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तप से होती है आत्मा निर्मल
जैन दर्शन में तप के बारह प्रकार बताए गए हैं, जिनके माध्यम से त्याग, संयम और साधना की भावना को विकसित किया जाता है। इसी आध्यात्मिक साधना की प्रेरणादायी मिसाल प्रस्तुत करते हुए कुसुम कोठारी ने कटक में मुनि मोहजीत कुमार जी के सान्निध्य में 30 दिवसीय मासखमण तप का प्रत्याख्यान किया।कटक चातुर्मास के अंतर्गत मुनिश्री के सान्निध्य में यह द्वितीय मासखमण का तप हुआ। उनके तप की अनुमोदना में आयोजित प्रत्याख्यान समारोह में संबोधित करते हुए मुनि मोहजीत कुमार जी ने कहा कि तप आत्मशुद्धि के साथ-साथ संघ की प्रभावना और वृद्धि का भी महत्वपूर्ण आधार है। मोक्ष की ओर ले जाने वाले मार्ग में तप का विशेष स्थान है। तपस्वी का उद्देश्य कर्मों की निर्जरा करते हुए आत्मा को अधिक निर्मल बनाना है। तप शरीर, मन और भावों को अनुशासित करने तथा आंतरिक शुद्धि का सशक्त माध्यम है। मुनि श्री ने कहा कि भारतीय आध्यात्मिक परंपराओं में तपस्या को सदैव विशेष महत्व मिला है। जैन धर्म में तप की साधना अपनी विशिष्ट पहचान रखती है, जिसमें त्याग, संयम तथा कई अवसरों पर निराहार एवं निर्जल साधना का भी समावेश होता है। तप व्यक्ति के भीतर धैर्य, आत्मविश्वास और संकल्प की शक्ति को विकसित करता है। मुनि भव्यकुमार जी ने तप की उपयोगिता पर प्रकाश डालते हुए कहा कि तप उच्च मनोबल और आत्मसाधना की दिशा में बढ़ने का प्रथम सोपान है। निरंतर साधना के द्वारा व्यक्ति अपनी इच्छाओं पर नियंत्रण प्राप्त करता है और आत्मिक विकास की ओर कदम बढ़ाता है। वहीं मुनि जयेश कुमार जी ने तपस्या के अनुभवों को रेखांकित करते हुए कहा कि दीर्घकालीन तप के दौरान साधक को अनेक प्रकार के अनुभवों और उतार-चढ़ावों से गुजरना पड़ता है। आहार की स्थिति में व्यक्ति को मुख्यतः बाहरी ऊर्जा का अनुभव होता है, जबकि निराहार साधना के दौरान उसकी अंतर्निहित शक्ति और आत्मबल का अनुभव अधिक स्पष्ट रूप से सामने आता है।