प्रतिभा और परिश्रम से खिलता है ज्ञान, दूसरों को पढ़ाना भी है बड़ी सेवा : आचार्यश्री महाश्रमण

गुरुवाणी/ केन्द्र

लाडनूं। 02 सितम्बर, 2026

प्रतिभा और परिश्रम से खिलता है ज्ञान, दूसरों को पढ़ाना भी है बड़ी सेवा : आचार्यश्री महाश्रमण

जन-जन को सद्‌भावना, नैतिकता व नशामुक्ति की प्रेरणा प्रदान करने वाले जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के एकादशमाधिशास्ता, अहिंसा यात्रा प्रणेता, महातपस्वी आचार्यश्री महाश्रमण जी सुधर्मा सभा में 'श्रुताराधना से क्या मिलेगा?' विषय पर उत्तरज्झयणाणि (उत्तराध्ययन) आगम के आलोक में पावन पाथेय प्रदान किया। पूज्य प्रवर ने श्रुताराधना को आत्म-विशुद्धि और भीतरी प्रसन्नता का मुख्य आधार बताया। चार काल का स्वाध्याय और साधना पद्धति :
१. स्वाध्याय का आगमिक समय : आगम स्वाध्याय की पात्रता और समय निर्देश का उल्लेख करते हुए पूज्यश्री ने फरमाया कि दिन और रात के चार-चार प्रहरों में से दूसरे प्रहर (दिन व रात्रि) में ध्यान तथा प्रथम व चौथे प्रहर में स्वाध्याय का विधान है।
२. न्यूनतम स्वाध्याय का संकल्प : तेरापंथ धर्मसंघ की साधु परंपरा में प्रतीकात्मक रूप से चार काल के स्वाध्याय का विधान है। यह चार काल का स्वाध्याय न्यूनतम है; साधक को तो सदैव स्वाध्यायलीन रहने का प्रयास करना चाहिए।
३. शिक्षा व ज्ञान का महत्व : साधु हो या गृहस्थ, ज्ञान का दोनों के लिए अत्यधिक महत्त्व है। गृहस्थ शिक्षा के लिए देश-विदेश जाते हैं, वहीं साधु जीवन में भी श्रुताराधना और ज्ञानार्जन का अपना विशिष्ट स्थान है।
श्रुताराधना से प्राप्त होने वाले २ प्रमुख आगमिक लाभ :
उत्तरज्झयणाणि सूत्र के आधार पर पूज्य प्रवर ने श्रुताराधना के मुख्य लाभों का विवेचन किया।
१. अज्ञान का नाश और भीतरी प्रह्लाद : ज्ञानावरणीय कर्म के उदय से अज्ञान रूपी अंधकार आता है, जिसे ज्ञान रूपी प्रकाश से ही दूर किया जा सकता है। ज्यों-ज्यों साधक श्रुत में अवगाहन करता है, त्यों-त्यों ज्ञान, श्रद्धा और संवेग जागता है, जिससे साधक को आत्मिक सुख और प्रह्लाद (प्रसन्नता) मिलता है।
२. राग-द्वेष से मुक्ति और निर्मल दृष्टिकोण : श्रुत की आराधना से व्यक्ति राग-द्वेष के भावों से संक्लिष्ट (मलिन) और दुखी नहीं बनता। इससे चिंतन प्रशस्त और दृष्टिकोण निर्मल बनता है। मनुष्य के सुख-दुख का मुख्य कारण उसका अपना चिंतन और दृष्टिकोण ही होता है।
ज्ञान दान को बताया सेवा और प्रतिभा का विकास :
१. पढ़ाने की प्रेरणा : पूज्य आचार्यश्री ने प्रेरणा दी कि जिनमें अच्छी प्रतिभा है, उन्हें विद्यार्थी साधु-साध्वियों, समणियों और मुमुक्षुओं को ज्ञान देना चाहिए। ज्ञान देना भी एक प्रकार की सेवा है।
२. प्रतिभा और परिश्रम का साहचर्य : स्वयं भी पढ़ें और दूसरों को भी यथा अवसर पढ़ाएं। प्रतिभा और परिश्रम के साहचर्य से ही ज्ञान का सर्वांगीण विकास संभव है।

मुनि थिरपाल जी और मुनि फतेहचंद जी का निवेदन
प्रवचन में आचार्य प्रवर ने धर्म संघ
के इतिहास के दो महान संत— मुनि थिरपाल जी और मुनि फतेहचंद जी—का स्मरण किया। पूज्य प्रवर ने फरमाया कि इन दोनों संतों ने परम वंदनीय आचार्य
श्री भिक्षु से विनम्र निवेदन किया..
थे हो बुद्धिमान थां में ज्ञान रो उजास है...
थांरै ऊपर देखो म्हांरो पूरो विश्‍वास है...
कुण दूजो दिल आवैला, ओ संतां !!!
छोड़ो आप अबै इं तपस्या ने म्हारै वास्ते...
लोगां रो कल्याण हुवै लागो उण रासते...
जबरी जागृति आवैला, ओ संतां !!!
ज्ञान और तपस्या का संतुलन:
स्पष्ट किया गया कि जिन संतों में प्रज्ञा, प्रतिभा और बुद्धि का विशेष उजास है, उन्हें केवल तपस्या तक ही सीमित नहीं रहना चाहिए। उन्हें अपनी शक्ति का उपयोग ज्ञान के प्रसार, लेखन, अनुवाद और लोगों को प्रतिबोध देने में भी करना चाहिए।

दरवाजे बंद, त्रिपाल ताना... फिर कैसे हुआ अंधेरे का आना?..
बहु को हिदायत : एक बार सास ने घर से बाहर जाते समय बहू को हिदायत दी कि 'घर में अंधेरा न घुसने पाए'। बहू ने इसे इतना गंभीरता से लिया कि दरवाजे-खिड़कियां बंद कर आँगन में त्रिपाल तक डाल दिया।
अंधेरे का आगमन : शाम को जब घर में अंधेरा छाया, तो वह घबरा गई और लाठी उठाकर दरवाजे-खिड़कियों को पीटने लगी ताकि अंधेरा बाहर निकल जाए। सास ने लौटकर देखा तो मुस्कुराते हुए समझाया कि अंधेरे को डंडे से पीटने की जरूरत नहीं, बस एक दीपक जलाने की आवश्यकता है।
सीख : आचार्य श्री का पावन संदेश: भीतर के अज्ञान रूपी अंधकार को भगाने के लिए व्यर्थ संघर्ष या प्रहार की नहीं, बल्कि ज्ञान का दीपक जलाने की आवश्यकता है। ज्ञान का प्रकाश होते ही अज्ञान का अंधेरा स्वतः समाप्त हो जाता है।