गुरुवाणी/ केन्द्र
जीवन की बस का ड्राइवर है 'कार्मण शरीर', आत्म-बल की ब्रेक से ही रुकेगा प्रमाद : आचार्यश्री महाश्रमण
लाडनूँ स्थित जैन विश्व भारती में योगक्षेम वर्ष का सुदीर्घ प्रवास कर रहे जैन श्वेतांबर तेरापंथ धर्मसंघ के ११वें अधिशास्ता, अहिंसा यात्रा प्रणेता, युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमण जी के पावन सान्निध्य में सुधर्मा सभा में आगम 'उत्तरज्झयणाणि' के २५वें अध्ययन पर आधारित मुख्य प्रवचन कार्यक्रम आयोजित हुआ। पूज्य गुरुदेव ने चतुर्विध धर्मसंघ को निर्धारित विषय ‘विनिवर्तना से क्या मिलेगा?’ पर पावन पाथेय प्रदान करते हुए अंतर्मन को साधने और प्रमाद से दूर रहने के व्यावहारिक सूत्र दिए।
जीवन का संचालन और कार्मण शरीर: संस्कारों का भंडार:
१. शरीर और आत्मा का योग : आचार्यश्री ने फरमाया कि हमारा जीवन मुख्यतः दो तत्त्वों का संयोग है— आत्मा और शरीर। हम पंचेन्द्रिय प्राणी हैं, जिनमें पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ (श्रोत्र, चक्षु आदि), कर्मेन्द्रियाँ (हाथ, पैर आदि) और तीन योग (मन, वचन, काय) विद्यमान हैं।
२. कार्मण शरीर - जीवन बस का ड्राइवर : पूज्यश्री ने बहुत ही सुंदर रूपक देते हुए फरमाया कि हमारे भीतर अनंतकाल से संस्कारों का प्रवाह चल रहा है। कार्मण शरीर इन संस्कारों का भंडार है, जहाँ से हमारे जीवन का संचालन होता है और इसी के कारण आदमी कभी भी क्रोध, अहंकार आदि के वश में आ जाता है। कार्मण शरीर मानो जीवन रूपी बस का ड्राइवर है।
३. कर्म के प्रभुत्व को क्षीण करने का मार्ग : चेतना पर कर्म का प्रभुत्व है, विशेषकर मोहनीय कर्म की जकड़न से चेतना को मुक्त कराना आवश्यक है।
अनादि काल से आत्मा के साथ लगा कार्मण शरीर केवल सिद्धावस्था में ही समाप्त होता है। हालाँकि, क्षायोपशमिक और क्षायिक भाव ऐसी आत्म-शक्तियाँ हैं जो कार्मण शरीर को भी परास्त कर सकती हैं।
विनिवर्तना: प्रमाद से मन-वचन-काय को लौटाने की कला :
१. बालक और अग्नि का दृष्टांत : आगम प्रश्न का समाधान करते हुए आचार्यश्री ने फरमाया कि विनिवर्तना का अर्थ है— जब इंद्रियाँ, मन, वचन और काय प्रमाद या सावद्यता (पाप-प्रवृत्ति) की ओर बढ़ने लगें तो उन्हें रोक देना। जैसे कोई छोटा बच्चा अग्नि की ओर बढ़ता है तो माता-पिता तुरंत उसे लौटा लेते हैं, ठीक उसी तरह आदमी या साधु को अपने मन, वचन और काय को पाप से पीछे हटा लेना चाहिए।
२. संवर और निर्जरा का लाभ : शास्त्रानुसार विनिवर्तना से जीव पाप कर्म न करने के लिए अभ्युत्थान करता है, जिससे नवीन कर्मों का 'संवर' होता है और पूर्व बद्ध कर्मों की 'निर्जरा' होती है। इसके पश्चात जीव चतुर्विध संसार-कांतार को पार कर जाता है।
३. कषायों पर नियंत्रण : मन में क्रोध, मान, माया या लोभ के भाव आएँ तो उनके प्रतिपक्षी आलंबन सूत्रों का स्मरण करना चाहिए। यदि एक साथ चारों पर नियंत्रण न हो सके तो एक-एक कर नियंत्रित करने का प्रयास करना चाहिए।
आचार्य डालगणी के समाधि स्थल जाने का भाव :
पूज्य प्रवर ने फरमाया कि भाद्रपद शुक्ला द्वादशी पर तेरापंथ के आठवें पट्टाचार्य परम पूज्य आचार्यश्री डालगणी जी का महाप्रयाण दिवस है उस दिन उनकी समाधि स्थल पर जाने का भाव है।