स्वाध्याय ज्ञान का झरना, एक रसायन और पारसमणि है

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रोहिणी, दिल्ली।

स्वाध्याय ज्ञान का झरना, एक रसायन और पारसमणि है

युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमणजी की विदुषी सुशिष्या शासनश्री साध्वी सुमन जी के सान्निध्य में पर्युषण पर्व की आराधना का दूसरा दिवस स्वाध्याय दिवस के रूप में मनाया गया। ज्ञानशाला की प्रशिक्षिकाओं के मंगलाचरण के साथ कार्यक्रम प्रारम्भ हुआ। शासनश्री साध्वी सुमनश्री जी ने महावीर आभिवन्दना के साथ भगवान महावीर के सतावीस भव परम्परा में नयसार भव का वर्णन करते हुए कहा कि प्रत्येक जीव अनन्तकाल से संसार में परिभ्रमण कर रहा है। ऐसी कोई गति योनी और जाति नहीं जहाँ अनन्त बार जन्म मरण नहीं किया हो। भगवान महावीर ने भी इन सतावीस भवों से पहले इतना ही भवभ्रमण किया है। कोई भी जीव केवल एक जन्म की तपस्या साधना से महावीर नहीं बनता। सतावीस भव तो इसलिए महत्वपूर्ण है कि प्रथम भव नयसार भव में सम्यक्त्व का उजाला मिला और मोक्ष की सीट रिजर्व हुई।
अध्यात्म के क्षेत्र में सम्यक्त्व का प्रकाश मिलना बहुत बडी आत्म विजय है। भगवान महावीर के जीव ने नयसार भव में मुनि को सुपात्र दान भी दिया और मूलपूंजी से सम्यक्त्व का आलोक मिला यह सबसे बड़ी उपलब्धि हासिल की। पूर्वों भवों की यह यात्रा बडी रोमाञ्चक और प्रेरणाप्रद है जिसे सीरियल वाई सुनकर सभी अपनी भव यात्रा को विराम दें। साध्वी सुरेखाजी ने 'स्वाध्याय है ज्ञान का झरना' विषय पर बोलते हुए कहा कि स्वाध्याय ज्ञानियों की समाधि है। गीता में इसे यज्ञ बताया गया है। स्वाध्याय करते-करते आदमी ज्ञानी पंडित विद्वान बन जाता है। तुलसी महाप्रज्ञ साहित्य का अवहान करते-करते कई व्यक्तियों की दिशा और दशा बदल गई। एक वाक्य ही ऐसी चोट करता है कि आदतों और जीवन में एक रुपान्तरण घटित हो जाता है अत: स्वाध्याय एक रसायन और पारसमणि है। साध्वी मधुर लता जी ने प्रेरक मधुर गीत 'करो स्वाध्याय स्वाध्याय बड़ा आनन्द आयेगा' गीत से धर्मसभा को प्रेरणा दी। दिल्ली तेरापंथ सभा के अध्यक्ष बिमल बैंगाणी आदि ने सेवा उपासना का पूरा लाभ लिया।