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थांस्यूं म्हारा खमत-खामणा
मिनख जमारो एक समुन्दर है। जकै में इमरत भी है और जेर भी है। समुन्दर नै घोटणी स्यूं घोटे तो घणी ही चिज्यां निकल ज्यावै, जकै में एक चीज़ है ‘इमरत’। बींयां ही मिनख री बोली में करडो पणो भी है अर नरम पणो भी है। खारो पणो भी है अर मीठो पणो भी है। मीठो पणो सगळा नै ही चोखो लागै। इंया ही चोखो मिनख रो बेवार भी सगळा नै गमतो लागै। चोखे बेवार रे खातर मिनख नै सरल बणणो पड़ै, नमणो पड़ै। मिनख आपरै चोखे बेवार स्यूं अणखावणो भी लागै अर सुहावणो भी लागै। इण खातर बेवार ने कदेई नीचो मत होवण द्यो।
देश री आजादी रे खातर घणा ही बलिदानी देश भगत आपरो समरपण अरु बलिदान करण सारू आगूच आया। जकै में सुभाषचन्द्र जी रो नाम भी आवै। वै एक बार मंच उपर भाषण दे रह्या हा। इते में बीं परखदा में स्यूं एक मिनख सुभाष जी रै ऊपर जूतो फेंक्यो। वै चाहता तो बीं टेम गुस्सो कर सकता, पण बां रै मन में खम्या रा भाव हा। वै बीं टेम ही जको जूतो फेंक्यो बींनै केवता हुआ बोल्या— भाई! एक जूतो कोई काम कोनी आवै। दूसरो जूतो और फेंक देवो तो म्हारे पेरण काम आ ज्यांसी। खम्या राखण वाळो बडो हुवै। वो मिनख परोगराम पूरो हुयां पछै आर खमत-खामणा करया। अब बीं रै हिये में भायलो बण रा भाव जाग्या वो सदां खातर बांके सागे ही जुड़ग्यो। बीं नै पूछयो तूं तो म्हारो विरोधी हो। वो बोल्यो— आप लोगां रो चोखो बेवार देख र अर खम्या रा भाव देखर म्हारो मन आप लोगां स्यूं जुड़ग्यो।
खमणो मिनखपणै री बडी मोलत है। खमणै स्यूं मिनख री मांयली गांठा खुल ज्यावै। पण अबकै रो मिनख आपरै मानखै नै एंकार स्यूं अकडाई स्यूं उंचो उठावण री सगती लगावै। एंकार, अकडाई मैं पणो दिखावण नै त्यार रहै। बीं बीरौं रूतबो नीचो ही पड़ै। इण खातर इण नै उंचो उठावण खातर खुद री भावना में खमणै रा झुकणै रा भाव जगाणा पड़सी। अबै रे मिनख री खमणै री चेतना खोखली अर खाली हूँती जा रही है। अब खाली उपरलो दिखावो बच्यो है। वो किताक दिन चालसी आ सोचण री बात है।
आपणो ओ मिनख जमारो मिनखपणे स्यूं ज्यूडयोड़ो है। बीं नै आपा कियां, खिम्याधार चोखो बणावां। इण खातर पजुषण रो त्यौहार आपां नै आ ही बात कैवै है कि थे सरल बणो, जाण-अणजाण में गलती होणी कोई बडी बात कोनी, पण बीं गलती नै स्वीकारो। अकडावण री जग्यां नरमावण करो। सगला नै मन अर भाव स्यूं कहो- 'थांस्यूं म्हारा खमतखामणा।' जदी मिनख नै आपरी परतिष्ठा बढ़ाणी है, चोखो लागणो है तो लोगां रै सामणे, आप मिलणे वालां रै सामणे सहज रूप स्यूं आ कहो, 'थांस्यूं म्हारा खमत-खामणा'।
एक बार साधु मराज बखाण दे रह्या छा। गाँव रा घणां ही मिनख-लूगायां अर बांरा भगत बखान सुण रह्या छा। बखाण पूरो हूयो। बीं टेम एक गांवड़ियो मिनख मराज खनै आर मराज पर थूक्यो अर जल्दी सी भागग्यो। मराज थूक देख्यो अर आपरै खनै पड़ी चादर उठार बीं स्यूं पूंछ लियो। इं बात अर करतब ने देख र कई भगत नराज हूर बीं नै पकड़ण अर मारण वास्ते भाग्या। साधु जी बोल्या रे भायां! छोटी सी बात ही वो थूक्यो। मैं बींनै चादर स्यूं पूंछ लियो। बात खतम। लोग बोल्या- वो अजोग हो, बेवकूफ हो। इयां थूक ज्यावै मजाल पड़ी है। साधु जी बोल्या- जकी बात नै आपां सहन कर सकां करणी चाहिये। इण स्यूं मिनख रो मान बढ़ै ही है, घटे कोनी। आज वो थूक्यो है, काल वो आर नम ज्यासी, बा ही हुई। वो आर साधु जी रै चरणां में लुटग्यो, दास बणग्यो। ओ है सैन करणे रो प्रभाव। इनै सिरै चाढो खिम्या राखण वालो कदेई बुरो को नी बाजै।
खमत-खामणा रो ओ दिन सगलां नै आ ही बात कैवै है कि सरल हिरदो बणा र खमणो-खामणो सीखो। गुरुदेव तुलसी भी इण बारे में कह्यो—
खमता-खामणा छह अक्षर है, अरथ अनोखो झांको।
खमो-खमाओ मन-भावां स्यूं, मोल अभिन्तर आंको॥
खमावण रो मोल आंकणे री जरूरत है। इंरै इमरत नै पीस्यो तो अमर बण जास्यो। भगवान महावीर ने देखांतो वै आपरै जमारै काल में कित्ती-कित्ती खम्या राखी अर अमर बण गया। ईयां ही खम्या रो दान महादान कह्यो है। खमत-खामणा करणै रो मतलब है। आपणे हिये में निरमलता आवै, खुशी मिलै, दुराव कम हुवै, शुभ भाव जागै, स्वभाव बदलै। सगलां रै सागै परेम जागै। इण स्यूं मिनख जमारो सकारथ बण ज्यावै।
इण मौके कोई नै करणै, पढणै, बोलणै, लिखणै, बात में, बेवार में कोई करडो काठो लाग्यो हुवै तो सगलां स्यूं –
जै भूल हुई जै जणां-कणां।
है खमत-खामणा घणा-घणां।।