'MAHASHRAMAN' का महा-रहस्य : एक ही नाम में 11 पूर्वाचार्यों का संगम!

गुरुवाणी/ केन्द्र

युवाचार्यश्री महावीर कुमार

'MAHASHRAMAN' का महा-रहस्य : एक ही नाम में 11 पूर्वाचार्यों का संगम!

पर्युषण पर्व के दौरान युवाचार्य श्री महावीर कुमार जी ने आचार्यश्री महाश्रमण जी के व्यक्तित्व की एक अत्यंत सुंदर और अनूठी व्याख्या प्रस्तुत की। उन्होंने “MAHASHRAMAN” के 11 अक्षरों में निहित गुणों के माध्यम से पूर्वाचार्यों के व्यक्तित्व और वर्तमान आचार्यश्री महाश्रमण जी के जीवन में दिखाई देने वाली समानताओं को रेखांकित किया। उनका भाव था कि तेरापंथ के पूर्वाचार्यों को यदि देखना हो, तो उन सबके अनेक गुण आचार्यश्री महाश्रमण जी के व्यक्तित्व में सहज रूप से दिखाई देते हैं।
M — Magnanimity
महानता और उदारता - स्वयं आचार्य महाश्रमण जी
महानता केवल पद या प्रतिष्ठा से नहीं आती, बल्कि स्वयं को जनकल्याण के लिए समर्पित करने से प्रकट होती है। आज आचार्यश्री महाश्रमण जी का जीवन जनकल्याण की भावना से ओतप्रोत है। जीवन में स्वयं के लिए ही नहीं अपितु दूसरों के कल्याण के लिए भी चिंतन, मनन दिखाई देता है। “तिन्नाण्णं तारयाणं” की भावना के साथ उन्होंने जन-जन के कल्याण का मार्ग प्रशस्त किया। आपकी विशाल जनयात्रा केवल यात्रा नहीं, बल्कि जन-जन तक धर्म, अहिंसा और सद्भावना का संदेश पहुँचाने का माध्यम बनी। स्वयं कष्ट सहकर भी दूसरों के कल्याण और आध्यात्मिक उत्थान के लिए निरंतर गतिशील रहना, यह उसी महानता का प्रतिबिंब है।
A — Assertive
दृढ़ता और आत्मविश्वास — आचार्यश्री भिक्षु
आचार्य भिक्षु दृढ़ संकल्प के धनी थे। सत्य और सिद्धांत के विषय में उनकी दृष्टि अत्यंत स्पष्ट थी। वे अपनी बात को केवल कहने तक सीमित नहीं रखते थे, बल्कि उसे दृष्टांत और तर्क के माध्यम से स्पष्ट करने का प्रयास करते थे। आचार्य भिक्षु ने जब सत्य और सिद्धांत को सर्वोपरि माना, तब रघुनाथ जी से अलग होने का निर्णय भी उसी दृढ़ता का परिचायक था। इसी प्रकार आचार्यश्री महाश्रमण जी के जीवन में भी निर्णयों की स्पष्टता और सिद्धांतनिष्ठा दिखाई देती है। मुनि रूपचंद जी के साथ प्रसंग में उन्होंने तेरापंथ को चुनने का निर्णय लिया। दोनों के जीवन में एक बात विशेष रूप से दिखाई देती है, जो सही है, उसके प्रति स्पष्टता और जो निर्णय लिया है, उसके प्रति दृढ़ता। उनके कार्यों में यह स्पष्टता केवल विचारों में नहीं, बल्कि लिखित व्यवस्था और व्यवस्थित कार्यप्रणाली में भी दिखाई देती है।
H — Humble
विनम्रता — आचार्यश्री भारमल जी
आचार्यश्री भारमल जी के जीवन की एक विशेषता थी, अत्यंत सहज विनम्रता। एक प्रसंग में आचार्य भिक्षु ने भारमल जी से कहा कि यदि उनके कार्य में कोई त्रुटि दिखाई दे तो एक तेला करना होगा। भारमल जी ने सहजता से इसे स्वीकार किया। यह अपने से छोटे या बड़े की बात नहीं, बल्कि सत्य को स्वीकार करने की विनम्रता थी। आचार्यश्री महाश्रमण जी में भी यही विनम्रता दिखाई देती है। गुरुदेव आचार्यश्री तुलसी ने भी इसी भाव को महत्त्व दिया था। यदि कोई यह कहे कि “महाश्रमण में सुविधावाद आ गया है,” तो तीन दिन तक तीन-तीन घंटे ध्यान करन है, उसे भी सहजता से स्वीकार करके आत्मपरीक्षण करने की भावना, आपकी विनम्रता का परिचायक है, आपकी विनम्रता की गहराई को दर्शाती है।
A — Austerity
तप, संयम और ब्रह्मचर्य — आचार्यश्री रायचंद जी
