रचनाएं
युवाचार्य वरदाई वर पा पुलकित जगती का कण-कण
आज धरा पर सुरवर सारे, करते प्रभुवर को वंदन।
युवाचार्य वरदाई वर पा, पुलकित जगती का कण-कण।।
विनय समर्पण के सुमनों से, सज्जित है जिनका जीवन।
विकास के सोपानों पर चढ़ते रहते ले गुरू शरण।
सहज सौम्यता का जीवन में खिले गुलशन।।
देवदूत बन आये धरा पर, तुम मां छगनी के आंगन।
धीर थीर गंभीर जीवन, कोचर कुल के हो नंदन।
दशो दिशाएं मंगल गाए, विनयभाव का चढ़ स्यन्दन।।
श्रेष्ठ श्रुताराधक को पाकर, गण का गौरव खूब बढ़ा।
ज्योतिचरण गुरू महाश्रमण की सान्निधि में जीवन गढ़ा।
विकास की तुम फसले उगाओ, गुरूवर का था अभिसिंचन।।
जब तक इस धरती पर, सूरज चंदा का पाये प्रकाश।
तब तक वीर गोयम की जोड़ी, करती रहे जग में उजास।
चंदेरी निज भाग्य सराए, पा गुरूवर की चरण शरण।।
तर्ज – खड़ी नीम के