व्रत और संयम का संकल्प ही खोलता है आत्म-कल्याण का द्वार : आचार्यश्री महाश्रमण

गुरुवाणी/ केन्द्र

लाडनूं। 12 सितम्बर, 2026

व्रत और संयम का संकल्प ही खोलता है आत्म-कल्याण का द्वार : आचार्यश्री महाश्रमण

तेरापंथ धर्मसंघ की राजधानी लाडनूं स्थित जैन विश्व भारती के सुरम्य परिसर की सुधर्मा सभा में पर्वाधिराज पर्युषण का पंचम दिवस 'व्रत चेतना दिवस' के रूप में जैन श्वेतांबर तेरापंथ धर्मसंघ के एकादशम अधिशास्ता, शांतिदूत आचार्यश्री महाश्रमण जी की पावन सन्निधि में अगाध आध्यात्मिक गरिमा के साथ आयोजित हुआ। कार्यक्रम का शुभारंभ साध्वी वृंद के सुमधुर गीत संगान से हुआ।
भगवान महावीर की अध्यात्म यात्रा: त्रिपृष्ठ वासुदेव का पराक्रम, क्रूरता, नरक गमन व चक्रवर्ती भव:
१. शेर व प्रतिवासुदेव अश्वग्रीव का वध : पूज्य आचार्यश्री महाश्रमण जी ने 'भगवान महावीर की अध्यात्म यात्रा' के क्रम को आगे बढ़ाते हुए फरमाया कि त्रिपृष्ठ ने दोनों जबड़ों को पकड़कर हिंसक शेर का वध कर दिया। भविष्यवाणी के दोनों लक्षण मिलते देख अश्वग्रीव ने छल से बुलाना चाहा, पर त्रिपृष्ठ द्वारा बुझदिल राजा से सम्मान लेने से इनकार करने पर अश्वग्रीव ने आक्रमण कर दिया। युद्ध में त्रिपृष्ठ ने सुदर्शन चक्र से अश्वग्रीव का वध किया और प्रथम वासुदेव बने तथा बड़े भाई अचल बलदेव बने।
२. सम्यक्त्व, शय्यापालक प्रसंग व नरक गमन : ११वें तीर्थंकर भगवान श्रेयांसनाथ का प्रवचन सुनकर त्रिपृष्ठ को सम्यक्त्व की प्राप्ति हुई, जो बाद में लुप्त हो गया। एक बार नींद में व्यवधान पड़ने पर आदेश की अवज्ञा के कारण त्रिपृष्ठ ने शय्यापालक के कानों में पिघला हुआ सीसा ढलवा दिया, जिससे उसकी तड़पकर मृत्यु हो गई। इस तीव्र क्रूरता व दुष्कर्मों के कारण आयुष्य पूर्ण कर वे ३३ सागरोपम की स्थिति वाले ७वें नरक में उत्पन्न हुए।
३. शेर का भव, चतुर्थ नरक व प्रियमित्र चक्रवर्ती : नरक से निकलकर आत्मा शेर बनी, तत्पश्चात् ४था नरक और फिर २३वें भव में पश्चिम महाविदेह की मूक नगरी में राजा धनंजय व धारिणी के पुत्र 'प्रियमित्र' के रूप में जन्म लिया। प्रियमित्र चक्रवर्ती बने और अंत में संयम ग्रहण कर दीक्षा ली। देवलोक गमन के बाद पुनः ७वें देवलोक में उत्पन्न हुए।
व्रत चेतना की पावन प्रेरणा :
१. अणुव्रत व आत्म-कल्याण : पूज्य आचार्यश्री ने पावन प्रेरणा प्रदान करते हुए फरमाया कि महाव्रत, सुमंगल साधना व्रत और १२ व्रतों के रूप में व्रत चेतना को देखा जा सकता है। आचार्यश्री तुलसी ने अणुव्रत को व्यापक रूप प्रदान किया। व्यक्ति जीवन में जितना व्रत-संयम स्वीकार करता है, उतना ही उसके आत्म-कल्याण का मार्ग प्रशस्त होता है।
युवाचार्य श्री, साध्वीप्रमुखा जी, साध्वीवर्या जी का विचार-पाथेय :
१. संयम धर्म की साधना : युवाचार्य श्री महावीर कुमार जी ने दस धर्मों के अंतर्गत 'संयम धर्म' की व्याख्या करते हुए कहा कि संयम आत्मा के निकट जाने का सबसे महत्वपूर्ण सहयोगी तत्व है। जो करें वह जागरूकता से करें और जो नहीं करना है उसे विवेक से रोक दें। सब जीवों के प्रति करुणा और हिंसात्मक वृत्तियों में विवेक रखते हुए गृहस्थ जीवन में भी संयम की दिशा में बढ़ा जा सकता है।
२. अणगार व अगार धर्म तथा मनोबल : साध्वीप्रमुखा श्री विश्रुतविभा जी ने 'ठाणं' सूत्र के संदर्भ से कहा कि धर्म के दो भेद हैं—अणगार (साधु के ५ महाव्रत) और अगार (श्रावक के १२ व्रत)। व्रत की चेतना जगाकर संकल्प स्वीकार करने वाला साधक स्वयं को सुरक्षित कर लेता है। व्रत चेतना से मनोबल और आत्मबल बढ़ता है।
३. पुनर्जन्मवाद का चिंतन: साध्वीवर्या संबुद्धयशा जी ने 'पुनर्जन्मवाद' का विश्लेषण करते हुए कहा कि आस्तिक दर्शन पुनर्जन्म को स्वीकार करते हैं, जिससे मन में आत्मा, कर्मफल, सुगति और दुर्गति के प्रति जागरूकता रहती है। पुनर्जन्म को मानने के साथ-साथ वर्तमान जीवन को श्रेष्ठ जीना अत्यंत आवश्यक है।