देवानंदा से त्रिशला की कुक्षि में पधारे प्रभु वर्धमान : आचार्यश्री महाश्रमण

गुरुवाणी/ केन्द्र

लाडनूं। 14 सितम्बर, 2026

देवानंदा से त्रिशला की कुक्षि में पधारे प्रभु वर्धमान : आचार्यश्री महाश्रमण

जैन धर्म का महापर्व पर्युषण लाडनूं की धरा पर स्थित जैन विश्व भारती के सुरम्य व विशाल परिसर में विराजमान जैन श्वेतांबर तेरापंथ धर्मसंघ के ११वें अधिशास्ता, भगवान महावीर के प्रतिनिधि, अहिंसा यात्रा प्रणेता, युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमण जी की मंगल सन्निधि में सानंद गतिमान है। पर्वाधिराज पर्युषण का सातवाँ दिवस एवं भगवती संवत्सरी का पूर्ववर्ती दिवस 'ध्यान दिवस' के रूप में अगाध आध्यात्मिक गरिमा के साथ समायोजित हुआ। कार्यक्रम का शुभारंभ साध्वी मधुलता जी आदि साध्वियों द्वारा ध्यान दिवस पर गीत संगान तथा पूज्य प्रवर के मंगल महामंत्रोच्चार से हुआ।
भगवान महावीर की अध्यात्म यात्रा : गर्भ परिवर्तन से बाल वर्धमान की पाठशाला तक :
१. हरिणै गमेसी देव द्वारा गर्भ-अपहारण : पूज्य आचार्यश्री महाश्रमण जी ने 'भगवान महावीर की अध्यात्म यात्रा' का वाचन करते हुए फरमाया कि जब प्रभु महावीर की आत्मा देवानंदा ब्राह्मणी की कुक्षि में गर्भस्थ हुई, तो प्रथम देवलोक के इंद्र (शक्रेंद्र) के मन में विचार आया कि परंपरानुसार विशिष्ट पुरुष जैसे तीर्थंकर उच्च कुल में जन्म लेते हैं। उन्होंने हरिणै गमेसी देव को निर्देश दिया, जिन्होंने प्रभु के गर्भ को देवानंदा की कुक्षि से त्रिशला क्षत्रियाणी की कुक्षि में तथा त्रिशला के गर्भ को देवानंदा की कुक्षि में स्थापित कर दिया।
२. त्रिशला के १४ स्वप्न व माता-पिता के प्रति समर्पण : क्षत्रियाणी त्रिशला को १४ महास्वप्न दिखाई दिए। राजा सिद्धार्थ द्वारा स्वप्न शास्त्रज्ञों से फल पूछने पर उन्होंने बताया कि गर्भस्थ बालक विशिष्ट धर्म राज्याधिपति या धर्म चक्रवर्ती बनेगा। एक बार गर्भस्थ शिशु माता के कष्ट के भय से निश्चल हो गया, जिससे माता ने दुःखी होकर बालक की मृत्यु की आशंका व्यक्त की। माता को उदास देख गर्भस्थ प्रभु ने पुनः स्पंदन शुरू किया और उसी समय गर्भ में ही यह संकल्प लिया—'जब तक मेरे माता-पिता संसार में रहेंगे, मैं दीक्षा नहीं लूँगा।' यह माता-पिता के प्रति उनका अगाध समर्पण भाव था।
३. प्रभु का जन्म व पाठशाला में इंद्र का आगमन : ईसापूर्व ५९९ और विक्रम पूर्व ५४२ में चैत्र शुक्ला त्रयोदशी के दिन उत्तर फाल्गुनी नक्षत्र में भगवान महावीर का जन्म हुआ। महाराज सिद्धार्थ ने विपुल दान दिया, कैदियों को मुक्त किया और बालक का नाम 'वर्धमान' रखा। जब वर्धमान को शिक्षा हेतु पाठशाला भेजा गया, तो कलाचार्य जी आसन पर और बाल वर्धमान नीचे विराजे। यह देखकर इंद्र ने ब्राह्मण रूप धारण कर कलाचार्य से कुछ गूढ़ प्रश्न पूछे, जिनका उत्तर वे न दे सके, परंतु बालक वर्धमान ने तत्क्षण सटीक उत्तर दे दिए। उसी दिन वर्धमान की पाठशाला से छुट्टी हो गई। बड़े होने पर माता-पिता के समक्ष उनके विवाह का चिंतन शुरू हुआ।
