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आभामंडल के पवित्रीकरण का उपाय है क्षमापना
जैन परंपरा का एक महान आध्यात्मिक महोत्सव है — पर्युषण महापर्व। भगवती संवत्सरी इस महापर्व की पराकाष्ठा का दिन है। जिस दिन लाखों-लाखों लोग प्रतिक्रमण की साधना से अपने आपको भावित करके 'खमत-खामणा' का व्यावहारिक स्वरूप प्रस्तुत करते हैं। संपूर्ण जीव-जगत् के प्रति अपने चित्त को मैत्री की भावना से ओतप्रोत करते हैं।
भगवान महावीर एक कुशल, महान अध्यात्म-चिकित्सक थे, जिन्होंने क्षमापना का सिद्धान्त प्रदान कर एक नई चिकित्सा पद्धति का आविष्कार किया है। एक ऐसी चिकित्सा जिसमें–
–बाह्य संसाधनों की किंचित् मात्र भी अपेक्षा नहीं है,
–मात्र व्यक्ति अपने भावों के पवित्रीकरण से मानसिक एवं शारीरिक स्वास्थ्य को प्राप्त कर सकता है।
–अपने आभामंडल को निर्मल एवं उज्ज्वल बना सकता है।
–आभामंडल का प्रभाव व्यक्ति के संपूर्ण व्यक्तित्व पर परिलक्षित होता है।
आजकल ऑकल्ट साइंस (Occult Science) के विशेषज्ञ और आभामंडल के सिद्धान्त पर काम करने वाले डॉक्टर भी मानने लग गए हैं कि–
–कोई भी बीमारी शरीर में उत्पन्न होती है, उससे पूर्व वह आभामंडल में कई महीनों पहले शुरू हो जाती है।
–सबसे पहले बीमारी भाव और मन के स्तर पर प्रारंभ होती है।
–कुंठा, निराशा, अस्थमा, डिप्रेशन आदि इस बीमारी के जनक हैं।
जो भी स्वस्थ रहना चाहता है, उसे सबसे पहले अपने मन एवं भावों की निर्मलता पर ध्यान देना होगा। मैत्री, करुणा, प्रेम ये आभामंडल को निर्मल बनाने के अमोघ उपाय हैं। स्वस्थ रहने के लिए सबसे पहले आभामंडल के पवित्रीकरण की साधना आवश्यक है। क्षमा आभामंडल को पवित्र एवं निर्मल बनाती है। भगवान महावीर ने रोग की जड़ को मिटाने का उपाय मैत्री एवं क्षमापना के रूप प्रदान कर संपूर्ण मानवजाति का महान उपकार किया है।
–व्यक्ति के भीतर जितना अहिंसा का भाव होगा, उतनी ही उसकी सकारात्मक चेतना का विकास होगा। उससे मन की प्रसन्नता, आनंद एवं शांति की प्राप्ति होगी।
–जितना हिंसा का भाव, नकारात्मक चेतना रहेगी, उससे अप्रसन्नता, अशांति, कलह, उन्माद बढ़ेगा। उस व्यक्ति के व्यवहार से, वाणी से उसका परिवेश भी अशांत, खिन्न एवं विषादग्रस्त बना रहेगा।
यदि व्यक्ति भगवान महावीर द्वारा प्रदत्त क्षमा के सिद्धांत को अपनी जीवनशैली का हिस्सा बना लेता है तो वह व्यक्ति भी सबके लिए अनुकरणीय बन जाता है। परंपरा से प्राप्त इस मैत्री पर्व को एक रूटीन की तरह ही नहीं देखें किंतु अपने व्यवहार का एक घटक तत्त्व बनाएं, जिससे हमारे घर-आंगन में शांति का, आनंद का स्रोत प्रवाहित हो सके।