गुरुवाणी/ केन्द्र
''आयो जैन-जगत रो प्रमुख पर्व संवत्सरी रे, छायो सकल संघ में रंग..."" : आचार्यश्री महाश्रमण
जैन धर्म का महापर्व पर्युषण लाडनूँ की धरा पर स्थित जैन विश्व भारती के सुरम्य व विशाल परिसर में विराजमान जैन श्वेतांबर तेरापंथ धर्मसंघ के ११वें अधिशास्ता, शांतिदूत, अध्यात्मवेता, युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमण जी की पावन सन्निधि में अगाध आध्यात्मिक गरिमा के साथ संपन्न हुआ। पर्वाधिराज पर्युषण का शिखर दिवस 'भगवती संवत्सरी महापर्व' के रूप में आयोजित हुआ। सूर्योदय से पूर्व ही बड़ी संख्या में श्रद्धालु आध्यात्मिक लाभ उठाने हेतु श्रीचरणों में पहुँच गए थे और संपूर्ण परिसर जनाकीर्ण दिखाई दे रहा था। सुधर्मा सभा के मंच पर पूज्यप्रवर के पदार्पण पर श्रद्धालुओं के जयघोष से समूचा वातावरण गुंजायमान हो उठा। कार्यक्रम का शुभारंभ आचार्यश्री द्वारा मंगल महामंत्रोच्चार तथा साध्वीवर्याश्री संबुद्धयशा जी द्वारा 'आत्मा की पोथी पढ़ने का...' गीत के पावन संगान से हुआ।
भगवती संवत्सरी का महात्म्य व जीवनशैली में संस्कारों की प्रेरणा :
१. त्याग, संवर व क्षमा का गरिमामय दिन: पूज्य आचार्यश्री महाश्रमण जी ने पर्वाधिराज पर्युषण के शिखर दिवस पर पावन पाथेय प्रदान करते हुए फरमाया कि आज भगवती संवत्सरी का पदार्पण हुआ है। श्वेतांबर परंपरा में यह दिन भाद्रव शुक्ला चतुर्थी अथवा भाद्रव शुक्ला पंचमी के दिन आता है। वर्ष में अनेक उत्सव आते हैं, किंतु हमारी परंपरा में भगवती संवत्सरी से बढ़कर कोई आध्यात्मिक पर्व नहीं है। यह त्याग, तप, मैत्री और क्षमा का दिन है। कल का दिन प्रायोगिक और व्यावहारिक खमत-खामणा का दिन होता है।
२. तप, साधना व नियम पालन : आज के दिन चारित्रात्माओं के लिए उपवास तथा श्रावक-श्राविकाओं के लिए अष्ट प्रहरी पौषध, चौविहार व तप का दिन होता है। तप में प्रत्याख्यान हो तो संवर की पुष्टि होती है। साधु के ५ महाव्रत, समितियाँ व गुप्तियाँ होती हैं तथा श्रावकों के लिए १२ व्रतों की व्यवस्था है। जो अंतिम श्वास तक अखंड साधुत्व की आराधना करता है, वह भाग्यशाली होता है।
३. युवा पीढ़ी के लिए पावन पाथेय : आचार्यश्री ने प्रेरणा दी कि बाल व युवा पीढ़ी में धर्म के संस्कार रहें। देश या विदेश कहीं भी जाएं, प्रतिदिन कम से कम २१ बार नमस्कार महामंत्र का जप यथा-संभव अवश्य करें। विदेश में भी संवत्सरी उपवास का ध्यान रखें। जीवन में नॉन-वेज (मांसाहार) व शराब आदि व्यसनों से बचने के प्रति जागरूकता होनी चाहिए तथा जैनिज्म व तेरापंथ की न्यूनतम जानकारी रखनी चाहिए। साधु-साध्वी व समणी वृंद बाल पीढ़ी में धार्मिक संस्कारों का बीजारोपण करें।
भगवान महावीर की अध्यात्म
यात्रा : विवाह, कठोर तप, केवलज्ञान से निर्वाण तक :
