मर्यादा और एकांतवास से सुरक्षित रहता है संयम: आचार्यश्री महाश्रमण

गुरुवाणी/ केन्द्र

लाडनूं। 19 सितम्बर, 2026

मर्यादा और एकांतवास से सुरक्षित रहता है संयम: आचार्यश्री महाश्रमण

जन-जन को आध्यात्मिक अभिसिंचन प्रदान करने वाले जैन श्वेतांबर तेरापंथ धर्मसंघ के ११वें अधिशास्ता, भगवान महावीर के प्रतिनिधि, महातपस्वी आचार्यश्री महाश्रमण जी ने सुधर्मा सभा में श्रद्धालुओं को अमृत देशना प्रदान की। आज के निर्धारित विषय ‘एकान्तवास से क्या मिलेगा?’ पर उत्तरज्झयणाणि आगम के माध्यम से पावन पाथेय प्रदान किया।
साधना के दो प्रकार और रुचि के अनुसार कार्य की महत्ता :
१. दो प्रकार की साधु साधना : अमृत देशना प्रदान करते हुए आचार्यश्री ने फरमाया कि साधु दो प्रकार के हो सकते हैं। एक वे साधु जो जनसंपर्क से प्रायः या पूर्णतया निवृत्त रहते हुए अपनी व्यक्तिगत साधना में ही समय लगाना चाहते हैं। उन्हें लोगों से मिलने, व्याख्यान देने या प्रेरणा देने आदि से मतलब नहीं होता, वे एकांत में रहकर साधना करने वाले होते हैं। आज भी ऐसे साधु मिल सकते हैं जो गुफाओं आदि में रहकर साधना करते हैं।
२. जनसंपर्क व व्यक्तिगत रुचि : दूसरे साधु वे होते हैं जो समाज में रहने वाले लोगों को व्याख्यान सुनाने वाले, प्रेरणा देने वाले व संपर्क करने वाले होते हैं। ऐसे कार्यों में भी उनका समय लगता है। यह अपनी व्यक्तिगत रुचि या परिस्थिति है कि कोई साधु किस प्रकार की साधना करता है। रुचि के अनुरूप यदि कार्य मिलता है तो आदमी उसे बहुत अच्छे ढंग से कर लेता है, जबकि रुचि के प्रतिकूल कार्य मिल जाए तो उसमें मन लगे या न भी लगे। हमारे धर्मसंघ में भी कई ऐसे संत हुए हैं, जिन्होंने बहुत अच्छा जनसंपर्क किया है।
विविक्त शयनासन, चित्रों का विवेक और चारित्र सुरक्षा :
१. एकांतवास और प्रवास का विवेक: आगमिक प्रश्न का समाधान करते हुए आचार्यश्री ने फरमाया कि विविक्त शयनासन या एकांतवास साधु के लिए अत्यंत उपयोगी है। साधु का रहने का स्थान सामान्यतया विविक्त यानी एकांत में हो जहाँ भिन्न लिंगी, पशु आदि न हों और न ही उनका आस-पास कोई प्रवास हो। गृहस्थों का बसता हुआ घर हो तो साधु को वहाँ अपना प्रवास करने से यथासंभव बचना चाहिए।
सात्विक निमित्त और तस्वीरों का प्रभाव : पूज्यश्री ने प्रवास स्थल के वातावरण पर गहरा प्रकाश डालते हुए कहा कि प्रवास स्थल में भिन्न लिंगियों के फोटो भी नहीं होने चाहिए और यदि हों तो वे ढके (आवृत) होने चाहिए। यदि चित्र हों तो भगवान महावीर, आचार्य भिक्षु, गुरुदेव तुलसी या नवकार मंत्र आदि के हों तो बहुत अच्छी बात है, क्योंकि आँखों के सामने धर्मात्माओं के चित्र आते हैं तो सात्विक-आध्यात्मिक भावों का संचार होता है। भिन्न लिंगी आदि के फोटो बार-बार दिखने से असम्यक् भाव पैदा होने के निमित्त बन सकते हैं।
२. नियम-मर्यादा और चारित्र गुप्त : शास्त्रोक्त संदर्भ देते हुए पूज्यश्री ने फरमाया कि विविक्त शयनासन से आदमी 'चारित्र गुप्त' को प्राप्त होता है और चारित्र की रक्षा होती है, क्योंकि निमित्त का अपना प्रभाव होता है। हमारे कई नियम, व्यवस्थाएँ और मर्यादावली इन्हीं निमित्तों से बचने के लिए बनाए गए हैं। संघ और संगठन में एकरूपता रखने के लिए नियमों का होना आवश्यक है। साधु-साध्वियों को गुरुकाल में या बहिर्विहार में अपने स्थान व वातावरण के प्रति सदा जागरूक रहना चाहिए।