गुरुवाणी/ केन्द्र
शारीरिक स्वास्थ्य, प्रसन्नता और मजबूत मनोबल है जीवन की उपलब्धि : आचार्यश्री महाश्रमण
जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के एकादशम अधिशास्ता, भगवान महावीर के प्रतिनिधि, महातपस्वी आचार्यश्री महाश्रमण जी ने सुधर्मा सभा में उत्तरज्झयणाणि आगम के माध्यम से ‘सुखकामना के त्याग से क्या मिलेगा?’ विषय पर चतुर्विध धर्मसंघ को पावन देशना प्रदान की। पूज्य प्रवर ने भौतिक व आध्यात्मिक सुख, चार्वाक बनाम आस्तिक दर्शन तथा सुख-सुविधाओं के त्याग से प्राप्त होने वाली 'अनुत्सुकता' के तात्त्विक रहस्य का विस्तृत विवेचन किया।
ऐंद्रियक और अतींद्रिय सुख का तात्त्विक भेद
१. आगम प्रश्न व प्राणी स्वभाव: पूज्य आचार्यश्री ने आगमिक प्रश्न को स्पष्ट करते हुए फ़रमाया कि सुख की स्पृहा (कामना) के निवारण करने से जीव क्या प्राप्त करता है? क्या उत्पन्न करता है? प्राणी के मन में सुख की स्पृहा भी रह सकती है। ऐसा कौन सा सामान्य प्राणी होगा जिसके भीतर में सुख की इच्छा न हो।
२. सुख के दो प्रकार : सुख दो प्रकार का होता है—एक ऐंद्रियक सुख और दूसरा अतींद्रिय या इंद्रियातीत सुख। आदमी इंद्रियों और मन के जगत में जीता है। पांच इंद्रियों के पांच विषय हैं—श्रोत का विषय शब्द, चक्षु का रूप, घ्राण का गंध, जिह्वा का रस और स्पर्शन का स्पर्श।
३. भौतिक बनाम आभ्यंतर सुख : शब्द, रूप, गंध, रस और स्पर्श यह भौतिक जगत है। आदमी के मन में इस भौतिक दुनिया के सुखों को पाने की आकांक्षा रह सकती है। भौतिक जगत से जो सुख मिलता है वह भौतिक, बाह्य और पौद्गलिक सुख है। दूसरा सुख आभ्यंतर सुख है, जो कर्मों के झड़ने और निर्जीर्ण होने से प्राप्त होता है।
१. चार्वाक का नास्तिक दृष्टिकोण: चार्वाक दर्शन एक नास्तिक दर्शन है जो नास्तिक दर्शन से संबद्ध है। उनके अपने विचार हैं कि खूब मौज-मस्ती, भोग-विलास करो, खाओ-पीओ मौज करो। पूज्यश्री ने उदारता व्यक्त करते हुए फरमाया कि मैं नास्तिक आदमी की भी अवज्ञा नहीं करना चाहता क्योंकि सबके अपने विचार और दृष्टिकोण हैं। यह दर्शन पुनर्जन्म को नहीं मानता है, केवल वर्तमान जीवन को ही स्वीकार करता है। इसलिए उनके अनुसार त्याग, तपस्या, कष्ट सहना सब व्यर्थ हैं; जब तक जिओ खूब भौतिक सुखों का भोग करो।
२. जैन दर्शन का शाश्वत सिद्धांत: एक आस्तिकवादी अर्थात् आत्मवादी दर्शन है जिसमें आत्मा का शाश्वत अस्तित्व माना गया है। आत्मा हमेशा थी, वर्तमान में है और आगे हमेशा रहेगी। जैन दर्शन में पुनर्जन्म का सिद्धांत है। यहाँ आत्मावाद, कर्मवाद और लोकवाद का सिद्धांत है।
३. सावधानी और कर्मफल : जैन दर्शन में कहा गया है कि इस जीवन के बाद फिर आगे कहीं जाना है, इसलिए संभल कर रहना चाहिए। दिन में ऐसा कोई कार्य न करें जिससे कि रात की नींद खराब हो। रात को ऐसा कोई काम नहीं करना चाहिए कि दिन में खाना मुश्किल हो जाए। जैन दर्शन में आत्मवाद के साथ कर्मवाद का भी सिद्धांत है कि अच्छे कर्म का फल अच्छा और बुरे कर्म का फल बुरा होता है। यदि आदमी त्याग, तपस्या करेगा तो उसका कल्याण होगा और आध्यात्मिक सुख मिल सकेगा।
अनुत्सुकता, अनुकंपा और मोहनीय कर्म का क्षय:
१. सुख त्याग से अनुत्सुकता : आदमी को भौतिक सुखों की कामना का निवारण करना चाहिए। साधु गृहस्थ जीवन को छोड़कर महाव्रतों को स्वीकार करता है और वह अनेक सुख-सुविधाओं का त्याग कर देता है। लंबे विहार में थोड़ा कष्ट भी हो सकता है, अतः पदयात्रा भी एक प्रकार से सुख का त्याग है। आचार्य श्री तुलसी ने अपने जीवन काल में अनेक लंबी-लंबी यात्राएं कीं। उन्होंने कितना परिश्रम और सुख का त्याग किया।
२. अनुत्सुकता से दया और शांति : शास्त्र में कहा गया कि सुख का निवारण करने से अनुत्सुकता मिलती है। यदि कामना नहीं होती तो उत्सुकता भी अपने आप समाप्त हो जाती है। जो जीव अनुत्सुक होता है वह अनुकंपाशील बन जाता है, उसमें दया की भावना पैदा हो जाती है। इसके कारण वह शांत-प्रशांत रहता है। इसके बाद जीव मोहनीय कर्म का क्षय कर देता है।
पावन प्रेरणा व जीवन सूत्र :
१. सुविधावादी मनोवृत्ति का परित्याग : पूज्यश्री ने फरमाया कि साधु-साध्वियों को खूब परिश्रम करना चाहिए और सुविधावादी मनोवृत्ति का परित्याग करना चाहिए। जब तक स्वास्थ्य अच्छा रहे, अच्छे कार्यों में अपने आपको नियोजित करते रहना चाहिए। साधु को लालसा मुक्त होकर अच्छा काम करना चाहिए।
२. जीवन की वास्तविक उपलब्धि : चित्त में शांति और समाधि रहनी चाहिए। मनोबल अच्छा रहे, भयभीत नहीं होना चाहिए। किसी भी स्थिति में शारीरिक स्वास्थ्य, प्रसन्नता और मनोबल—ये तीन चीजें हैं तो एक दृष्टि से हमारा जीवन उपलब्धि पूर्ण है।