलंबनों में लगाना चाहिए ताकि राग-द्वेष मुक्त स्थिति बने। शुभ आलंबन पर मन स्थापित करने से जीव चित्त का निरोध करता है और निर्जरा का बड़ा लाभ मिलता है।
प्रेक्षाध्यान, कषाय मंदता और भाषा संयम :
१. प्रेक्षाध्यान का उपक्रम : मन को एकाग्र करने के लिए प्रेक्षाध्यान का प्रशिक्षण अत्यंत उपयोगी है।
२. साधना की मुख्य निष्पत्ति: ध्यान, सेवा, स्वाध्याय और अनुप्रेक्षा करने की अंतिम निष्पत्ति (परिणाम) कषाय की मंदता होनी चाहिए। व्यक्ति को प्रयास करना चाहिए कि जीवन में तेज आवेश न आए, आवेश पूर्ण भाषा न बोली जाए और कषाय मंद रहे।
22 = 82? मगन मुनिजी की अलौकिक भविष्यवाणी...
पूज्य प्रवर ने आचार्य श्री तुलसी के आचार्य पद ग्रहण करने से जुड़े एक अत्यंत रोचक प्रसंग का वर्णन किया:
1. अल्पआयु में महान दायित्व : आचार्य श्री तुलसी मात्र 22 वर्ष की युवावस्था में आचार्य पद पर आसीन हो गए थे। जैन श्वेतांबर तेरापंथ धर्म संघ के इतिहास में वे इतनी कम आयु में इस सर्वोच्च पद को संभालने वाले पहले आचार्य थे।
2. मगन मुनि जी का अतुलनीय योगदान : नवोदित आचार्य श्री तुलसी को संघ में सुदृढ़ रूप से स्थापित करने और उनकी पद-गरिमा को अक्षुण्ण बनाए रखने में मुनि मगन मुनि जी ने अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
3. आयु और अनुभव का अद्भुत सामंजस्य : जब भी लोग आचार्य श्री तुलसी की कम उम्र को लेकर संशय या चर्चा करते, मगन मुनि जी अपनी प्रखर बुद्धि से बड़ा ही मर्मस्पर्शी उत्तर देते। वे कहते— 'हमारे आचार्य 82 वर्ष के हैं।'
जब लोग आश्चर्यचकित होकर पूछते कि वे तो बहुत युवा दिखाई देते हैं, तब मुनि श्री स्पष्ट करते:
22 वर्ष (आचार्य श्री तुलसी की स्वयं की आयु) + 60 वर्ष (परम पूज्य गुरुदेव कालुगणी का संचित अनुभव) = 82 वर्ष का पूर्ण परिपक्व अनुभव।
4. भविष्यवाणी का अलौकिक संयोग : मगन मुनि जी की यह वाणी आगे चलकर एक अद्भुत आध्यात्मिक संयोग सिद्ध हुई। आचार्य श्री तुलसी ने अपने नश्वर जीवन के 82 वर्ष ही पूर्ण किए, 83वां वर्ष पार नहीं किया। इस प्रकार मगन मुनि जी के शब्द एक तरह से भविष्य के लिए सिद्ध वचन बन गए।