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क्षमा और मैत्री का दीप : शांति और सद्भाव का मार्ग
खामेमि सव्वजीवे, सव्वे जीवा खमंतु मे।
मित्ती मे सव्वभूएसु, वेरं मज्झं न केणइ॥
जैन आगम गाथा में मैत्री के उत्कृष्ट रूप को दर्शाते हुए कहा गया है कि—मैं सब जीवों को क्षमादान देता हूँ और सभी जीव मुझे क्षमादान दें। सभी जीवों से मेरी मैत्री है और किसी से भी बैर नहीं है। 'वसुधैव कुटुम्बकम्' की भावना को साकार रूप मिलता है जैन धर्म के इस मैत्री संदेश से।
1. विश्व शांति का आधार : व्यक्तिगत स्तर पर मैत्री विश्व परिदृश्य में युद्ध और अशांति का मुख्य कारण अपना हित साधना, ईर्ष्याभाव, अभिमान, इच्छाओं का विस्तार और परस्पर शत्रुभाव है। विश्व में शांति स्थापित करने के लिए मैत्रीभाव का होना आवश्यक है।
मैत्री के आवश्यक गुण: समानता, सद्भावना, समता व निस्वार्थभाव।
सुधार का प्रारंभ : मैत्री की शुरुआत छोटे-छोटे स्तर से प्रारंभ करनी चाहिए। आचार्य तुलसी ने अणुव्रत गीत में कहा है—
'सुधरे व्यक्ति, समाज, व्यक्ति से राष्ट्र स्वयं सुधरेगा।'
अतः मैत्री का प्रारम्भ व्यक्ति के स्तर पर करना चाहिए। संवत्सरी मैत्री का महान पर्व है। यह पर्व आत्मसुधार का पर्व है। इस पर्व को मनाने वाले सभी लोगों को राग, द्वेष, कटुता, कलह को दूर कर एक-दूसरे से क्षमा याचना करनी चाहिए। क्षमायाचना शाब्दिक नहीं, अन्तःकरण से होनी चाहिए। मैत्री पर्व पर दिल की कटुता को दूर कर प्रेमभाव का दीपक जलाना चाहिए।
2.भगवान महावीर का उत्कृष्ट क्षमाभाव: 'खन्तिसूराअरिहंता' अर्थात् अरिहंत भगवान क्षमासूर होते हैं। उनकी क्षमा उत्कृष्ट होती है। वे मैत्री के पर्याय होते हैं।
संगम देव का प्रसंग : संगम देव ने भगवान महावीर को छः महीने तक कष्ट दिये, किंतु भगवान के मन में उनके प्रति कोई द्वेष नहीं था।
उपकारी भाव : एक बार संगम देव ने भगवान महावीर से पूछा— 'मुझे आप कैसा समझते हैं?' तब भगवान महावीर ने कहा— 'अच्छे मुनाफे से माल बिकवाने वाले दलाल के समान महान उपकारी।' यह भगवान महावीर का उत्कृष्ट क्षमाभाव था। यही क्षमाभाव मानव मात्र के लिए कल्याणकारी है।
बैर का समाधान: खून से सना कपड़ा कभी खून से साफ नहीं होता, उसके लिए तो पानी और साबुन की आवश्यकता रहती है। उसी प्रकार बैर को कभी बैर से मिटाया नहीं जा सकता, उसके लिए क्षमा रूपी पानी और साबुन की आवश्यकता रहती है।
3.भूल स्वीकारना और सुधार का मार्ग : घर, परिवार, समाज में जीते हुए कभी न कभी मनमुटाव हो जाता है। गलतियाँ भी हो सकती हैं क्योंकि इंसान गलतियों का पुतला है।
सच्ची समझ : गलती होना कोई बड़ी बात नहीं है, बड़ी बात है–
अपनी गलती को स्वीकार कर लेना।
अपनी गलती पर क्षमायाचना कर लेना।
दूसरों की गलती पर क्षमादान दे देना।
अपनी गलतियों को दूसरी बार नहीं दोहराने के लिए प्रतिबद्ध हो जाना।
प्रायश्चित का लाभ: सरल भाव से किया गया पश्चात्ताप और प्रायश्चित व्यक्ति को भारमुक्त और शुद्ध बना देता है। यह सुधार का रास्ता है, यह सफलता की सीढ़ियाँ हैं और उन्नति का आकाश।
4. तनाव से मुक्ति की कुंजी: क्षमादान: तनाव और अशांति वर्तमान युग की बहुत बड़ी समस्या है। अहंकार और लोभ तनाव और अशांति के मुख्य कारण हैं। आज की आपाधापी एवं भागदौड़ की ज़िन्दगी में हर कोई तनाव और अशांति को झेल रहा है और इसी कारण उसके चेहरे से असली मुस्कान और खुशी गायब होती जा रही है। कृत्रिमता से जीवन में जटिलताएँ बढ़ती जा रही हैं।
