गुरुवाणी/ केन्द्र
11 लाख 60 हजार मासखमण का महातप: राजर्षि नंदन ने बांधा तीर्थंकर नाम-गोत्र : आचार्यश्री महाश्रमण
जन-जन को आध्यात्मिक अमृत का अभिसिंचन प्रदान करने वाले जैन श्वेतांबर तेरापंथ धर्मसंघ के एकादशम अधिशास्ता, अखंड परिव्राजक, शांतिदूत आचार्यश्री महाश्रमण जी की पावन सन्निधि में पर्वाधिराज पर्युषण का छठा दिवस 'जप दिवस' के रूप में अगाध आध्यात्मिक गरिमा के साथ आयोजित हुआ। कार्यक्रम का शुभारंभ साध्वी वृंद द्वारा 'प्रज्ञा गीत' संगान, मुनि धैर्यकुमार जी द्वारा २२वें तीर्थंकर भगवान अरिष्टनेमि पर सुंदर प्रस्तुति, साध्वी स्तुतिप्रभा जी के सुमधुर गीत एवं पूज्य प्रवर के मंगल महामंत्रोच्चार से हुआ।
भगवान महावीर की अध्यात्म यात्रा: नंदन राजर्षि के ११.६० लाख मासखमण और देवानंदा के १४ स्वप्न
१. राजर्षि नंदन की घोर तपस्या व तीर्थंकर नाम-गोत्र बंध : पूज्य आचार्यश्री महाश्रमण जी ने 'भगवान महावीर की अध्यात्म यात्रा' के २५वें भव का वाचन करते हुए फरमाया कि प्रभु की आत्मा ७वें देवलोक का आयुष्य पूर्ण कर छत्रा नगरी के राजा जितशत्रु व महारानी भद्रा के पुत्र 'नंदन' के रूप में उत्पन्न हुई। राजा जितशत्रु नंदन को राज्य सौंपकर स्वयं साधु बन गए। नंदन ने कुछ समय राज्य करने के बाद पोरिलाचार्य के पास दीक्षा ग्रहण कर ली। अपने १ लाख वर्ष के दीर्घ संयम पर्याय में उन्होंने आगमों का अध्ययन किया और तपोयोग में लीन हो गए। उन्होंने मासखमण का घोर तप प्रारंभ किया और पूरे संयम काल में कुल ११ लाख ६० हजार मासखमण किए। इस अनुपम तपस्या और अर्हत् भक्ति के प्रभाव से उन्होंने 'तीर्थंकर नाम-गोत्र' का उपार्जन किया।
२. २६वाँ भव, २७वाँ भव व १४ महास्वप्न : दो मास के अनशन के बाद आयुष्य पूर्ण कर आत्मा प्राणत (१०वें) देवलोक में उत्पन्न हुई। २६वें भव का २० सागरोपम आयुष्य पूर्ण कर २७वें भव में प्रभु की आत्मा ब्राह्मण कुंड नगर के ऋषभदत्त ब्राह्मण की पत्नी देवानंदा की कुक्षि में प्रविष्ट हुई। तीन ज्ञान (मति, श्रुत, अवधि) से संपन्न प्रभु के गर्भ में आते ही देवानंदा ने १४ मंगलकारी महास्वप्न देखे। स्वप्न फलादेश पूछते ही ऋषभदत्त ने प्रसन्न होकर कहा कि इनसे अर्थ लाभ, भोग लाभ और देवकुमार के समान दिव्य पुत्र की प्राप्ति होगी।
३. देवेन्द्र का चिंतन : उसी समय देवेन्द्र (शक्रेंद्र) के मन में यह चिंतन उभरा कि तीर्थंकर प्रभु का जन्म किसी क्षत्रिय कुल में होना चाहिए था, ब्राह्मणी की कुक्षि में नहीं। इस स्थिति पर देवेन्द्र विशेष ध्यान देते हैं।
जप साधना की पावन प्रेरणा:
श्वास प्रेक्षा व सहज साधना: पूज्य आचार्यश्री ने जप दिवस पर प्रेरणा प्रदान करते हुए फरमाया कि जप अत्यंत सरल आध्यात्मिक प्रक्रिया है। जब कोई काम न हो तो बैठे-बैठे जप किया जा सकता है। वृद्ध एवं अशक्त व्यक्ति लेटे-लेटे भी श्वास के साथ जप कर सकते हैं। अनुकूलतानुसार श्वास के साथ जप करने से भावों और परिणामों की विशुद्धि बनी रहती है।
युवाचार्य श्री,साध्वी प्रमुखा श्री,साध्वी वर्या जी का विचार-पाथेय:
१. तप-त्याग धर्म और कर्म निर्जरा : युवाचार्य श्री महावीर कुमार जी ने दस धर्मों के अंतर्गत 'तप-त्याग धर्म' की व्याख्या करते हुए कहा कि तप से आत्मा को तपाकर कर्म ग्रंथियों को तोड़ा और शुद्ध किया जा सकता है। तप के १२ प्रकारों में ६ बाह्य और ६ आभ्यंतर हैं। उपवास के अलावा भी तप के ऐसे कई भेद हैं जिनकी साधना से कर्म ग्रंथियाँ समूल नष्ट हो जाती हैं। तप के साथ त्याग को अपनाकर ही जीवन नैया को पार लगाया जा सकता है।
२. मंत्र विद्या व जप योग : साध्वीप्रमुखाश्री विश्रुतविभा जी ने कहा कि भारतीय महर्षियों द्वारा निर्दिष्ट सिद्धि व शुद्धि के उपायों में मंत्र विद्या या जप योग प्रमुख है। जप चंचल मन को एकाग्र करने व भीतरी शक्तियों को जागृत करने का सशक्त व सुगम माध्यम है। भावना से भावित शब्द की आवृत्ति ही जप है। मंत्र जप में चार बातें—उच्चारण की शुद्धता, अर्थ बोध, लयबद्धता और जप करने की सही विधि अत्यंत आवश्यक हैं। जप का मूल प्रयोजन आत्माराधना होना चाहिए।
३. आचारांग सूत्र व आचार निष्ठा : साध्वीवर्या श्री संबुद्धयशा जी ने जैनागमों में मान्य ३२ आगमों में प्रथम अंग 'आचारांग सूत्र' पर चर्चा करते हुए कहा कि आचारांग आचार से संबंधित ग्रंथ है तथा भगवान महावीर की वाणी और विचारों का प्रतिनिधि ग्रंथ है। आचार समाज और संस्कृति का प्राण है। जिसके जीवन में बहुश्रुतता तो है लेकिन आचार नहीं है, उसका जीवन और ज्ञान केवल भार मात्र बन जाता है।