गुरुवाणी/ केन्द्र
शुभ योग की साधना से ही संभव है कर्मों का क्षय : आचार्यश्री महाश्रमण
जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के एकादशम अधिशास्ता, महातपस्वी, युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमण जी ने सुधर्मा सभा में ‘निर्जरा से क्या मिलेगा?’ विषय पर उत्तरज्झयणाणि आगम के माध्यम से चतुर्विध धर्मसंघ को पावन संबोध प्रदान किया। पूज्य प्रवर ने अध्यात्म साधना के दो आधार स्तंभों—संवर और निर्जरा, गुणस्थानों की प्रक्रिया तथा 'अक्रिया' (मोक्ष) की प्राप्ति के गूढ़ रहस्यों का विस्तृत विवेचन किया।
संवर और निर्जरा : साधना का संपूर्ण सार:
१. धार्मिक क्रियाकलाप का केंद्र : पूज्य आचार्यश्री ने फरमाया कि अध्यात्म की साधना में संवर और निर्जरा दो प्रमुख तत्त्व हैं, जिनमें संपूर्ण धार्मिक क्रियाकलाप समाविष्ट हो जाते हैं।
२. साधु चर्या में निर्जरा : साधु जब सम्यक्त्व व व्रत संवर में रहते हुए गोचरी हेतु ईर्यासिमिति के प्रति जागरूक रहकर शांत भाव से जाता है, परोपकार की भावना से व्याख्यान देता है अथवा सेवा करता है, तो शुभ योग से निरंतर निर्जरा होती है। हमारी परंपरा में मिथ्यात्वी के भी निर्जरा होना मान्य है, लेकिन यदि संवर और चारित्र की प्राप्ति हो जाए तो सर्वाधिक निर्जरा होती है।
गुणस्थान, क्षपक श्रेणी और 'अक्रिया' का आगमिक गणित :
१. कर्मों के क्षय का क्रम : आगम में व्यवदान का फल बताया गया है कि निर्जरा से जीव अक्रिया को उत्पन्न करता है। साधना की उच्च भूमिका में साधु का सबसे पहले १२वें गुणस्थान में मोहनीय कर्म क्षीण होता है। इसके पश्चात १३वें गुणस्थान में ज्ञानावरणीय, दर्शनावरणीय और अंतराय—ये तीनों घाती कर्म भी क्षीण हो जाते हैं।
२. क्षपक श्रेणी व पंचम काल : अक्रिय बनने के लिए मोहनीय कर्म का क्षय अनिवार्य है, जिसके लिए ८वें गुणस्थान से क्षपक श्रेणी का रास्ता लेना पड़ता है। वर्तमान पंचम आरे में ८वां गुणस्थान उपलब्ध नहीं हो सकता, यहाँ जीव केवल ७वें गुणस्थान तक ही रह सकते हैं।
३. ५ ह्रस्वाक्षर और सिद्ध स्थिति : १४वें गुणस्थान में पूर्ण अक्रिया की स्थिति आती है, जहाँ मात्र ५ ह्रस्वाक्षरों के उच्चारण जितने समय के पश्चात जीव सिद्ध, प्रशांत, मुक्त और परिनिवृत्त होकर समस्त दुःखों का अंत कर देता है।
अशुभ योग से अयोग की ओर आध्यात्मिक यात्रा :
१. मानव जीवन का सौभाग्य : मानव जीवन प्राप्त होना, संज्ञी मनुष्य बन पाना और उसमें भी धर्म का मार्ग मिल जाना बहुत सौभाग्य की बात होती है। जो जीव चारित्र रत्न को प्राप्त कर लेता है, वह मानो धन्य हो जाता है। निर्जरा का अंतिम लक्ष्य मोक्ष ही है। जब तक जीव प्रवृत्ति में रहेगा, तब तक मोक्ष की प्राप्ति नहीं हो सकती। अच्छी प्रवृत्ति आदमी को निवृत्ति की ओर ले जाने वाली हो सकती है।
२. तात्त्विक भाषा के ३ शब्द (अशुभ योग, शुभ योग और अयोग) : तात्त्विक भाषा में तीन शब्द महत्वपूर्ण हैं—अशुभ योग, शुभ योग और अयोग। अयोग तक सीधे जाना मुश्किल है। पहले अशुभ योग से शुभ योग में रहने का प्रयास करना चाहिए। आदमी को असत् से सत्, अंधकार से प्रकाश और मृत्यु से अमरत्व की ओर गति करने का प्रयास करना चाहिए।
३. शुभ योग में निर्जरा : शुभ योग में रहने से भी कर्मों की निर्जरा होती है। अतः व्यवदान के द्वारा जीव अक्रिया को प्राप्त करता है। इस जन्म में भले ही हम पूर्ण अक्रिया की आशा न रखें, परन्तु जितनी उपयुक्त है उतनी अक्रिया को प्राप्त करने का प्रयास करें। अशुभ योग की दृष्टि से हम अक्रिय रहें और जितना संभव हो सके शुभ योग में रहने का प्रयास करना चाहिए।
संयम की चद्दर...
आचार्यश्री महाश्रमण जी ने साधक के संयम और साधना की तुलना एक बिल्कुल निर्मल एवं सफेद चद्दर से की।
विराधना के दो स्तर :
१. हल्की विराधना (रज/धूल का लगना) :
यदि चद्दर पर मामूली सी धूल लग जाए, तो वह एक छोटी भूल या हल्की विराधना का प्रतीक है।
२. बड़ी विराधना (कीचड़ में गिरना) :
यदि वही सफेद चद्दर पूरी तरह से कीचड़ में गिर जाए, तो वह अत्यंत गंभीर भूल यानी बड़ी विराधना है।
दृष्टांत का मुख्य संदेश :
१. भूलों के स्तर को पहचानें : प्रत्येक विराधना (दोष/भूल) का स्तर एक समान नहीं होता; कुछ छोटी होती हैं और कुछ अत्यंत गंभीर।
२. सदा सतर्क रहें : साधक को हर प्रकार की सूक्ष्म और स्थूल विराधना से बचने का निरंतर प्रयास करना चाहिए।
३. तत्काल 'आलोयना' (प्रायश्चित) : यदि अनजाने में कोई छोटी भूल या दोष लग भी जाए, तो उसे तुरंत आलोयना/प्रायश्चित के माध्यम से साफ कर लेना चाहिए, ताकि संयम की चद्दर पर कोई स्थायी दाग न लगे।