पंद्रह साल का बैर, एक 'क्षमा' से ढेर (क्षमा : जीवन का अमृत और महा-औषधि)

रचनाएं

साध्वी अणिमाश्री

पंद्रह साल का बैर, एक 'क्षमा' से ढेर (क्षमा : जीवन का अमृत और महा-औषधि)

क्षमा : जीवन का अनमोल आभूषण–
१. क्षमा एक रोशनी है जो वर्तमान के साथ-साथ सुदूर भविष्य को भी रोशन कर देती है, उज्ज्वल रोशनी से भर देती है।
२. कोई कहता है इंसान धन से बड़ा होता है, कोई कहता है पद-प्रतिष्ठा से बड़ा कहलाता है, लेकिन हकीकत में महान वही है जो क्षमा करना जानता है।
३. क्षमा जीवन का श्रृंगार है, क्षमा जीवन का आभूषण है। इस आभूषण को ज्वेलरी की तरह बहुत संभालकर रखने की ज़रूरत है। इस आभूषण की चमक हमेशा बढ़ती ही रहती है।
४. क्षमा वह रक्षाकवच है जो आज और कल दोनों को सुरक्षित कर देती है।
५. क्षमा एक ऐसा अमृत है जो ज़हर घुली सांसों में भी पुनः प्राणों का संचार कर देता है।
एक घटना प्रसंग क्षमा के वर्चस्व, शक्ति, ऊर्जा व प्रेरणा को जीवंत करने वाला है : भाइयों में कलह और मनमुटाव– एक बड़े भाई ने अपने छोटे भाई को व्यापार के लिए तीन लाख रुपये दिए। उसका व्यापार अच्छा जम जाने पर बड़े भाई ने रुपये लौटाने के लिए कहा; परन्तु छोटे भाई ने रुपये नहीं लौटाये। आखिर दोनों में झगड़ा हो गया
द्वेष का संबंध : झगड़ा इस कदर बढ़ा कि दोनों का बोलना एवं आना-जाना बंद हो गया। घृणा और द्वेष का आंतरिक सम्बन्ध अत्यन्त गहरा हो गया।
 निंदा और अशांति: बड़ा भाई जहाँ कहीं जाता, खड़े होकर अपने छोटे भाई की निंदा/आलोचना करने लग जाता
साधना में बाधा : वह धर्म-साधना भी अच्छी करता था, लेकिन इस मानसिक कलह के कारण उपजी धर्माराधना में भी मन नहीं लग रहा था। इस मानसिक व्यथा का प्रभाव शरीर पर भी पड़ने लगा।
संत का मार्गदर्शन : एक दिन उसने एक संत के पास जाकर अपनी कथा सुनाई। संत ने कहा — 'वत्स! तू चिंता मत कर, सब कुछ अच्छा होगा। तू अपने छोटे भाई के लिए एक डिब्बा मिठाई लेकर उसके घर जाकर उससे कहना — अनुज! मुझसे भूल हुई है, मुझे क्षमा कर दो।'
उसने कहा — 'संत प्रवर! मैंने ही उसकी मदद की और मैं ही क्षमा माँगूँ?'
संत ने कहा — 'गलती दोनों तरफ से होती है।'
उसने कहा — 'गुरुदेव! मुझे अहसास तो होना चाहिए कि मैंने इस संदर्भ में क्या गलती की?'
संत ने कहा — 'आयुष्मान्! तुमने उसकी निंदा 
की, आलोचना की, भला-बुरा कहा। तुम्हारे दिल में 
भाई के प्रति घृणा, द्वेष और क्रोध के भाव थे, क्या यह भूल नहीं है?'
क्षमा और प्रेम का पुनर्मिलन : बड़े भाई की आँखें खुल गईं। संत को नमन कर वह सीधा छोटे भाई के घर पहुँचा और दरवाजा खटखटाया।
–उसके बेटे ने दरवाजा खोलकर अपने ताऊजी को देखा — एक क्षण के लिए अचानक ठिठक गया, फिर चिल्लाकर खुशी से घर पर बोला – भाऊजी आये हैं।
–छोटा भाई भी दौड़कर सामने आया और पुलकित होकर कहा – आज पंद्रह वर्ष के बाद भैया मेरे आँगन में आये हैं। प्रेम से गला रुँध गया, आगे कुछ बोल नहीं सका।
–बड़े भाई ने फल व मिठाइयाँ टेबल पर रखीं और अपने दोनों हाथ जोड़कर कहा – 'अनुज! सारी भूल मुझसे हुई है, तुम मुझे क्षमा कर दो।'
'क्षमा' शब्द निकलते ही हृदय का प्रेम आँसू बनकर बहने लगा। छोटा भाई चरणों में गिर पड़ा, अपनी भूल के लिए रो-रोकर क्षमा माँगने लगा। क्षमा व प्रेम का सागर प्रवाहित हो गया। सब शांत, चुप, सबकी आँखें भी भीग गईं।
सच्ची साधना और समाधान–
कुछ ही देर बाद छोटा भाई अंदर से रुपये लाकर बड़े भ्राता के सामने रख दिये। उसने कहा – आज मैं इन कौड़ियों को लेने नहीं आया हूँ। मैं अपनी भूल मिटाने एवं साधना को सजीव बनाने आया हूँ। आज मेरा आना सफल हो गया, मेरा दुःख मिट गया। मुझे अब महसूस हो रहा है कि –
करूँ मैं दुश्मनी किससे, अगर दुश्मन भी हो कोई।
मुहब्बत ने दिल में जगह छोड़ी नहीं अदावत की।।
छोटे भाई ने कहा – भैया! जब तक आप ये रुपये नहीं लेंगे तब तक मेरी आंतरिक तपन नहीं मिटेगी, अतः कृपा करके ये रुपये स्वीकार करें।
(अनुज की इच्छा रखने हेतु वे रुपये अनुज के लिये और अनुज को साथ लेकर अनाथालय में विसर्जन कर दिए।)
क्षमा देने व लेने के बाद दोनों का मन प्रसन्न हो गया, मानसिक रोग जड़ से मिट गया। सच, क्षमा के महासागर में अभिस्नात होकर चेतना को चिन्मय के साँचे में ढाला जा सकता है।
पावन संदेश – 
खमत-खामणा का यह परम पुनीत अवसर
सबको यह प्रेरणा दे रहा है –
ज़हर भर गया जिन साँसों में, 
वहाँ अमृत की धार बहाएँ।
भूल-विगत को, इस आगत का, 
एक नया इतिहास बनाएँ।।
क्षमा जीवन का वह अमृत है जो अविनाश्वर चेतना के द्वार को उद्घाटित कर देता है एवं अमरता के पथ पर प्रस्थित कर देता है।