ठहराव में आसक्ति है, बहने में निर्मलता : आचार्यश्री महाश्रमण

गुरुवाणी/ केन्द्र

लाडनूं। 18 सितम्बर, 2026

ठहराव में आसक्ति है, बहने में निर्मलता : आचार्यश्री महाश्रमण

जैन श्वेतांबर तेरापंथ धर्मसंघ के ११वें अधिशास्ता, अहिंसा यात्रा प्रणेता, महातपस्वी आचार्यश्री महाश्रमण जी योगक्षेम वर्ष के दौरान जन-जन के मानस को निरंतर आध्यात्मिक अभिसिंचन प्रदान कर रहे हैं। सुधर्मा सभा में आयोजित मुख्य मंगल प्रवचन कार्यक्रम के दौरान पूज्य आचार्यश्री ने उत्तरज्झयणाणि आगम के माध्यम से 'अनासक्ति से क्या मिलेगा' विषय पर सारगर्भित एवं जीवनोपयोगी पाथेय प्रदान किया।
अप्रतिबद्धता और बहते जल सा निर्मल साधु जीवन :
१. प्रतिबद्धता का अर्थ व विवेकपूर्ण विहार : आगमिक जिज्ञासा का समाधान करते हुए आचार्य श्री महाश्रमण जी ने फरमाया कि प्रश्न उठता है— अप्रतिबद्धता से जीव क्या प्राप्त करता है? प्रतिबद्धता का अर्थ है किसी व्यक्ति, स्थान, कुल, गाँव या नगर से बँध जाना। साधु को हर प्रकार के भीतरी राग भाव और प्रतिबद्धता से मुक्त (अप्रतिबद्ध) रहना चाहिए। शारीरिक स्वास्थ्य संबंधी विशेष अपेक्षा को छोड़कर साधु को किसी एक स्थान से आबद्ध नहीं होना चाहिए।
२. चारित्र विशुद्धि व धर्म प्रचार : पूज्यश्री ने उदाहरण देते हुए फरमाया कि जिस प्रकार बहता हुआ पानी सदा निर्मल रहता है, उसी प्रकार साधु को भी अपने कल्प (मर्यादा) के अनुसार निरंतर विचरते रहना चाहिए, जिससे उसका चारित्र निष्कलंक व निर्मल बना रहे। एक ही स्थान पर लंबे समय तक टिके रहने से व्यक्ति, स्थान अथवा आहार-पानी के प्रति आसक्ति उत्पन्न हो सकती है। साथ ही, एक स्थान पर जमे रहने से अन्य क्षेत्रों के लोगों को धर्म श्रवण का अवसर नहीं मिल पाता। अतः व्यापक धर्म प्रचार की दृष्टि से भी स्थान परिवर्तन आवश्यक है।
निःसंगता, मर्यादावली और ज्ञान दान का संदेश :
१. अनासक्ति से निःसंगत्व की प्राप्ति : शास्त्र का उद्धरण देते हुए पूज्यश्री ने फरमाया कि अप्रतिबद्धता से आत्मा को निःसंगता प्राप्त होती है। जो बाह्य संसर्गों से मुक्त रहता है, उसके भीतर भी निःसंग भाव जागृत रहता है। श्रीमज्जयाचार्य तथा अन्य पूर्वाचार्यों ने भी अपनी कृतियों के माध्यम से साधुओं को किसी भी प्रकार का 'संग' न रखने की बारंबार प्रेरणा दी है।
२. संयम की अखंड ज्योति व मर्यादा का वाचन : आचार्यश्री ने पावन प्रेरणा देते हुए फरमाया कि जीवन के अंतिम श्वास तक संयम की अखंड ज्योति जलती रहे और यथासंभव तप की ज्योति भी प्रज्वलित रहे, तो यह मानव जीवन की सबसे बड़ी सफलता और उपलब्धि है। मर्यादावली व हाजिरी का वाचन भी साधु-संतों को इसी पथ पर आगे बढ़ने की प्रेरणा देता है। साधु संघ में रहकर जो ज्ञान अर्जन करते हैं, उसे यथासंभव दूसरों को बाँटने का प्रयास करना चाहिए, ताकि एकाग्रचित्त होकर अनासक्त भाव से विचरण किया जा सके।