ऐसे माहौल में क्षमाभाव और मैत्रीभाव व्यक्ति के तनाव और अशांति को दूर कर सुख-शांति के द्वार खोल देता है।
१. स्वयं की भलाई : क्षमा हमें दूसरों की भलाई के लिए नहीं, अपनी भलाई के लिए करनी चाहिए। यह एक प्रकार का तप है, एक प्रकार की साधना है।
२. मानसिक भार से मुक्ति: जब तक हम क्षमा नहीं करते, सामने वाले को कष्ट हो या नहीं भी हो, परंतु उसका भार हम अपने मन पर ढोते हैं। क्षमादान करते ही हम एकदम हल्के हो जाते हैं।
संवत्सरी महापर्व और मैत्री दिवस पर हम सभी खमतखामणा के महत्व को समझते हुए 84 लाख जीवयोनि एवं सभी परिचितों से खमत खामणा करके निर्मल बनने का प्रयत्न करें। आओ आज हम क्षमा मैत्री के दीप जलाएँ।
क्षमायाचना पावनता का प्रतीक है,
और गुस्सा दानवता का प्रतीक है,
सहजता सरलता हो तो होती है सोने में सुगन्ध,
क्षमायाचना मानवता का प्रतीक है।
5. मतभेद हो सकता है, मनभेद नहीं : संवत्सरी महापर्व पर क्षमा के आदान-प्रदान का विशिष्ट महत्व रहा है। इंसान गलतियों का पुतला है, उससे जाने या अनजाने गलतियाँ होती रहती हैं। भूल होना बड़ी बात नहीं है, भूल को भूल स्वीकार कर लेना बड़ी बात होती है—ऐसा कहा गया है।
लघु हो या बृहद्, भूल भूल है,
प्रमाद हमारी भूलों का मूल है,
किसी ने भी की होगी भूल मगर,
कबूल नहीं करना महाभूल है।
यह पर्व इंसान को अपनी भूलें कबूल करने के लिए प्रेरित करता है। दुनिया में भिन्न-भिन्न मान्यताओं, विचारों वाले व्यक्ति रहते हैं। किसी के साथ मतभेद हो सकता है, परन्तु मनभेद नहीं होना चाहिए। क्योंकि जहाँ मनभेद होता है, वहाँ घृणा, नफरत व द्वेष का जहर फैल जाता है, जो मानवता के लिए बेहद घातक है। यह पर्व मनभेदों को दूर कर मैत्री भावों की धारा प्रवाहित करता है।
6. ऐतिहासिक प्रसंग : राजा उदायन और चंडप्रद्योत का खमतखामणा : जैन इतिहास में राजा उदायनऔर राजा चंडप्रद्योत के खमत खामणा का उदाहरण इस पर्व के महत्त्व को रेखांकित करता है:
१. पराजय और बंदी : उदायनने चंडप्रद्योत के राज्य पर चढ़ाई कर उसे परास्त किया और उसे बंदी बनाकर अपने देश की ओर प्रस्थान किया। उदायन व्रती श्रावक था, किन्तु चंडप्रद्योत व्रती श्रावक नहीं था। रिश्ते में दोनों एक दूसरे के संबंधी भी थे।
२. संवत्सरी का पर्व : रास्ते में संवत्सरी का पर्व आया। उदायन ने बंदी चंडप्रद्योत से खमतखामणा किया
३. सम्राट और बंदी का भेद : चंडप्रद्योत हँस पड़ा और बोला— 'उदायन! तुम भी मजाक करते हो। तुम विजयी राजा और मैं हथकड़ी-बेड़ी में बंधा हुआ तुम्हारा कैदी। खमत खामणा तो बराबर वालों में होता है, सम्राट और बंदी के बीच में नहीं।'
४. तत्काल मुक्ति और सम्मान : चंडप्रद्योत की बात सुन राजा उदायन ने एक क्षण सोचा और तत्काल चंडप्रद्योत को बंधन से मुक्त कर दिया। उसने बारंबार खमत खामणा किया और सम्मान के साथ उसे उसके राज्य में पहुँचा दिया।
निष्कर्ष : जैन धर्म का यह मैत्री पर्व संपूर्ण विश्व के लिए महत्वपूर्ण एवं कल्याणकारी है। अगर इस पर्व और मैत्री संदेश को सभी स्वीकार कर लें, तो विश्व की अनेक समस्याएँ समाप्त हो सकती हैं और सर्वत्र शांति स्थापित हो सकती है।
एक दूसरे के अपराधों को भुलाएँ,
मन में उभरे आक्रोशों को सुलाएँ,
आपस में क्षमा का आदान-प्रदान कर,
सर्वत्र मैत्री का मधुर स्रोत बहाएँ।।