'कालूगणी' की दिव्य दृष्टि का फल है 'तुलसी' और  'महाप्रज्ञ' जैसे महान आचार्य : आचार्यश्री महाश्रमण

गुरुवाणी/ केन्द्र

लाडनूं। 17 सितम्बर, 2026

'कालूगणी' की दिव्य दृष्टि का फल है 'तुलसी' और 'महाप्रज्ञ' जैसे महान आचार्य : आचार्यश्री महाश्रमण

पर्वाधिराज पर्युषण की अष्टदिवसीय पावन आराधना एवं भगवती संवत्सरी-क्षमापना पर्व के अभूतपूर्व आयोजन के उपरांत जैन श्वेतांबर तेरापंथ धर्मसंघ के ११वें अधिशास्ता, महातपस्वी आचार्यश्री महाश्रमण जी की पावन सन्निधि में अष्टम आचार्याधिपति श्रीमज्जयाचार्य की गौरवशाली परंपरा के वाहक परम कृपालु आचार्यश्री कालूगणी का महाप्रयाण दिवस अगाध श्रद्धा, भव्यता व आध्यात्मिक गरिमा के साथ मनाया गया।
'आचार्यश्री कालू: परम कृपालु' पर आगमिक विवेचन व ऐतिहासिक संस्मरण:
१. आन्तरिक जुड़ाव व वात्सल्य रूप : निर्धारित विषय पर आलोक डालते हुए आचार्यश्री महाश्रमण जी ने फरमाया कि आज भाद्रपद शुक्ला षष्ठी है—हमारे धर्मसंघ के ८वें आचार्यश्री कालूगणी प्रवर की महाप्रयाण की वार्षिक तिथि। परम पूज्य कालूगणी पंचम आचार्यश्री मघवा से दीक्षित हुए और उन्हें वीतराग कल्प मघवा गणी की सन्निधि में रहने का सौभाग्य मिला। उनके प्रति कालूगणी का गहरा आंतरिक जुड़ाव व विशेष श्रद्धा भाव था।
२. गुरुदेव तुलसी का निर्माण व २२ वर्ष की आयु में पट्टारोहण :पूज्यश्री ने फरमाया कि आचार्यश्री तुलसी कालूगणी के सुशिष्य थे और वे उनके एकमात्र गुरु थे, जिन्होंने उन्हें दीक्षित किया तथा अपना उत्तराधिकार सौंपा। गुरुदेव तुलसी लगभग ११ वर्षों तक कालूगणी के सामीप्य में रहे। कालूगणी ने मात्र २२ वर्ष के युवा मुनि तुलसी को धर्मसंघ का दायित्व सौंपा, जो अत्यंत साहस और दूरदर्शिता का कार्य था। कालूगणी में माता और पिता दोनों का वात्सल्य व अनुशासन देखा जा सकता था। उनके द्वारा दीक्षित शिष्यों में आचार्यश्री तुलसी व मुनिश्री नथमलजी स्वामी (आगे चलकर महाप्रज्ञ जी) जैसे महान विद्वान संत हुए।
३. ६० वर्षों की जीवन यात्रा व गंगापुर का अंतिम चातुर्मास : कालूगणी का आचार्य काल लगभग २७ वर्ष रहा। हरियाणा चातुर्मास व मालवा मर्यादा महोत्सव को छोड़कर वे अधिकांश समय राजस्थान में ही प्रवासित रहे। वि.सं. १९९३ में गंगापुर चातुर्मास के दौरान, स्वास्थ्य ठीक न होने पर भी अपने अटूट मनोबल के साथ उन्होंने रंगभवन स्थान पर अपने उत्तराधिकारी का निर्णय दिया था।
'कालूगणी महाप्रयाण शताब्दी वर्ष' (वि.सं. २०९२-२०९३) की ऐतिहासिक घोषणा :
९ वर्ष पूर्व दूरगामी घोषणा: पूज्य आचार्यश्री महाश्रमण जी ने फरमाया कि आज आचार्यश्री कालूगणी के महाप्रयाण को ९० वर्ष पूर्ण हो गए हैं। इस पावन प्रसंग पर पूज्यश्री ने ऐतिहासिक निर्णय लेते हुए घोषणा की:
'विक्रम संवत २०९२ की भाद्रपद शुक्ला षष्ठी से विक्रम संवत २०९३ की भाद्रपद शुक्ला षष्ठी (आज से ९ वर्ष बाद) तक पूरे धर्मसंघीय स्तर पर 'आचार्यश्री कालूगणी महाप्रयाण शताब्दी वर्ष' मनाया जाएगा।' पूज्यश्री ने भगवान महावीर, आचार्य भिक्षु, उत्तरवर्ती आचार्य परंपरा, गुरुदेव तुलसी एवं आचार्यश्री महाप्रज्ञ जी का भावपूर्ण स्मरण करते हुए अष्टम आचार्याधिपति के चरणों में अपना भावपूर्ण श्रद्धार्पण किया।
साध्वी प्रमुखा जी के उद्गार, तपस्या का प्रत्याख्यान व पत्रिका लोकार्पण:
१. साध्वी प्रमुखा जी की अभिव्यक्ति : साध्वीप्रमुखा श्री विश्रुतविभा जी ने प्रसंगवश आचार्यश्री महाप्रज्ञ जी तथा आचार्यश्री कालूगणी से जुड़े प्रेरक संस्मरणों को सुधर्मा सभा के समक्ष प्रस्तुत किया।
२. तपस्या व साहित्य लोकार्पण : कार्यक्रम के दौरान मुनि मर्यादाकुमार जी ने आचार्य श्री महाश्रमण जी के मुखारविंद से ९ की तपस्या का प्रत्याख्यान (पचक्खाण) ग्रहण किया। इसके साथ ही पाक्षिक पत्रिका 'भारतीय समाज में धर्म अध्यात्म' के विशेषांक का पूज्य आचार्यश्री के पावन कर-कमलों में भक्तिभाव से लोकार्पण किया गया।