ध्यान साधना की पावन प्रेरणा:
भीतर की गहराइयों में उतरने का माध्यम: ध्यान दिवस पर पावन प्रेरणा प्रदान करते हुए पूज्य आचार्यश्री ने फरमाया कि ध्यान साधना बहुत अच्छी बात है और तेरापंथ में प्रेक्षाध्यान के माध्यम से ध्यान का प्रयोग होता है। ध्यान साधना का एक प्रमुख अंग है। मनुष्य अपने भीतर की गहराइयों में उतर सके, इसके लिए ध्यान का निरंतर प्रयास करना चाहिए।
युवाचार्य श्री, साध्वीप्रमुखा जी, साध्वीवर्या जी का प्रेरक विचार-पाथेय:
१. ब्रह्मचर्य धर्म का व्यापक रूप : युवाचार्य श्री महावीर कुमार जी ने दस धर्मों के अंतर्गत 'ब्रह्मचर्य धर्म' की व्याख्या करते हुए कहा कि ब्रह्मचर्य व्यापक अर्थ रखने वाला धर्म है। सामान्यतः इसे इंद्रिय व मन के निग्रह और मैथुन व्रत के रूप में देखा जाता है, परंतु अपनी इंद्रियों की दिशा को विषयों से हटाकर आत्मा की ओर ले जाना, भोग से योग तथा चंचलता से चित्त की स्थिरता की ओर ले जाना भी ब्रह्मचर्य है। साधक को इसके बाधक तत्वों से बचना चाहिए तथा गृहस्थों को भी इस महान व्रत की दिशा में यथासंभव प्रयास करना चाहिए।
२. ध्यान योग व प्रेक्षाध्यान की महत्ता : साध्वीप्रमुखा श्री विश्रुत विभा जी ने कहा कि सबसे श्रेष्ठ प्रकाश आत्मा का होता है और उसे हम ध्यान के द्वारा प्राप्त कर सकते हैं। प्राचीन आचार्यों ने लिखा है कि ध्यान के समान दूसरा कोई तीर्थ नहीं है और न ही कोई तप। मन को एकाग्र करना और योगों का निरोध करना ही ध्यान है। आचार्य श्री महाप्रज्ञ जी ने 'प्रेक्षाध्यान' पद्धति को विकसित किया, जिसका अर्थ है—गहराई में जाकर देखना, राग-द्वेष मुक्त होकर देखना। ध्यान द्वारा हम उस सत्य को प्राप्त करें जिससे वीतरागता तक पहुँचा जा सके।
३. भगवती अंग व जयाचार्य कृत 'भगवती जोड़': साध्वीवर्या श्री संबुद्धयशा जी ने विशालतम आगम 'भगवती' और 'भगवती जोड़' पर वक्तव्य देते हुए कहा कि भगवती द्वादशांगी का ५वाँ अंग आगम है, जो प्रश्नोत्तर शैली में रचा गया तत्त्वज्ञान का विशालतम ग्रंथ है। इसमें अनेक ऐतिहासिक घटना प्रसंग प्राप्त होते हैं। जयाचार्य प्रवर ने इस सूत्र पर राजस्थानी भाषा में 'भगवती जोड़' की रचना की। इतने विशाल ग्रंथ की रचना जयाचार्य जी ने मात्र ५ वर्षों में पूरी कर दी, जो उनकी निर्मल मेधा और प्रतिभा संपन्नता का अनुपम प्रमाण है।