त्याग और आत्म-शुद्धि का महापर्व है पर्युषण : आचार्यश्री महाश्रमण

गुरुवाणी/ केन्द्र

लाडनूं। 08 सितम्बर, 2026

त्याग और आत्म-शुद्धि का महापर्व है पर्युषण : आचार्यश्री महाश्रमण

तेरापंथ धर्मसंघ की राजधानी लाडनूं की धरा पर योगक्षेम वर्ष का महामंगल प्रवास कर रहे जैन श्वेतांबर तेरापंथ धर्मसंघ के एकादशम अधिशास्ता, भगवान महावीर के प्रतिनिधि, युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमण जी की मंगल सन्निधि में पर्वाधिराज पर्युषण का आध्यात्मिक वातावरण में मंगल शुभारंभ हुआ। प्रातःकालीन मंगल प्रवचन सत्र में भाद्रपद मास के इस अतिमहत्त्वपूर्ण पर्व के प्रथम दिन 'खाद्य संयम दिवस' के रूप में साधक वृंद ने साधना का संकल्प लिया।
पर्वाधिराज पर्युषण और चातुर्मास का आध्यात्मिक महत्त्व :
१. आध्यात्मिक साधना का विशेष समय : महातपस्वी आचार्यश्री महाश्रमण जी ने भगवान महावीर की अध्यात्म यात्रा के प्रसंग का शुभारंभ करते हुए फ़रमाया कि भगवान महावीर की अध्यात्म यात्रा का वर्णन पर्युषण पर्वाधिराज के मुख्य प्रवचन कार्यक्रम में किया जाता है। आज से जैन श्वेताम्बर तेरापंथ परंपरा का अतिमहत्त्वपूर्ण पर्व पर्युषण का शुभारंभ हुआ है। भाद्रव महीने में इस पर्व का पदार्पण होता है। इसी से जुड़ा हुआ भगवती संवत्सरी का सर्वोच्च दिन होता है, जिसकी आराधना की जाती है।
२. त्याग व तपस्या की महिमा : चातुर्मास में यों तो चार महीने होते हैं, उनका यथासंभव अच्छा उपयोग हो सकता है। चातुर्मास का पूर्वार्ध, यानी भगवती संवत्सरी तक का समय त्याग, तपस्या आदि की दृष्टि से कुछ अतिरिक्त महत्त्व वाला होता है। यह समय अपने आप में महिमा मंडित वाला है। यह आध्यात्मिक साधना का विशेष समय होता है।
नयसार का भव और सम्यक्त्व की प्राप्ति :
१. संत सेवा और मार्ग दर्शन : आचार्यश्री ने भगवान महावीर की अध्यात्म यात्रा के दौरान नयसार के भव का वर्णन करते हुए फ़रमाया कि नयसार ने साधु संतों को भोजन आदि का दान दिया और रास्ता बताने के लिए मार्ग सेवा में साथ चले।
२. उपदेश से सम्यक्त्व : संतों ने उपदेश दिया, साधुओं द्वारा किसी को उपदेश, ज्ञान आदि देना उपकार का कार्य होता है, इससे नयसार को सम्यक्तव की प्राप्ति हो गई।
प्रज्ञापुरुष श्रीमज्जयाचार्य जी का महाप्रयाण दिवस व खाद्य संयम :
१. चतुर्थ आचार्य का स्मरण: आचार्य श्री ने आगे फ़रमाया कि आज का दिन हमारे धर्म संघ से भी जुड़ा हुआ है। आज हमारे धर्म संघ के चतुर्थ आचार्य प्रज्ञापुरुष श्री मज्जयाचार्य का महाप्रयाण दिवस है। श्रीमज्जयाचार्य एक ज्ञानी व्यक्तित्व थे। बाल्यावस्था में ही उनकी दीक्षा हो गई और बाद में वे धर्म संघ के चतुर्थ आचार्य के रूप में प्राप्त हुए। उन्होंने धर्म संघ के उन्नयन के अनेक कार्य किए। आचार्य श्री ने उनसे संदर्भित एक गीत का आंशिक संगान किया।
२. खाद्य संयम की प्रेरणा : आचार्य श्री ने खाद्य संयम दिवस के संदर्भ में लोगों को खाने में संयम करने की प्रेरणा प्रदान की।
युवाचार्य श्री, साध्वी प्रमुखाजी एवं साध्वी वर्याजी का विचार-पाथेय :
१. युवाचार्य श्री महावीर कुमार जी: युवाचार्य श्री महावीर कुमार जी ने दस धर्मों की व्याख्या के अन्तर्गत 'मुक्ति धर्म' पर अपना उद्बोधन प्रदान करते हुए कहा कि जब तक आदमी के भीतर क्षमा, मुक्ति, रिजुता, मृदुता आदि गुण प्रगट नहीं होते वह आदमी धार्मिक नहीं कहला सकता। यहां मुक्ति धर्म का तात्पर्य है - लोभ कषाय का विरोधी धर्म। जब तक लोभ कषाय विद्यमान रहता है, तब तक मुक्ति की ओर अग्रसर होना संभव नहीं है। व्यक्ति जब निर्लोभता की चेतना को जागृत कर लेता है तो सब बंधनों से मुक्त होने की दिशा में उसकी गति हो जाती है।
२. साध्वीप्रमुखा श्री विश्रुत विभा जी : साध्वी प्रमुखा श्री ने 'खाद्य संयम दिवस' पर उपस्थित जनमेदिनी को उद्बोधन प्रदान करते हुए कहा कि जैसा हम आहार करते हैं, हमारे विचार भी वैसे ही बन जाते हैं। आहार संयम का तात्पर्य है - आहार का विवेक करना। आहार का उद्देश्य क्षुधा निवारण, इंद्रियों की शक्ति को बढ़ाने का होना चाहिए, जिससे यह हमारी संयम यात्रा में सहयोगी बन सके।
३. साध्वीवर्या श्री संबुद्धयशा जी : साध्वी वर्या संबुद्धयशा जी ने पर्युषण के महत्त्व को रेखांकित करते हुए कहा कि जैन धर्म में अनेक पर्व मनाए जाते हैं किन्तु पर्युषण पर्व का एक अलग ही महत्व है क्योंकि यह पर्व आत्मा व आत्मा की शुद्धि से जुड़ा हुआ है। इसी कारण इस पर्व को पर्वाधिराज की संज्ञा दी गई है। पर्युषण के आगमन के साथ ही जन-जन में धर्माराधना करने का उत्साह जागृत हो जाता है।