कम बोलें, मृदु बोलें; वाणी के संयम से संभव है कर्मों से मुक्ति : आचार्यश्री महाश्रमण

गुरुवाणी/ केन्द्र

लाडनूं। 11 सितम्बर, 2026

कम बोलें, मृदु बोलें; वाणी के संयम से संभव है कर्मों से मुक्ति : आचार्यश्री महाश्रमण

तेरापंथ धर्मसंघ की राजधानी लाडनूं स्थित जैन विश्व भारती के सुधर्मा सभा में पर्वाधिराज पर्युषण का चतुर्थ दिवस 'वाणी संयम दिवस' के रूप में जैन श्वेतांबर तेरापंथ धर्मसंघ के एकादशम अधिशास्ता, ज्योति पुंज आचार्यश्री महाश्रमण जी की पावन सन्निधि में अगाध आध्यात्मिक गरिमा के साथ आयोजित हुआ।
भगवान महावीर की अध्यात्म यात्रा : त्रिपृष्ठ का पराक्रम और अश्वग्रीव की चिंता:
१. अश्वग्रीव का हंता और चंडवेग का अपमान : पूज्य आचार्यश्री महाश्रमण जी ने 'भगवान महावीर की अध्यात्म यात्रा' के अंतर्गत १८वें भव (पोतनपुर के राजकुमार त्रिपृष्ठ) का वर्णन आगे बढ़ाते हुए फरमाया कि ज्योतिषी ने प्रतिवासुदेव अश्वग्रीव को उसकी मृत्यु के दो लक्षण बताए थे—दूत चंडवेग का अपमान और हिंसक शेर का वध। पोतनपुर पहुँचे राजदूत चंडवेग का त्रिपृष्ठ ने मनोरंजन में बाधा पड़ने पर अपमान कर दिया। अश्वग्रीव को जब यह पता चला, तो वह सावधान व चिंतित हो गया।
२. शाति क्षेत्र में शेर का आतंक और निहत्थे राजकुमार : अश्वग्रीव के शाति क्षेत्र में शेर के आतंक से रक्षा हेतु पोतनपुर नरेश प्रजापति की बारी आने पर राजकुमार अचल और त्रिपृष्ठ स्वयं रक्षा हेतु निकल पड़े। त्रिपृष्ठ ने समस्या के मूल को देखते हुए शेर की गुफा के सामने गर्जना की। क्रुद्ध शेर बाहर निकला। शेर को पैदल व निहत्था देखकर दोनों राजकुमारों ने भी रथ त्याग दिया और अपने शस्त्र छोड़ दिए। आगे का प्रसंग यथासमय प्रस्तुत होगा।
३. वाणी संयम की पावन प्रेरणा :
मितभाषी व मृदु वाणी का विवेक: पूज्य आचार्यश्री ने वाणी संयम दिवस पर पाथेय प्रदान करते हुए फरमाया कि वाणी लब्धि प्राप्त अंग है, जिसके उपयोग और अनुपयोग का विवेक होना चाहिए। यदि बोलें तो संयमपूर्वक, मितभाषी होकर मृदु बोलें; अन्यथा मौन रहने का प्रयास करें। झूठ, कपट और कटु वचन से बचकर वाणी के संयम द्वारा कर्म बंधन से बचा जा सकता है।
युवाचार्य श्री, साध्वीप्रमुखा जी, साध्वीवर्या जी का विचार-पाथेय :
१. सत्य धर्म व भाव विशुद्धि : युवाचार्य श्री महावीर कुमार जी ने दस धर्मों के अंतर्गत 'सत्य धर्म' पर कहा कि सत्य मन, वचन और काया की प्रवृत्तियों में दिखाई देने पर ही परिपूर्ण बनता है। भाव, सत्य का पहला स्पर्श है जिससे भाव विशुद्धि पैदा होती है। आचरण में बिना किसी माया व कुटिलता के सत्य को अवतरित करना आत्मा की महान उपलब्धि है।
२. मौन की यात्रा व भीतरी प्रवेश : साध्वीप्रमुखा श्री विश्रुतविभा जी ने वाणी संयम पर प्रकाश डालते हुए कहा कि मौन की यात्रा करने वाला साधक भीतरी जगत में प्रवेश करता है। भाषा विवेक से संपन्न साधक दिन भर बोलकर भी मौन की ही आराधना करता है। वाणी संयम के बिना सृजनात्मकता और ज्ञान में वृद्धि संभव नहीं है।
३. लोकवाद का जैन सिद्धांत : साध्वीवर्या श्री संबुद्धयशा जी ने 'लोकवाद' विषय पर उद्बोधन देते हुए कहा कि जैन दर्शन के अनुसार लोक अनादि-अनंत, नित्य और शाश्वत है। इसकी किसी ने रचना नहीं की है, यह स्वतः संचालित है। लोक छह द्रव्यों—धर्मास्तिकाय, अधर्मास्तिकाय, आकाशास्तिकाय, काल, पुद्गलास्तिकाय और जीवास्तिकाय से निर्मित है।