गुरुवाणी/ केन्द्र
ज्ञान और संयम को नई दिशा देता है स्वाध्याय : आचार्यश्री महाश्रमण
तेरापंथ धर्मसंघ की राजधानी लाडनूं की धरा पर विराजमान जैन श्वेतांबर तेरापंथ धर्मसंघ के एकादशम अधिशास्ता, भगवान महावीर के प्रतिनिधि, युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमण जी की पावन सन्निधि में पर्वाधिराज पर्युषण का द्वितीय दिवस 'स्वाध्याय दिवस' के रूप में आध्यात्मिक गरिमा के साथ आयोजित हुआ।
भगवान महावीर की अध्यात्म यात्रा : मरीचि का भव और वैराग्य :
१. नयसार से देवगति और मरीचि का जन्म : पूज्य आचार्यश्री महाश्रमण जी ने भगवान महावीर की भवांतर यात्रा का वर्णन आगे बढ़ाते हुए फरमाया कि नयसार 'सम्यक्त्व' की प्राप्ति कर देवलोक में उत्पन्न हुआ। वहाँ से च्युत होकर वह प्रथम तीर्थंकर भगवान ऋषभदेव के पौत्र और प्रथम चक्रवर्ती भरत के पुत्र 'मरीचि' के रूप में उत्पन्न हुआ।
२. दीक्षा और अलग वेश की साधना : भगवान ऋषभ की देशना सुनकर मरीचि के मन में वैराग्य जगा और उसने दीक्षा ले ली। परंतु साधु जीवन के कठिन परीषहों के कारण वह मूल साधु संस्था से अलग हो गया। गृहस्थ जीवन में न लौटकर उसने अलग वेश (गेरुआ वस्त्र, हाथ में त्रिदंड, छतरी, परिमित जल से स्नान, चंदन लेप और खड़ाऊ) धारण कर अपनी साधना जारी रखी।
२४वें तीर्थंकर की भविष्यवाणी और मद का उदय :
१. भगवान ऋषभदेव की उद्घोषणा : सम्राट भरत की जिज्ञासा पर भगवान ऋषभदेव ने फरमाया कि परिषद के बाहर बैठा मरीचि ही आगे चलकर २४वाँ तीर्थंकर, प्रथम वासुदेव और मूक नगरी में चक्रवर्ती बनेगा।
२. मरीचि का अहम् (मद): जब भरत जी ने मरीचि को यह बात बताई, तो मरीचि ने सोचा—'मेरे दादा प्रथम तीर्थंकर, पिता प्रथम चक्रवर्ती और मैं भविष्य का पहला वासुदेव व अंतिम तीर्थंकर बनूँगा!' इस विचार से प्रसन्नता के साथ उसके भीतर अपने कुल का अहंकार (जाति/कुल मद) जागृत हो गया। वह एकाकी विचरता रहा और शिष्य बनने आने वालों को भगवान ऋषभ के पास भेज देता था।
युवाचार्यश्री, साध्वी प्रमुखाजी, साध्वी वर्याजी एवं मुनि श्री का विचार-पाथेय :
१. आर्जव व मार्दव धर्म की व्याख्या : युवाचार्य श्री महावीर कुमार जी ने दस धर्मों के अंतर्गत आर्जव और मार्दव धर्म पर प्रकाश डालते हुए कहा कि मार्दव व्यक्तित्व की विनम्रता व कोमलता है, जबकि आर्जव व्यक्तित्व की पारदर्शिता है। आर्जव वह स्थिति है जहाँ मन में छल-कपट न हो और आचरण में बनावट न हो। भावों की शुद्धि और जीवन में मृदुता-कोमलता ही जीवन को निखारती है।
२. स्वाध्याय से अंतः चक्षु का उद्घाटन : साध्वी प्रमुखा श्री विश्रुत विभा जी ने फरमाया कि स्वाध्याय से अंतः चक्षु खुलते हैं, बुद्धि में विशिष्टता आती है और अध्यवसाय प्रशस्त होते हैं। स्वाध्याय जिज्ञासा का समाधान करता है तथा संवेग और तप की वृद्धि में सहायक होता है।
३. अनेकांत दर्शन का महत्व : साध्वी वर्या संबुद्धयशा जी ने अनेकांत पर उद्बोधन देते हुए कहा कि जैन दर्शन तीन मुख्य स्तंभों—अहिंसा, अपरिग्रह और अनेकांत पर टिका है। अनेकांत भगवान महावीर की मौलिक देन है, जिसके द्वारा एक ही वस्तु में उपस्थित विरोधी धर्मों के सह-अस्तित्व को सापेक्ष दृष्टि से समझा जा सकता है।
स्वाध्याय की पावन प्रेरणा व बाल साध्वी को कल्याणक बख्शीश :
१. संयमी जीवन की खुराक : पूज्य आचार्यश्री ने स्वाध्याय की प्रेरणा देते हुए फरमाया कि स्वाध्याय ज्ञान की दिशा में आगे बढ़ने की उत्तम खुराक है। साधु-साध्वियों, समणियों के साथ-साथ श्रावक-श्राविकाओं को भी अधिक से अधिक समय स्वाध्याय में लगाना चाहिए।
२. बाल साध्वी को बख्शीश : पूज्य प्रवर के इंगित पर बाल साध्वी पद्मप्रभा जी ने 'दसवेआलियं' आगम के श्लोकों का सुंदर उच्चारण किया। प्रसन्न होकर पूज्य आचार्यश्री ने बाल साध्वी जी को ५ कल्याणक की पावन बख्शीश प्रदान की।