गुरुवाणी/ केन्द्र
सामायिक श्रावक जीवन का एक अच्छा अनुष्ठान है : आचार्यश्री महाश्रमण
तेरापंथ धर्मसंघ की राजधानी लाडनूं स्थित जैन विश्व भारती के सुरम्य परिसर की सुधर्मा सभा में पर्वाधिराज पर्युषण का तृतीय दिवस 'सामायिक दिवस' के रूप में जैन श्वेतांबर तेरापंथ धर्मसंघ के एकादशम अधिशास्ता, शांतिदूत आचार्यश्री महाश्रमण जी की मंगल सन्निधि में अगाध आध्यात्मिक गरिमा के साथ आयोजित हुआ। सुगुरु के दर्शन एवं पर्वाधिराज का आध्यात्मिक लाभ लेने हेतु बड़ी संख्या में श्रद्धालु उपस्थित रहे।
भगवान महावीर की अध्यात्म यात्रा : (मरीचि से त्रिपृष्ठ वासुदेव तक का भवांतर)
१. मरीचि का अस्वस्थ होना व देवलोक : पूज्य आचार्यश्री महाश्रमण जी ने 'भगवान महावीर की अध्यात्म यात्रा' के क्रम को आगे बढ़ाते हुए फरमाया कि मरीचि साधु परंपरा से अलग होकर साधना करते हुए बीमार हो गया। शरीर व्याधियों का मंदिर है। मरीचि बाद में स्वस्थ हुआ और आयुष्य पूर्ण कर ५वें देवलोक में उत्पन्न हुआ।
२. भवांतर व निदान का प्रसंग : ५वें भव में वह कौशिक ब्राह्मण, ६ठे भव में पुष्यमित्र ब्राह्मण बना। देवगति और मनुष्य गति के एकांतर भव करते हुए १५वें भव में पुनः ५वें देवलोक और १६वें भव में राजपरिवार में जन्म लेकर दीक्षा ली। परंतु वहाँ उसने 'निदान' (तप-साधना को भौतिक सुखों के लिए दांव पर लगाना) कर लिया। १७वें भव में वह ७वें देवलोक पहुँचा।
३. पोतनपुर में त्रिपृष्ठ रूप में जन्म व प्रतिवासुदेव अश्वग्रीव : ७वें देवलोक से च्युत होकर १८वें भव में आत्मा ने पोतनपुर के राजा प्रजापति की रानी मृगावती के गर्भ से 'त्रिपृष्ठ' (भावी प्रथम वासुदेव) के रूप में जन्म लिया। दूसरी रानी भद्रा से राजकुमार अचल (बलदेव) का जन्म हुआ। उसी कालखंड में ३ खंडों का अधिपति प्रतिवासुदेव 'अश्वग्रीव' था, जिसकी राजधानी रत्नपुर थी। ज्योतिषी ने अश्वग्रीव की मृत्यु के दो लक्षण बताए थे, जिनकी चर्चा यथासमय होगी।
सामायिक की पावन प्रेरणा:
जीवन का अनुष्ठान व भूषण: पूज्य आचार्यश्री ने सामायिक की पावन प्रेरणा देते हुए फरमाया कि २४ घंटों में से प्रतिदिन कम से कम ४८ मिनट (प्रति घंटा २ मिनट) सामायिक के लिए अवश्य निकालने चाहिए। शनिवार सायंकाल ७ से ८ के बीच और ब्रह्मबेला में सामायिक अत्यंत लाभदायी है। सामायिक श्रावक जीवन का अनुष्ठान और आभूषण है। पर्युषण के दिनों में प्रतिदिन कम से कम ३ सामायिक करने का प्रयास करना चाहिए।
युवाचार्य श्री, साध्वी प्रमुखाजी, साध्वीवर्या जी का विचार-पाथेय :
१. लाघव धर्म (द्रव्य व भाव लाघव) : युवाचार्य श्री महावीर कुमार जी ने दस धर्मों के अंतर्गत 'लाघव धर्म' की व्याख्या करते हुए कहा कि लाघव का अर्थ हल्कापन, लघुता या भारहीनता है। यह दो प्रकार का होता है—द्रव्य लाघव (उपकरणों की अल्पता) और भाव लाघव (अहंकार, मूर्च्छा व गौरव की अल्पता)। गृहस्थ जीवन में अकिंचनता का किंचित् अभ्यास शांतिप्रद है। लाघव की साधना से आत्मा कर्मों से हल्की होकर सिद्धावस्था को प्राप्त कर सकती है।
२. सामायिक की गहराई व राग-द्वेष से मुक्ति : साध्वीप्रमुखा श्री विश्रुतविभा जी ने सामायिक दिवस पर प्रकाश डालते हुए कहा कि 'समय' का अर्थ है क्षण। जो व्यक्ति वर्तमान क्षण में जीता है, वह राग-द्वेष से मुक्त होकर जी सकता है; वही वास्तविक सामायिक का क्षण है। सामायिक के दौरान पारिवारिक या व्यावसायिक वार्तालाप से बचकर बाहरी दुनिया से ध्यान हटाकर स्वयं को आत्मा से जोड़ने का प्रयास करना चाहिए।
३. आत्मकर्तृत्व वाद का सिद्धांत : साध्वीवर्या श्री संबुद्धयशा जी ने उद्बोधन देते हुए कहा कि भगवान महावीर शाश्वतदर्शी थे। आत्मकर्तृत्व वाद जैन दर्शन का महत्वपूर्ण सिद्धांत है, जिसके अनुसार आत्मा स्वयं अपने कर्मों की कर्ता और भोक्ता है। व्यक्ति अपने कर्तृत्व से ही स्वयं अपने भविष्य का निर्माण करता है।