आचार्यश्री रायचंद जी को आचार्य भिक्षु “ब्रह्मचारी जी” के नाम से संबोधित करते थे। उनका जीवन तप, संयम और ब्रह्मचर्य की साधना से निर्मित था। उनके जीवन की निर्विकारिता और प्रकृति के साथ सहज सामंजस्य भी उल्लेखनीय था। इन्हीं गुणों की झलक आचार्यश्री महाश्रमण जी के जीवन में दिखाई देती है। इंद्रिय-संयम, तप और ब्रह्मचर्य उनके साधनापथ के महत्वपूर्ण आधार हैं। उनकी अनुत्तर चेतना को भी ऋषिराय से प्राप्त हुई आध्यात्मिक परंपरा के संदर्भ में देखा गया है। इस प्रकार रायचंद जी की तपस्या और संयम की परंपरा का प्रतिबिंब आचार्यश्री महाश्रमण जी में दिखाई देता है।
S — Strategy
दूरदर्शिता और प्रबंधन-कौशल — आचार्यश्री जीतमल जी (जयाचार्य)
आचार्यश्री जीतमल जी, जिन्हें जयाचार्य के नाम से जाना जाता है, दूरदर्शी व्यवस्था और संगठन-कौशल के लिए विशेष रूप से स्मरण किए जाते हैं। साध्वी समाज के विकास को देखते हुए उन्होंने साध्वी प्रमुखा की व्यवस्था की। बढ़ते हुए साध्वी समाज को ध्यान में रखकर व्यवस्था में आवश्यक विस्तार करते हुए आचार्य श्री महाश्रमण जी ने साध्वीवर्या पद का सृजन किया।
जयाचार्य ने मर्यादा महोत्सव, हाजिरी जैसे आयोजनों के माध्यम से संघीय अनुशासन और संगठन को सुदृढ़ रूप दिया। आचार्यश्री महाश्रमण जी के कार्यकाल में भी इसी दूरदर्शिता का विस्तार दिखाई देता है। अनुशासन संहिता को व्यवस्थित स्वरूप देना, समण श्रेणी, मुमुक्षु की अनुशासन संहिता, श्रावकों के लिए श्रावक संदेशिका, तथा व्यवस्था को सुचारु बनाने के लिए कल्याण परिषद और समीक्षा परिषद जैसी व्यवस्थाएँ, इन सबमें भविष्य को देखकर वर्तमान को व्यवस्थित करने की दृष्टि दिखाई देती है।
H — Harmonious
मधुर स्वभाव, शांतिदायक और सबको साथ लेकर चलने वाले, आचार्यश्री मघराज जी
आचार्यश्री मघवागणी के जीवन को वीतराग कल्प के रूप में देखा जाता है। उनके व्यक्तित्व में शांति, सहजता और मधुरता का भाव था। इसी प्रकार आचार्यश्री महाश्रमण जी का व्यक्तित्व भी अजातशत्रु, कोमल हृदय और मधुर स्वभाव से युक्त दिखाई देता है। वे सबको साथ लेकर चलने की भावना रखते हैं।
दोनों के जीवन की एक विशेष समानता यह भी है कि युवाचार्य के रूप में दोनों ने अपने आचार्य के प्रति पूर्ण समर्पण और सहयोग का भाव रखा। अपने आचार्य के प्रति निष्ठा और संघ के प्रति समर्पण उनके जीवन का महत्वपूर्ण पक्ष रहा।
R — Reformer
सुधारक और सकारात्मक दिशा देने वाले, आचार्यश्री माणकलाल जी
आचार्यश्री माणकलाल जी के व्यक्तित्व में नवीनता को स्वीकार करने और सकारात्मक परिवर्तन की दृष्टि दिखाई देती है। उन्हें देशाटन में विशेष रुचि थी। उन्होंने पोथी के भार को कम किया और हरियाणा आदि क्षेत्रों में यात्राएँ कीं। आचार्यश्री महाश्रमण जी के जीवन में भी देशाटन और जनसंपर्क का यह भाव अत्यंत व्यापक रूप में दिखाई देता है। उनकी अभूतपूर्व यात्राएँ—नेपाल, भूटान, शिलांग, असम, गुवाहाटी, मेघालय, नागालैंड आदि क्षेत्रों तक पहुँचीं। आगे भी कश्मीर आदि प्रांतों में विहार की घोषणा कर रखी है, इन यात्राओं का उद्देश्य केवल स्थान परिवर्तन नहीं, बल्कि नए क्षेत्रों तक धर्म, अहिंसा और सद्भाव की चेतना पहुँचाना रहा। इस दृष्टि से उनमें भी सुधारक और सकारात्मक दिशा देने वाले आचार्य का स्वरूप दिखाई देता है।
A — Administrator
अनुशासक — आचार्यश्री डालगणी जी
