गुरुवाणी/ केन्द्र
तन कर, मन कर, वचन कर, देत न काहु दुःख; तुलसी पातक झरत हैं, देखत वा को मुख
जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के एकादशम अधिशास्ता, अहिंसा यात्रा प्रणेता, शांतिदूत युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमण जी ने सुधर्मा सभा में ‘संयम से क्या मिलेगा?’ विषय पर उत्तरज्झयणाणि आगम के माध्यम से अमृत देशना प्रदान की। पूज्य प्रवर ने हेय-उपादेय के विवेक, संवर, अणुव्रत तथा ज्ञानशालाओं के महत्व पर सूक्ष्म तात्त्विक प्रकाश डाला।
पर्युपासना, विवेक और संयम की आगमिक यात्रा :
१. दर्शन व पर्युपासना का लाभ : पूज्यश्री ने फरमाया कि कोई गृहस्थ श्रमणों की पर्युपासना करता है, उनके दर्शन करता है या पास बैठता है तो मात्र दर्शन करना भी निर्जरा का कारण बन सकता है। व्याख्यान सुनने और धर्मचर्चा से ज्ञान प्राप्त होता है और ज्ञान से ‘विज्ञान’ यानी हेय-उपादेय का विवेक जागृत होता है।
२. हेय और उपादेय का भेद : हिंसा, झूठ, चोरी आदि १८ पाप स्थानक ‘हेय’ (त्यागने योग्य) हैं, जबकि सम्यक्त्व, व्रत, निर्जरा और मोक्ष ‘उपादेय’ (ग्रहण करने योग्य) हैं। हेय-उपादेय का विवेक होने पर व्यक्ति पापों का त्याग-प्रत्याख्यान करता है, जिसकी निष्पत्ति संयम है।
३. अनाश्रव और संवर का विधान : आगम में प्रश्न किया गया कि जीव संयम से क्या प्राप्त करता है? उत्तर में बताया गया कि संयम से अनाश्रव (संवर) उत्पन्न होता है। प्रत्याख्यान करने से संयम होता है और संयम का परिणाम अनाश्रव है, जिससे नए कर्मों का आना बंद हो जाता है। सम्यक्त्व से मिथ्यात्व आश्रव और सर्व व्रत से अव्रत आश्रव का निरोध होता है।
महाव्रत, गृहस्थ धर्म और तपस्या से पुष्टिकरण :
१. साधु व गृहस्थ जीवन: साधु के ५ महाव्रत (हिंसा, झूठ, चोरी, मैथुन, परिग्रह का पूर्ण त्याग) होते हैं, जिससे पूर्ण अनाश्रव की स्थिति बनती है। गृहस्थ भी यदि १२ व्रत स्वीकार कर हिंसा आदि का परिसीमन करे तो अव्रत आश्रव निरुद्ध होता है।
२. तपस्या से निर्जरा : साधु पूर्ण व्रती होते हुए भी उपवास, वेला आदि तपस्या करते हैं, जिससे संयम में और पुष्टिकरण होता है तथा अधिक निर्जरा का लाभ मिलता है।
३. आचार्य तुलसी का अणुव्रत संदेश : परमपूज्य आचार्य श्री तुलसी ने अणुव्रत के माध्यम से जैन-अजैन सभी को जीवन में नैतिकता और ईमानदारी अपनाने का संदेश दिया तथा हिंसा व नशा जैसी बुराइयों के परित्याग पर बल दिया ताकि आत्मा का कल्याण हो सके।
ज्ञानशाला : संस्कार निर्माण और मुमुक्षु भाव का केंद्र :
१. तेरापंथी महासभा का नेटवर्क: ज्ञानशालाएं बच्चों में धार्मिक संस्कारों के बीजारोपण का बहुत बड़ा माध्यम हैं। जैन श्वेताम्बर तेरापंथी महासभा के अंतर्गत संचालित इस विशाल नेटवर्क में प्रशिक्षण देने वाली बहने समर्पण के साथ सेवा दे रही हैं, जबकि स्थानीय तेरापंथी सभा, युवक परिषद आदि व्यवस्था पक्ष देखते हैं।
२. मुमुक्षु निर्माण : ज्ञानशाला के माध्यम से यदि बच्चों में मुमुक्षु भाव भी जागृत हो जाए तो उनके जीवन का मार्ग प्रशस्त हो सकता है। श्रावक-श्राविकाओं को भी अपने संयम के प्रति निरंतर जागरूक रहना चाहिए।
आयंबिल प्रत्याख्यान व दिल्ली जैन समाज की सहभागिता :
अखिल भारतीय तेरापंथ महिला मंडल के तत्वावधान में अनेक महिलाओं ने पूज्य आचार्य प्रवर के श्रीमुख से आयंबिल का प्रत्याख्यान ग्रहण किया। आचार्य श्री की मंगल सन्निधि में बड़ी संख्या में दिल्ली जैन समाज के लोग उपस्थित हुए। इस अवसर पर विविध संस्थाओं और समाजों के प्रतिनिधियों ने अपनी भावांजलि व्यक्त की, जिनमें सुखराज सेठिया,लहरसिंह सिरोहिया (राज्यसभा सांसद), के. सी. जैन थे। युवाचार्य श्री महावीर कुमार जी ने मंगल उद्बोधन प्रदान किया।