गुरुवाणी/ केन्द्र
'तुलसी' के त्याग व 'महाप्रज्ञ' के विनय की धरोहर है विकास महोत्सव : आचार्यश्री महाश्रमण
लाडनूँ स्थित जैन विश्व भारती में योगक्षेम वर्ष का सुदीर्घ प्रवास कर रहे जैन श्वेतांबर तेरापंथ धर्मसंघ के ११वें अधिशास्ता, अखंड परिव्राजक, युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमण जी के पावन सान्निध्य में ३३वाँ विकास महोत्सव एवं दीक्षा समारोह हर्षोल्लास व गरिमा के साथ सुसंपन्न हुआ। भाद्रपद शुक्ला नवमी के पावन अवसर पर पूज्य गुरुदेव के श्रीमुख से सात मुमुक्षुओं को मुनि, साध्वी व समणी दीक्षा प्रदान की गई, जिससे धर्मसंघ के विकास को नया सोपान मिला।
पावन प्रेरणा: संयम का महत्त्व : दो ऐतिहासिक शताब्दियों का ऐलान–
१. संयम और अगारत्व का त्याग : आचार्यश्री ने अपने मुख्य ओजस्वी उद्बोधन में फरमाया कि धर्म की साधना ही मंगलकारी होती है। आज यह दीक्षा समारोह मानो धर्म के लिए संकल्प ग्रहण करने का समारोह है। इस ३३वें विकास महोत्सव के दिन आज कुल सात दीक्षाएँ हैं। जीव के अनंतकाल के संसार भ्रमण से छुटकारा पाने के लिए अगारत्व (गृहस्थ जीवन) को छोड़कर संयम स्वीकार करना बहुत बड़े त्याग का कार्य होता है।
२. गुरुदेव तुलसी आचार्य पद-प्राप्ति शताब्दी (२०३६) : पूज्यश्री ने ऐतिहासिक संदर्भ देते हुए फरमाया कि आज भाद्रपद शुक्ला नवमी का दिन है। आज से ठीक ५० वर्ष पूर्व परम पूज्य आचार्य श्री तुलसी ने गंगापुर मेवाड़ में विधिवत तेरापंथ धर्मसंघ के आचार्य पद का दायित्व संभाला था। इस पावन स्मृति में आचार्यश्री ने वर्ष २०३६ ईस्वी में (१० वर्ष पश्चात) 'गुरुदेव श्री तुलसी आचार्य पद-प्राप्ति शताब्दी समारोह' मनाने की ऐतिहासिक घोषणा की।
३. आचार्य महाप्रज्ञ दीक्षा शताब्दी (२०३६) : आचार्य श्री महाप्रज्ञ जी के विकास महोत्सव में योगदान, त्याग और विनय का स्मरण करते हुए पूज्यश्री ने फरमाया कि उनकी दीक्षा ग्रहण के भी १०० वर्ष संपन्न होने वाले हैं। इस संदर्भ में आचार्यश्री ने वर्ष २०३६ में 'आचार्य महाप्रज्ञ दीक्षा शताब्दी' भी मनाने का पावन भाव व्यक्त किया।
परिजनों की स्वीकृति और दीक्षा संस्कार की प्रक्रिया :
१. आज्ञा पत्र वाचन व मौखिक स्वीकृति : कार्यक्रम के प्रारंभ में पारमार्थिक शिक्षण संस्था के अध्यक्ष बजरंग जैन ने दीक्षार्थियों के आज्ञा पत्रों का वाचन किया और परिजनों ने आज्ञा पत्र पूज्यश्री के कर-कमलों में समर्पित किए। इसके पश्चात आचार्यश्री ने परिजनों से मौखिक रूप से भी दीक्षा की आज्ञा मांगी, जिस पर सभी परिजनों ने अपने स्थान पर खड़े होकर सहर्ष अपनी सहमति व निवेदन निवेदित किया।
२. अंतिम परीक्षण व आर्षवाणी : आचार्यश्री ने दीक्षार्थियों को अंतिम रूप से अपने निर्णय पर पुनः चिंतन करने का अवसर दिया। दीक्षार्थियों द्वारा दृढ़ संकल्प दोहराने के बाद पूज्यश्री ने आर्षवाणी का उच्चारण कर ५ मुमुक्षु बहनों व १ मुमुक्षु भाई को साधु-साध्वी दीक्षा तथा १ मुमुक्षु बहन को निर्धारित पाठ से समणी दीक्षा प्रदान की।
३. केशलुंचन व रजोहरण : अतीत की आलोचना के बाद परंपरा अनुसार नवदीक्षित मुनिजी का केशलुंचन आचार्यश्री ने तथा शेष साध्वियों व समणीजी का केशलुंचन साध्वी प्रमुखा श्री विश्रुतविभा जी द्वारा संपन्न किया गया। तत्पश्चात आचार्यश्री ने नवदीक्षित मुनिजी को रजोहरण तथा साध्वी प्रमुखाजी ने नवदीक्षित साध्वियों को रजोहरण प्रदान किया।
४. ज्ञान, दर्शन, चारित्र का आशीर्वाद : घोषणाओं के उपरांत पूज्यश्री ने सभी नवदीक्षितों को ज्ञान, दर्शन और चारित्र में निरंतर वर्धमान रहने का मंगल आशीर्वाद प्रदान किया तथा संयमयुक्त जीवन जीते हुए यतनापूर्वक आत्मकल्याण की प्रेरणा दी।
नव-दीक्षित साधु-साध्वियों का नया नामकरण :
आचार्यश्री महाश्रमण जी ने नव-दीक्षितों को नया संयमी नाम प्रदान किया–
मुमुक्षु बाबूलाल बाफना : मुनि हितकर जी
मुमुक्षु सुमन नाहटा : साध्वी सुपार्श्वप्रभा जी
मुमुक्षु सुमन बैद : साध्वी ओमप्रभा जी
मुमुक्षु अर्चना मेहता : साध्वी अर्चनाप्रभा जी
मुमुक्षु रुचिका मालू : साध्वी धर्मार्थप्रभा जी
मुमुक्षु कोमल भंसाली : साध्वी कोमलप्रभा जी
मुमुक्षु भावना : समणी भक्तिप्रज्ञा जी
१. शिक्षण-प्रशिक्षण का दायित्व : आचार्यश्री ने नवदीक्षित साध्वियों को साध्वी प्रमुखाजी को, नवदीक्षित मुनिजी को मुनि नयकुमारजी को तथा नवदीक्षित समणीजी को साध्वीवर्याजी के निर्देशन में शिक्षण-प्रशिक्षण हेतु सौंपा।
२. आधार पत्र व उद्बोधन : पूज्यश्री ने विकास महोत्सव के आधार पत्र का वाचन किया तथा स्व-रचित गीत का संगान किया। युवाचार्य श्री ने अतिसंक्षिप्त उद्बोधन में मर्यादा व विकास महोत्सव देने वाले आचार्यों की दूरदर्शिता को नमन किया।
३. समारोह का समापन : तेरापंथ महिला मंडल-लाडनूँ, साध्वी वृंद तथा विकास परिषद के संयोजक मांगीलाल सेठिया व सदस्य पद्मचंद पटावरी ने विचार व्यक्त किए। अंत में चतुर्विध धर्मसंघ द्वारा संघ गान के साथ समारोह सुसंपन्न हुआ।