जब विज्ञान ने अध्यात्म की धरती पर कदम रखा

गुरुवाणी/ केन्द्र

लाडनूं

जब विज्ञान ने अध्यात्म की धरती पर कदम रखा

भारत की पहचान केवल उसकी वैज्ञानिक उपलब्धियों से नहीं, बल्कि उसकी समृद्ध आध्यात्मिक परंपरा से भी है। एक ओर भारत अंतरिक्ष के क्षेत्र में नई ऊंचाइयां छू रहा है, तो दूसरी ओर उसकी आध्यात्मिक विरासत मानव जीवन को भीतर से बेहतर बनाने का मार्ग दिखाती है। जब विज्ञान और अध्यात्म एक-दूसरे के साथ संवाद करते हैं, तो विकास का एक नया रास्ता सामने आता है।
राजस्थान के छोटे से कस्बे लाडनूं में 22 और 23 अगस्त 2026 को कुछ ऐसा ही प्रेरणादायी दृश्य देखने को मिला। अध्यात्म से सराबोर जैन विश्व भारती प्रांगण में भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) के पूर्व अध्यक्ष पद्मश्री डॉ. ए.एस. किरण कुमार का आगमन हुआ। दो दिनों का यह प्रवास केवल एक वैज्ञानिक का किसी आध्यात्मिक संस्थान में आना नहीं था, बल्कि विज्ञान और अध्यात्म के बीच संवाद का एक महत्वपूर्ण अवसर था।
डॉ. ए.एस. किरण कुमार देश के प्रमुख अंतरिक्ष वैज्ञानिकों में शामिल हैं। वे वर्ष 2015 से 2018 तक ISRO के अध्यक्ष रहे। इसके साथ ही वे स्पेस कमीशन के अध्यक्ष और डिपार्टमेंट ऑफ स्पेस के सचिव भी रह चुके हैं। चंद्रयान-1, मंगलयान, चंद्रयान-2 और चंद्रयान-3 जैसे भारत के महत्वपूर्ण अंतरिक्ष अभियानों में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका रही है। वर्तमान में वे जैन विश्व भारती के Spiritual Technology Research Centre (STRC) के एडवाइजरी बोर्ड के चेयरपर्सन भी हैं।
डॉ. ए.एस. किरण कुमार की विशेष पहचान केवल एक श्रेष्ठ वैज्ञानिक के रूप में ही नहीं है। वे अध्यात्म में भी गहरी रुचि रखने वाले व्यक्तित्व हैं। विज्ञान के क्षेत्र में उन्होंने अंतरिक्ष की अनंत संभावनाओं को समझने और भारत को नई ऊंचाइयों तक पहुंचाने में महत्वपूर्ण योगदान दिया है, वहीं आध्यात्मिक चिंतन और ध्यान के प्रति उनकी रुचि उनके व्यक्तित्व को एक अलग आयाम देती है। यही कारण है कि जैन विश्व भारती और STRC से उनका जुड़ाव विज्ञान और अध्यात्म के बीच सेतु का कार्य करता है।
गुरुदेव के दर्शन से हुई यात्रा की शुरुआत : 22 अगस्त की सुबह लाडनूं पहुंचने के बाद डॉ. किरण कुमार सर्वप्रथम शांतिदूत, अध्यात्म के सजग प्रहरी आचार्य महाश्रमण जी के श्रीचरणों में पहुंचे। उन्होंने गुरुदेव के दर्शन कर, आशीर्वाद प्राप्त किया और मंगलपाठ का श्रवण कर अध्यात्म अनुसंधान की यात्रा प्रारम्भ की। एक वैज्ञानिक के रूप में अंतरिक्ष की अनंत ऊंचाइयों को समझने वाले डॉ. किरण कुमार का आध्यात्मिक ऊर्जा के केंद्र में पहुंचना अपने आप में एक विशेष दृश्य था।
इसके बाद उन्होंने महाप्रज्ञ प्रोग्रेसिव स्कूल में 'आगम से अंतरिक्ष तक' विषयक कार्यक्रम में भाग लिया। यह विषय अपने आप में विज्ञान और अध्यात्म के सुंदर संबंध को व्यक्त करता है। जैन विश्व भारती द्वारा संचालित जयपुर एवं टमकरि के विघालयों से भी विज्ञान के विद्यार्थियों ने कार्यक्रम में भाग लिया।
कार्यक्रम में युवाचार्य श्री महावीर ने विद्यार्थियों को संबोधित करते हुए जीवन में अध्यात्म के महत्व पर प्रकाश डाला। उन्होंने Head, Heart और Hands के समुचित उपयोग से जीवन को विकासोन्मुख बनाने की प्रेरणा प्रदान की।
