रचनाएं
युवाचार्य प्रवर अभिनंदन
तेरापंथ धर्मसंघ के एकादशम अधिशास्ता युगप्रधान आचार्य श्री महाश्रमणजी का गौरवशाली महिमामंडित स्वर्णिम शासनकाल रहा है। जन-जन आचार्य पदारोहण के पश्चात् पूरे भारत की ऐतिहासिक यात्राएं की हैं। इन यात्राओं से न केवल तेरापंथ समाज बल्कि मानव मात्र को नशामुक्ति, प्रामाणिकता व सौहार्द का संदेश मिला है। हमारे धर्मसंघ में भी अनेक कीर्तिमान आपके द्वारा रचित हुए हैं, उनमें सबसे महान् धर्मसंघ का निश्चिंत करने वाला 'युवाचार्य प्रवर महावीर (कुमार) जी' का मनोनयन। भैक्षव शासन में अनुशासन व विनय का सर्वोपरि उत्कृष्ट उदाहरण, जो जीवन उत्कृष्ट बनाता है। मारवाड़ की धन्य धरा फलसूंड छोटा सा गाँव, जहाँ युवाचार्य प्रवर का वि. सं. २०४५ द्वितीय ज्येष्ठ शुक्ला ५ को जन्म हुआ। धर्म संघ के साधु-साध्वियों का विशेष प्रवास नहीं होने की वजह से धर्माराधना का योग लगभग नहीं के बराबर रहा। फिर भी पूर्व जन्मों के पुण्य का योग-संयोग अच्छा था कि बहुत लघु वय में ही आप दीक्षा के लिए कटिबद्ध हो गए। परम पूज्य प्रेक्षा प्रणेता आचार्य श्री महाप्रज्ञ जी के मंगलमय आशीर्वाद से वि. सं. २०५८ फाल्गुन कृष्णा ५ तदनुसार सन् २००२, ३ मार्च जसोल गाँव में आप श्री को चारित्र रत्न उपलब्ध हुआ। माता-पिता - श्रीमती छगनी देवी कोचर व श्री सवाई सिंह जी कोचर अपने पुत्र-रत्न को आचार्य प्रवर के चरणों में सौंप अतिशय आनंद की अनुभूति कर रहे थे। दीक्षित होने के पश्चात् आचार्य श्री महाप्रज्ञ जी की आप पर विशेष वात्सल्य व कृपा-दृष्टि रही। आपकी प्रखर प्रतिभा थी कि संघीय सभी परीक्षाओं में आप प्रथम नम्बर पर आते। आगम स्वाध्याय में आपकी अभिरुचि श्लाघनीय रही जिसमें परम पूज्य आचार्य प्रवर ने आप श्री को 'बहुश्रुत श्रुताराधक' से अलंकृत किया। आपका रत्नाधिक सन्तों के प्रति विनय, सेवा भावना तथा श्रम निष्ठा संघ का उपहार है। रम पूज्य आचार्य श्री महाश्रमण जी ने आपका युवाचार्य पद पर मनोनयन कर धर्म संघ को निश्चिंत किया है।