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धर्मकथा से होती है कर्मों की निर्जरा और शासन की प्रभावना : आचार्यश्री महाश्रमण
जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के एकादशमाधिशास्ता, भगवान महावीर के प्रतिनिधि, युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमण जी ने मुख्य मंगल प्रवचन कार्यक्रम में सुधर्मा सभा में उपस्थित चतुर्विध धर्मसंघ को स्वाध्याय के पाँचवें अंग ‘धर्मकथा से क्या मिलेगा?’ विषय पर अमृत देशना प्रदान की। पूज्य प्रवर ने प्रवचन व व्याख्यान को स्वयं के आत्म-कल्याण और धर्म प्रभावना का सशक्त माध्यम बताया।
स्वाध्याय का पाँचवाँ अंग :
१. धर्मकथा (प्रवचन व व्याख्यान) ज्ञान का वितरण : पूज्य आचार्यश्री ने फरमाया कि स्वाध्याय के प्रथम चार अंग वाचना, प्रतिपृच्छना, परिवर्तना और अनुप्रेक्षा हैं, जिनके द्वारा ज्ञान को आत्मसात किया जाता है। इस प्राप्त ज्ञान को यथाऔचित्य दूसरों तक पहुँचाने का माध्यम पाँचवाँ अंग 'धर्मकथा' है। सीधी भाषा में धर्मकथा का तात्पर्य प्रवचन या व्याख्यान देना है।
२. अणुव्रत, प्रेक्षाध्यान व जीवन विज्ञान की त्रिवेणी : आचार्य श्री ने 'त्रिवेणी' का एक बहुत ही सुंदर और प्रेरणादायक प्रसंग प्रस्तुत किया है। पूज्य प्रवर ने धर्म संघ द्वारा संचालित तीन प्रमुख जन-कल्याणकारी कार्यक्रमों को 'त्रिवेणी' की संज्ञा दी है:
अणुव्रत : नैतिकता और संयम का मार्ग।
प्रेक्षा ध्यान : मानसिक शांति और आत्म-साधना का मार्ग।
जीवन विज्ञान : जीवन जीने की कला और सकारात्मक दृष्टिकोण।
आचार्य श्री ने फरमाया कि ये तीन कार्यक्रम आम जनता के लिए मानवता की दृष्टि से अत्यंत उपयोगी हैं। ये केवल एक संप्रदाय तक सीमित नहीं हैं, बल्कि जैन और गैर-जैन, हर किसी के लिए लाभदायक हैं। इस प्रसंग के माध्यम से पूज्य प्रवर ने आह्वान किया कि व्यक्ति को इन तीनों के 'संगम' में डुबकी लगाकर अपने जीवन को नैतिक और अर्थपूर्ण बनाना चाहिए।
धर्मकथा से प्राप्त होने वाले ३ महान आगमिक लाभ :
पूज्य प्रवर ने शास्त्रों के आधार पर धर्मकथा के तीन मुख्य लाभों का विवेचन किया।
१. कर्मों की निर्जरा : धर्मकथा करने वाला निर्जरा करता है। प्रवचन के समय भीतर का अध्यवसाय शुभ योग में रहता है। वचन का पुरुषार्थ होता है और गर्मी या असुविधा को शांतिपूर्वक सहने से कायिक व मानसिक तप द्वारा निर्जरा का लाभ मिलता है।
२. धर्म प्रभावना व वाणी का संयम : व्याख्यान देने वाला धर्म की प्रभावना करता है। वक्ता को विशेष ध्यान रखना चाहिए कि परिषद में किसी का नाम लेकर गलत रूप में टिप्पणी न करे, जिससे अप्रभावना हो। प्रवचन ऐसा हो जिससे लोगों में धर्म के प्रति रुझान बढ़े।
३. सुकृत का बंध : धर्मकथा का प्रभावक भविष्य के लिए कल्याणकारी कर्मों और उच्च पुण्य का बंध करता है।
साधु-साध्वियों के लिए पूज्य प्रवर के विशेष निर्देश :
१. नियमितता व श्रम की परवाह नहीं : श्रद्धा के क्षेत्र में २-३ सप्ताह या १ महीने का प्रवास हो, तो आठ प्रहर में कम से कम एक बार व्याख्यान होना चाहिए। अपने श्रम की अधिक परवाह किए बिना उपदेश देना चाहिए, क्योंकि इससे वक्ता स्वयं भी लाभान्वित होता है।
२. समय का अनुशासन व पूर्व तैयारी : व्याख्यान सही व निर्धारित समय पर प्रारंभ हो और समापन में अनावश्यक देरी न हो। वक्तव्य को प्रभावशाली बनाने के लिए पूर्ण तैयारी के साथ जाना चाहिए।
३. सार्वजनिक मंचों पर नैतिकता का संदेश : विद्यालय, जेल, व्यापारी, वकील या राजनीतिक मंचों पर अवसर मिलने पर संयम, नैतिकता और ईमानदारी की बातें अवश्य बतानी चाहिए ताकि जन-जन का जीवन सुधर सके।