१. गृहस्थ जीवन व २ वर्षों का कठोर संकल्प : पूज्यश्री ने अध्यात्म यात्रा का वाचन आगे बढ़ाते हुए फरमाया कि वसंतपुर नरेश समरवीर की पुत्री यशोदा के साथ वर्धमान का विवाह हुआ और वे एक पुत्री के पिता बने। माता-पिता के समाधिमरण के पश्चात वर्धमान ने अपने भ्राता नंदिवर्धन व चाचा सुपार्श्व से दीक्षा की अनुमति मांगी। नंदिवर्धन के आग्रहानुसार दो वर्षों के राजकीय शोक के दौरान वर्धमान ने धरती पर शयन, पूर्ण ब्रह्मचर्य और सचित्त जल से स्नानादि के त्याग का कठोर संकल्प लेकर साधना का जीवन जिया।
२. वर्षीदान, निष्क्रमण व पंचमुष्टि लोंच : दीक्षा में एक वर्ष शेष रहने पर नवलोकान्तिक देवों के प्रतिबोध के पश्चात वर्धमान ने १ वर्ष तक वर्षीदान किया। दीक्षा के दिन देवनिर्मित भव्य शिविका में विराजित होकर ज्ञातखंड उद्यान पहुँचे। अशोक वृक्ष के नीचे समस्त वस्त्र-आभूषण त्याग कर मगसर कृष्णा दशमी के दिन, तीसरे प्रहर में पूर्वाभिमुख होकर पंचमुष्टि लोंच किया और चारित्र ग्रहण किया। उन्होंने देव, मनुष्य या तिर्यंचकृत उपसर्गों को सहने का संकल्प लिया।
३. भीषण उपसर्ग, १० स्वप्न व केवलज्ञान : प्रथम दिन कर्मारग्राम में ग्वाले द्वारा उपसर्ग हुआ। प्रथम चातुर्मास तापस आश्रम में बिताने के पश्चात ५ अभिग्रह स्वीकार किए। चंडकौशिक सर्प व शूलपाणि यक्ष के उपसर्गों में भी भगवान अडोल रहे। तंद्रा की स्थिति में १० स्वप्न देखे, जिनका फल प्रभु ने स्वयं बताते हुए अणगार और अगार धर्म के निरूपण की बात कही। साधना में बेले से कम की तपस्या नहीं की।
चंदनबाला के कल्याण के पश्चात, जृंभिकग्राम के बाहर ऋजुबालिका नदी के तट पर श्यामक गृहपति के खेत में शाल वृक्ष के नीचे वैशाख शुक्ला दशमी को उत्तराफाल्गुनी नक्षत्र में बेले के तप व गोदोहिका आसन में प्रभु ने केवलज्ञान-केवलदर्शन प्राप्त किया। ७२वें वर्ष में कार्तिक कृष्णा अमावस्या को भगवान निर्वाण को प्राप्त हुए। पूज्यश्री ने 'मिच्छामि दुक्कडं' लेते हुए वाचन संपन्न किया।
अपराह्न सत्र: तेरापंथ की गौरवशाली आचार्य परंपरा का प्रामाणिक विवरण :
१. स्वामी भिक्ष स्वामी व बगड़ी अभिनिष्क्रमण : अपराह्न ३ बजे पूज्य प्रवर पुनः पांडाल में पधारे और तेरापंथ की आचार्य परंपरा का वर्णन करते हुए फरमाया कि हमारे प्रथम आचार्य परम पूज्य भिक्षु स्वामी हुए। स्थानकवासी परंपरा में आचार-संवादिता न दिखने तथा राजनगर प्रसंग में रात्रि को तेज बुखार आने पर विशेष संवेग जाग्रत हुआ। भिक्षु स्वामी ने वि.सं. १८१७ में बगड़ी में अभिनिष्क्रमण किया। आषाढ़ शुक्ला पूर्णिमा को तेरापंथ स्थापना दिवस बना और केलवा में प्रथम चातुर्मास हुआ। तत्पश्चात् आचार्यश्री ने प्रत्येक आचार्यश्री के संक्षिप्त विवरण व उनके कार्यकाल में हुए धर्मसंघ के विकास की व्याख्या प्रस्तुत की।
२. युवाचार्य श्री व साध्वी प्रमुखा जी का वक्तव्य : युवाचार्य महावीर कुमार जी ने क्षमाधर्म का विवेचन किया। अपराह्न सत्र में आचार्य श्री महाश्रमण जी के जीवन प्रसंगों का वर्णन करते हुए फरमाया कि पूज्य आचार्यश्री में पूर्ववर्ती सभी आचार्यों के गुणों के दर्शन होते हैं। युवाचार्यश्री ने पूज्यश्री को धर्मसंघ को नूतन दिशा देने वाला 'आर्किटेक्ट' बताया। साध्वी प्रमुखा विश्रुत विभा जी
ने भी संवत्सरी के महत्त्व पर विचार व्यक्त किए।