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रक्षाबंधन - भाईचारे से विश्व-बंधुत्व तक का पावन सेतु
आचार्यश्री महाश्रमणजी के विद्वान् सुशिष्य मुनि श्री आनंद कुमार 'कालू' ने कहा कि पवित्र प्रेम, स्नेह और सौहार्द भाव को बढ़ाने वाला पर्व है रक्षाबंधन। भारतीय परम्परा में अनेक पर्व है जिसमें रक्षाबंधन का पर्व अपने आप में विशिष्ट कहलाता है। रक्षा शब्द विश्व इतिहास में महत्त्वपूर्ण रहा है। प्रत्येक व्यक्ति में सुरक्षा की भावना रहती है, इसीलिए इसे मानव जीवन के लिए यह प्राण, त्राण, शान, आश्वास, विश्वास तथा सत्यं, शिवं, सुन्दरम् का प्रतीक माना गया है। जहां एक गृहस्थ व्यक्ति शरीर, सत्ता, सम्पदा, परिवार तथा संबंधों की सुरक्षा पर ध्यान देता है तो एक आध्यात्मिक और धार्मिक जीवन जीने वाले के लिए आत्म सुरक्षा सर्वोपरि है। उन्होंने कहा कि आज के इस भौतिकता के चकाचौंध में मानव धन को सुरक्षित रखने व बढ़ाने में अपनी शक्ति का उपयोग करता है। अथवा परिवार सत्ता सम्पदा की सुरक्षा करता है।
कटु जीवन में भी मधुरता का संचार करें इतिहास साक्षी है कि व्यक्ति ने अपने राष्ट्र की सुरक्षा के लिए कितने संघर्ष किए हैं, किन्तु रक्षा का मूल हार्द है- जीवन में प्रेम दया, करुणा, अहिंसा, समन्वय, सहयोग की चेतना का जागरण जो कि कटु जीवन में मधुरता का संचार करे तथा सम्पूर्ण विश्व में भाईचारे को स्थापित करें। वसुधैव कुटुम्बकम सम्पूर्ण विश्व को परिवार की उपमा से उपमित करने वाला यह रक्षाबंधन का यह पर्व जैन और वैदिक दोनों परम्पराओं में समान रूप से महत्त्व रखता है। जन जीवन को नैतिकता, प्रामाणिकता और चरित्र निष्ठा का संदेश देने वाला यह पर्व आनंददायी व मंगलकारी है। इसके संबंध में प्राप्त कथानक विचारों की व्यापकता लिए हुए है। उन्होंने कहा कि लाखों-करोड़ों भारतवासी चाहे वे जैन, बौद्ध, सिख, सनातन तथा मुस्लिम धर्म में भी विश्वास करते हैं। राखी के कच्चेधागे जो बहन द्वारा भाई की कलाई पर बांधे जा रहे हैं वह मात्र औपचारिक उपकरण बन रहा है। जहां भाई की सोच अच्छी व कीमती राखी पर अटक रही है तो बहन का ध्यान मात्र धन पर केन्द्रित रह जाता है। वह देखती है कि भाई कितना पैसा (धन) दे रहा है। परन्तु इसके पीछे जो प्यार स्नेह सौहार्द का भाव होना चाहिए वह भुलाया जा रहा है। यदि बहन भाई दोनों अपना नैतिक कर्तव्य समझ कर अपने आपको आरक्षित करे तो पारिवारिक प्रेम, सामाजिक समरसता तथा राष्ट्रीय हितों में अभिवृद्धि हो सकती है।