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तप परम औषधि है, तप से कर्म होते हैं क्षीण
युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमणजी की सुशिष्या साध्वी पुण्ययशाजी ठाणा-4 के सान्निध्य में सतरंगी तप का तप अभिनंदन समारोह आयोजित किया गया, जिसमें 1(उपवास) से लेकर 9 उपवास की तपस्या के 60 तपस्वियों ने भाग लिया। साध्वी पुण्ययशाजी ने अपने मंगल उदबोधन में कहा-भगवान महावीर ने गौतम स्वामी की जिज्ञासा पर तप का प्रतिफल बताते हुए कहा तपस्वी पूर्व संचित कर्मो को क्षीण कर विशुद्धि को प्राप्त होता है!कपड़ा मलिन होता है तो व्यक्ति उसे साबुन से धोता है,सोने में मैल जम जाता है तो उसे आग में डाला जाता है,वैसे ही आत्मा कर्म मल से मलिन हो जाती है तब साधक उसे तप की आग तपाता है। तप एक परम औषधि है। तपस्वी का आभामंडल विशेष तेजस्वी बन जाता है। अनेक दिव्य शक्तियां तपस्वी की चरणसेवी बन जाती है। तप से तन के रोग दूर होते है, मन के कल्मष,संताप क्षीण होते है। तप से कर्म शांत होने से ग्रहशांति भी होती है, ग्रहो का अशुभ फ़ल मंद हो जाता है या नष्ट हो जाता है,हर दृस्टि से तप एक करणीय अनुष्ठान है। साध्वी विनीतयशाजी ने अपने भावों की प्रस्तुति एक कविता के द्वारा दी। महिला मंडल की अध्यक्षा संतोषबाई गादिया एवं महिला मंडल की बहनों ने सुमधुर गीत की प्रस्तुति दी। पदम नाहर ने आभार ज्ञापन किया।