आचार्यश्री डालगणी जी अनुशासन के प्रति अत्यंत सजग थे। गलत को सहन न करना और जहाँ आवश्यकता हो वहाँ स्पष्ट रूप से टोकना उनके व्यक्तित्व का महत्वपूर्ण गुण था। वे केवल साधु-साध्वियों के प्रति ही नहीं, बल्कि श्रावकों को भी आवश्यक होने पर ओलंबा-उलाहना या उपालंभ देने में संकोच नहीं करते थे। आचार्यश्री महाश्रमण जी में भी अनुशासन के प्रति यही सजगता दिखाई देती है। उनके लिए अनुशासन केवल नियमों का पालन नहीं, बल्कि संघ की मर्यादा और साधना की आधारभूमि है। जहाँ सुधार आवश्यक होता है, वहाँ वे स्पष्ट मार्गदर्शन देते हैं।
M — Magnificent
अत्यंत प्रभावशाली — आचार्यश्री कालूगणी जी
आचार्यश्री कालूगणी जी का व्यक्तित्व अत्यंत प्रभावशाली था। उनके जीवन की एक प्रमुख विशेषता थी, निष्पक्षता और निःस्पृहता। उनके लिए किसी के प्रति पक्षपात का स्थान नहीं था। वे साधु-साध्वी, छोटे-बड़े सभी के प्रति संघीय दृष्टि से समान भाव रखते थे। आचार्यश्री महाश्रमण जी में भी यही निष्पक्षता, निःस्पृहता और श्रमनिष्ठा दिखाई देती है। छोटे-छोटे मुनियों की दीक्षा से लेकर उनके साधना-जीवन के निर्माण तक, आपमें श्रम और संघनिष्ठा का वही प्रभावशाली स्वरूप दिखाई देता है।
A — Architect
निर्माणकर्ता, संरचना देने वाले और युगद्रष्टा — आचार्यश्री तुलसी
आचार्यश्री तुलसी ने तेरापंथ को नई योजनाएँ, नई दृष्टि और नए आयाम दिए। उन्होंने समय की आवश्यकता को समझते हुए संघ को एक नया मोड़ दिया और विशेष रूप से साध्वी समाज के संदर्भ में भी सुधार और विकास की दिशा प्रदान की। आचार्यश्री महाश्रमण जी के व्यक्तित्व में भी इसी निर्माणकर्ता और युगद्रष्टा की भूमिका दिखाई देती है। उन्होंने पूर्व में चली आ रही व्यवस्थाओं को आगे बढ़ाते हुए उन्हें समयानुकूल स्वरूप देने का प्रयास किया। नई योजनाओं, नई व्यवस्थाओं और नई कार्यदिशाओं के माध्यम से संघ को भविष्य के लिए तैयार करने की दृष्टि उनके कार्यों में दिखाई देती है।
N — Numinous
तीव्र आध्यात्मिक एवं धार्मिक गुणों से परिपूर्ण — आचार्यश्री महाप्रज्ञ जी
आचार्यश्री महाप्रज्ञ जी का व्यक्तित्व अलौकिक आध्यात्मिक प्रभाव और दिव्य चेतना से युक्त था। उनके जीवन में करुणा का गुण विशेष रूप से दिखाई देता था। आचार्यश्री महाप्रज्ञ जी स्वयं भी करुणा की बात करते थे। आज आचार्यश्री महाश्रमण जी में भी उसी करुणा का विस्तार दिखाई देता है। बल्कि युवाचार्य श्री महावीर कुमार जी के भावानुसार, करुणा के क्षेत्र में महाश्रमण जी हमसे भी आगे बढ़ते दिखाई देते हैं। दर्शन, प्रज्ञा, ध्यान और आध्यात्मिक चेतना के जिन आयामों को आचार्यश्री महाप्रज्ञ जी ने विकसित किया, उनकी आध्यात्मिक परंपरा और चेतना का प्रतिबिंब भी आचार्यश्री महाश्रमण जी के व्यक्तित्व में देखा जा सकता है।
इस प्रकार “MAHASHRAMAN” के प्रत्येक अक्षर में एक गुण है और प्रत्येक गुण के साथ तेरापंथ के एक पूर्वाचार्य का व्यक्तित्व जुड़ता है।
M — Magnanimity
स्वयं आचार्य महाश्रमण जी
A — Assertive — आचार्य भिक्षु
H — Humble — आचार्य भारमल जी
A — Austerity — आचार्य रायचंद जी
S — Strategy — आचार्य जीतमल जी (जयाचार्य)
H — Harmonious — आचार्य मघवा गणी
R — Reformer — आचार्य माणकलाल जी
A — Administrator — आचार्य डालगणी जी
M — Magnificent — आचार्य कालूगणी जी
A — Architect — आचार्य तुलसी
N — Numinous — आचार्य महाप्रज्ञ जी
अर्थात् पूर्वाचार्यों के व्यक्तित्व की अलग-अलग विशेषताएँ, अलग-अलग गुण और अलग-अलग जीवन-दृष्टियाँ, आचार्यश्री महाश्रमण जी के व्यक्तित्व में एक साथ प्रतिबिंबित होती दिखाई देती हैं।
यही इस व्याख्या की सबसे सुंदर बात है कि आचार्यश्री महाश्रमण जी को समझने के लिए केवल उनके वर्तमान को देखने की आवश्यकता नहीं है; उनके भीतर तेरापंथ की पूरी आचार्य परंपरा की झलक दिखाई देती है।