उन्होंने भारतीय जैन दर्शन की आधुनिक विज्ञान के संदर्भ में प्रासंगिकता पर भी चर्चा की। आचार्य महाप्रज्ञ जी और भारत के महान वैज्ञानिक डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम के बीच हुए संवाद और उससे मिली प्रेरणा का उल्लेख करते हुए उन्होंने बताया कि विज्ञान का उद्देश्य केवल शक्ति प्राप्त करना नहीं, बल्कि मानवता के कल्याण की दिशा में आगे बढ़ना भी होना चाहिए।
बच्चों से संवाद और अंतरिक्ष की यात्रा : डॉ. किरण कुमार ने विद्यार्थियों को भारत के अंतरिक्ष कार्यक्रम की यात्रा के बारे में बताया। उन्होंने समझाया कि भारत ने किस प्रकार अपने अंतरिक्ष कार्यक्रम की शुरुआत की और आज ISRO देश के लिए संचार, मौसम, शिक्षा, कृषि, आपदा प्रबंधन और अनेक क्षेत्रों में सेवाएं उपलब्ध करा रहा है।
विद्यार्थियों ने भी उत्साहपूर्वक उनसे प्रश्न पूछे। स्कूल के बच्चों ने विज्ञान से जुड़े मॉडल और प्रस्तुतियां तैयार की थीं। डॉ. किरण कुमार तथा युवाचार्य श्री ने इन मॉडलों का अवलोकन किया जिससे बच्चों का उत्साह शतगुणित हो गया।
अध्यात्म और आधुनिक शोध पर मंथन : इसके बाद डॉ. किरण कुमार ने सुधर्मा सभा में आचार्य महाश्रमण जी के प्रवचन का लाभ लिया। तत्पश्चात STRC की बैठक में उन्होंने भाग लिया। बैठक में इस बात पर चर्चा हुई कि आधुनिक शोध के क्षेत्र में अध्यात्म की क्या भूमिका हो सकती है और जैन दर्शन के आध्यात्मिक चिंतन को विश्व के सामने किस प्रकार प्रस्तुत किया जा सकता है।
मध्याह्न में आचार्य महाश्रमण जी की संनिधि में डॉ. किरण कुमार और STRC की टीम का विशेष संवाद भी हुआ। उन्होंने आचार्यप्रवर के समक्ष अपने प्रश्न भी रखे और आचार्यप्रवर उनके उत्तर प्रदान कर उन्हें कृतार्थ किया।
प्रेक्षाध्यान से लेकर नेशनल स्पेस डे तक : 23 अगस्त की सुबह डॉ. किरण कुमार ने मुनि धर्मेश कुमार जी स्वामी की सन्निधि में प्रेक्षाध्यान का अभ्यास किया। इसके बाद उन्होंने STRC की बैठक में भाग लिया और प्रवचन में उपस्थित रहे।
23 अगस्त का दिन उनके लिए इसलिए भी विशेष था क्योंकि इसी दिन चंद्रयान-3 की ऐतिहासिक लैंडिंग के तीन वर्ष पूरे हुए। भारत इस उपलब्धि की स्मृति में नेशनल स्पेस डे मनाता है। जिस वैज्ञानिक ने भारतीय अंतरिक्ष कार्यक्रम की यात्रा में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, उनका यह विशेष दिन आचार्य महाश्रमण जी की सन्निधि में मनाया जाना अपने आप में यादगार प्रसंग बन गया।
इस अवसर पर आचार्य महाश्रमण जी ने उन्हें शुभाशीष प्रदान किया। डॉ. किरण कुमार ने भी अपने वक्तव्य में विज्ञान और अध्यात्म के समन्वय की आवश्यकता पर प्रकाश डाला। उन्होंने बताया कि विज्ञान हमें बाहरी संसार को समझने की शक्ति देता है, जबकि अध्यात्म हमें अपने भीतर को समझने की दिशा दिखाता है। दोनों का संतुलित विकास मानवता के लिए अधिक उपयोगी हो सकता है।
मुख्य प्रवचन कार्यक्रम क पश्चात् डॉ. किरण कुमार जी ने जैन विश्व भारती परिसर का अवलोकन किया तथा साध्वीप्रमुखा श्री विश्रुतविभा जी, साध्वी वर्याश्री संबुद्धयशाजी आदि साध्वियों की सेवा की। उन्होनें उत्कट भावा से चारीत्रात्माओं का सुपात्र दान भी दिया।
