क्षमा याचना से तन, मन, चिंतन स्वस्थ रहता है

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मुनि कमल कुमार

क्षमा याचना से तन, मन, चिंतन स्वस्थ रहता है

जैन धर्म एक आध्यात्मिक और वैज्ञानिक धर्म है। इस धर्म में जितना स्थान उपवास आदि तपस्या को दिया जाता है, उतना ही ध्यान क्षमा, सत्य, संतोष, विनय आदि को दिया जाता है। तपस्या से आत्मा और शरीर दोनों का शोधन होता है, तो क्षमा आदि से शांति और आनंद की प्राप्ति होती है। भगवान महावीर ने कम से कम दो दिन और अधिक से अधिक छह महीनों की तपस्या की। परंतु क्षमा उनका परम धर्म था। उन्होंने तपस्या आदि का तो समय-समय पर पारणा किया, परंतु क्षमा का निरंतर पालन किया। क्षमा, विनय आदि ऐसे तत्व हैं जिससे अमरत्त्व को प्राप्त किया जा सकता है।
वर्तमान में भी तपस्या आदि का क्रम तो बढ़ा है, परंतु क्षमा, विनय, संतोष, सत्य, प्रामाणिकता में क्रमशः ह्रास नज़र आ रहा है। पर्युषण पर्व पर आठ दिन तक भिन्न-भिन्न प्रकार से दिवस मनाये जाते हैं; जैसे खाद्य संयम, वाणी संयम, सामायिक, जप, ध्यान आदि के प्रयोग करवाये जाते हैं, परंतु अंतिम दिन उपवास, पौषध, प्रतिक्रमण का विशेष रूप चलता है। नवमें दिन को मैत्री दिवस के रूप में मनाया जाता है, जिससे बारह महीने में हुए अप्रिय व्यवहार के लिए क्षमा का आदान-प्रदान किया जाता है; जिसे 'खमतखामणा' दिवस भी कहा जाता है।
हर सम्प्रदाय में इस प्रकार का पर्व अवश्य मनाना चाहिये जिससे विश्व-मैत्री की कल्पना साकार हो सकती है। मनुष्य भूलों का पुतला होता है, भूल होना स्वाभाविक है, परंतु भूल को भूल मानकर क्षमा याचना करना घाव पर मरहम-पट्टी का काम करता है। हमें ऐसे पर्वों को सदा मनाने का प्रयास करना चाहिये जिससे तन, मन, चिंतन स्वस्थ बन सके।