संतों के बीच अंतरिक्ष विज्ञान की चर्चा : प्रवास के दौरान मुनिवृंद के लिए एक विशेष सत्र आयोजित किया गया, जिसका विषय था- 'Working of ISRO: From Idea to Execution'। इसमें डॉ. किरण कुमार ने भारतीय अंतरिक्ष कार्यक्रम की कार्यप्रणाली, भविष्य की योजनाओं और भारत के अंतरिक्ष क्षेत्र में आगे के लक्ष्यों के बारे में जानकारी दी।
उन्होंने मानव को अंतरिक्ष में भेजने की योजनाओं, चंद्रमा पर मानव मिशन और भारत के अपने स्पेस स्टेशन की दिशा में किए जा रहे प्रयासों सहित अनेक विषयों पर जानकारी दी। संतों ने भी उत्सुकता से प्रश्न पूछे और विज्ञान के इन विषयों को समझने का प्रयास किया।
अखिल भारतीय तेरापंथ युयक परिषद् की ओर से एक संवादात्मक Podcast भी आयोजित किया गया, जो युवा पीढ़ी का पथप्रदर्शन करने वाला सिद्ध हो सकता है। का संयोजन श्री श्रेयांश कोठारी ने किया।
गुरुदेव की सेवा से हुए प्रभावित : डॉ. किरण कुमार जी के दो दिवसीय लाडनूं प्रवास का एक अत्यंत भावपूर्ण पक्ष यह भी रहा कि उन्होंने आचार्य महाश्रमण जी की संनिधि में केवल वैज्ञानिक विषयों पर संवाद ही नहीं किया, बल्कि आध्यात्मिक वातावरण को भी निकट से अनुभव किया। उन्होंने ध्यान के प्रयोग किए, संतों के दर्शन किए और अनेक संतों की सेवा का लाभ लिया।
गुरुदेव की सरलता, अनुशासन, करुणा और आध्यात्मिक व्यक्तित्व से डॉ. किरण कुमार जी विशेष रूप से प्रभावित हुए। विज्ञान के क्षेत्र में लंबे समय तक देश की सेवा करने वाले इस वरिष्ठ वैज्ञानिक का आध्यात्मिक साधना और संतों के प्रति विनयपूर्ण भाव से जुड़ना इस यात्रा की विशेष उपलब्धि रही।
यह अनुभव इस बात को भी दर्शाता है कि आध्यात्मिकता किसी एक वर्ग या क्षेत्र तक सीमित नहीं है। विज्ञान के क्षेत्र में विश्वस्तरीय उपलब्धियां हासिल करने वाला व्यक्ति भी अध्यात्म से प्रेरणा और आंतरिक ऊर्जा प्राप्त कर सकता है।
एक यात्रा, अनेक संदेश : डॉ. किरण कुमार का दो दिवसीय लाडनूं प्रवास केवल कार्यक्रमों की श्रृंखला नहीं था। इसमें दर्शन था, संवाद था, ध्यान था, शोध था और सीखने-सिखाने की भावना थी। उन्होंने मुनि दिनेशकुमार जी, मुनि धर्मेश कुमार जी, मुनि कुमारश्रमण जी, मुनि योगेशकुमार जी, मुनि कीर्तिकुमार जी, मुनि मननकुमार जी, मुनि अक्षयप्रकाश जी, मुनि नयकुमार जी, मुनि सिद्धकुमार जी, मुनि अर्हम् कुमार जी, मुनि आर्षकुमार जी, मुनि गौरवकुमार जी आदि। अनेक संतों के दर्शन और सेवा का लाभ लिया तथा साध्वीवृंद से भी आध्यात्मिक संवाद किया।
इस पूरे प्रसंग का सबसे बड़ा संदेश यही है कि विज्ञान और अध्यात्म एक-दूसरे के विरोधी नहीं, बल्कि मानव कल्याण के दो महत्वपूर्ण मार्ग हैं। विज्ञान हमें बाहरी संसार को समझने की शक्ति देता है और अध्यात्म हमें अपने भीतर की दुनिया को समझने की दिशा दिखाता है।
लाडनूं में हुआ यह मिलन आने वाली पीढ़ी के लिए प्रेरणा बन सकता है। आज के युवाओं को विज्ञान में आगे बढ़ना है, नई खोज करनी है, अंतरिक्ष के रहस्यों को समझना है; लेकिन साथ ही उन्हें संवेदनशील, अनुशासित और मानवीय भी बनना है। आगम से अंतरिक्ष तक की यह यात्रा वास्तव में बाहर की अनंत दुनिया से भीतर की अनंत यात्रा को जोड़ने वाली यात्रा है। लाडनूं में विज्ञान और अध्यात्म के इस संगम ने यही संदेश दिया कि जब ज्ञान के साथ विवेक, तकनीक के साथ नैतिकता और प्रगति के साथ मानवीयता जुड़ती है, तभी विकास वास्तव में सार्थक बनता है।